क्या कुरआन में आतंकवाद फैलाने की शिक्षा दी गई है? मेरा यह लेख इसी सवाल पर आधारित है। इसे पढ़ते समय पाठक अपने विवेक का इस्तेमाल करें।

‘मैं उससे दया की भीख मांग रहा था लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। उसने चाकू से मेरी उंगलियां काट दीं। मैंने अपनी आंखों से मेरी कटी हुई उंगलियां देखीं।’ – ये शब्द उस बेगुनाह शख्स के हैं जिसकी उंगलियां आईएसआईएस के आतंकवादी ने काट दी थीं।

मध्य पूर्व के देशों में जिस तरह से कुख्यात आतंकी गिरोह आईएसआईएस का उदय हुआ है और ‘सजा’ देने के उसके खौफनाक तरीकों के बारे में दुनिया ने देखा, सुना है, उसके बाद अक्सर कई लोग दबी जबान से और कुछ बुलंद आवाज में यह कहने लगे हैं कि आतंकियों को अपनी दरिंदगी को अंजाम देने की यह प्रेरणा कुरआन से मिलती है।

लिहाजा दुनिया का भला इसी में है कि कुरआन पर फौरन प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। वास्तव में कुरआन पहली किताब नहीं है जिस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। पिछले दिनों एक देश में गीता पर भी प्रतिबंध लगाने की बात चर्चा में आई थी।

किसी भी धार्मिक किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग ऐसे लोग करते हैं जिन्होंने या तो वह किताब पढ़ी नहीं या उन्होंने यह गलत मतलब या गलत मकसद के लिए पढ़ी है अथवा उन्हें धर्म के नाम से ही चिढ़ है। तीसरी श्रेणी के लोगों को समझाना थोड़ा मुश्किल होता है।

मैं पुनः मेरे सवाल पर आता हूं कि क्या कुरआन में कहा गया है कि गैर-मुस्लिम जहां भी मिलें, उनका कत्ल करना चाहिए और इससे जन्नत मिलेगी?

साथियों, चूंकि मैं बात कुरआन की कर रहा हूं इसलिए पूरी जिम्मेदारी के साथ कहता हूं कि इसमें एक शब्द भी ऐसा नहीं है जो आतंकवाद को सही ठहराए। कुरआन में कई-कई बार कहा गया है कि जो भी नेकी, भलाई और ईमानदारी का पालन करता है, अल्लाह की ओर से उसके लिए बदला है। कुरआन में हिंसा और आतंक की कड़े शब्दों में निंदा की गई है और ऐसे लोगों को सख्त चेतावनी दी गई है।

जो लोग कहते हैं कि कुरआन ही झगड़े की जड़ है, वे बिल्कुल गलत कह रहे हैं। असल में कुरआन अमन का आशियाना है और इसका दूर-दूर और बहुत दूर तक आतंकवाद से कोई रिश्ता नहीं है। इसमें कहीं नहीं कहा गया है कि गैर-मुस्लिमों की गर्दनें काटो।

कुरआन को वैश्विक स्तर पर जिस तरह से बदनाम किया जा रहा है, उसके बाद मेरे मन में यह सवाल उठा कि इस किताब की असलियत क्या है। मैंने इसे पढ़ा और इसकी हकीकत जानने की कोशिश की। यहां मैं किसी भी तरह की विद्वता का दावा नहीं कर रहा और यह भी नहीं कह रहा कि दुनिया में सिर्फ मैं ही सही हूं।

मैं अपने नजरिए से सच बयान कर रहा हूं। भाइयों-बहनों, मैंने कुरआन को पढ़कर जाना कि इस किताब पर लगाए जा रहे तमाम आरोप झूठे हैं। मुझ पर यकीन कीजिए, मैं बिल्कुल सच कह रहा हूं।

यह पुस्तक एक साथ नहीं उतरी थी, बल्कि 23 साल की अवधि में भिन्न-भिन्न अंशों के रूप में परमात्मा की ओर से धरती पर भेजी गई थी। फरिश्ते जिब्रील के जरिए यह पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल.) तक आती और इसका संकलन किया जाता।

कुरआन को लेकर लोगों में सबसे बड़ी गलतफहमी है इसका सही संदर्भ मालूम न होना। वे जल्दबाजी में इसके शब्द तो पढ़ लेते हैं लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करते कि यह किस संदर्भ में है, इसका सही-सही मतलब क्या है।

यहीं से दूसरी गलतियां पैदा होती हैं और गलतियों का सिलसिला शुरू हो जाता है। एक गलती दूसरी गलती को जन्म देती है और उनसे भ्रमित होकर लोग कहते हैं कि कुरआन आतंकवाद को बढ़ावा देता है। मैं इसके लिए आपकी जिंदगी के तीन उदाहरण दूंगा। यकीनन इसके बाद आपकी गलतफहमी दूर हो जाएगी।

एक वाक्य है- जाते कहां हो बेटा? मेरे पास आओ।

अगर आपकी मां हाथ में मिठाई लिए हो और यह वाक्य आपसे कहे तो इसका क्या मतलब निकालेंगे? आप खुशी-खुशी उनके पास जाएंगे और बेखौफ होकर मिठाई लेंगे।

यह एक संदर्भ हुआ। अब दूसरा संदर्भ लीजिए। आप मंदिर, चर्च या मस्जिद में गए। वहां पुजारी जी, फादर या मौलवी साहब आपसे कहें – जाते कहां हो बेटा? मेरे पास आओ। तब इस वाक्य का आप क्या मतलब निकालेंगे? मेरे खयाल से आप समझेंगे कि ये हमें किसी बात पर चर्चा के लिए बुला रहे हैं। आपको बिल्कुल भी डर नहीं लगेगा।

अब तीसरा संदर्भ लीजिए। मान लीजिए कि आपके पास एक करोड़ रुपए हैं। आप अंधेरी रात व सुनसान रास्ते से सफर कर रहे हैं। तभी कोई डाकू आप पर बंदूक तानकर कहे – जाते कहां हो बेटा? मेरे पास आओ।

मैं पूछता हूं – ऐसे हालात में आप क्या महसूस करेंगे और इन शब्दों का क्या मतलब निकालेंगे? शब्द वहीं हैं, लेकिन संदर्भ बदल जाने से उनका पूरा मतलब बदल गया।

आज ऐसा ही कुरआन के साथ हो रहा है। कुरआन तो उस मां के बुलावे की तरह है जहां सबके लिए प्रेम है, किसी के लिए खौफ नहीं है। वहीं, आईएसआईएस वाले तीसरे नंबर के वे डाकू हैं जो बंदूक दिखाकर वही शब्द बोलते हैं लेकिन उनके मायने और मतलब बिल्कुल अलग हैं।

यही वे लोग हैं जो कुरआन का गलत मतलब निकालकर बेगुनाह लोगों की गर्दन पर छुरी चला रहे हैं। कुरआन में ऐसी एक भी आयत नहीं है जो आईएसआईएस व अल-कायदा के काले कारनामों को जायज ठहराए।

कुरआन की आयतों का अगर सही संदर्भ और मतलब न समझा जाए तो लोग अर्थ का अनर्थ कर बैठते हैं। यही आज हो रहा है। कुरआन की सूरह अल-बकरह में साफ-साफ कहा गया है-

… अल्लाह फसाद को पसंद नहीं करता। (205)

… जो व्यक्ति किसी की हत्या करे, बिना इसके कि उसने किसी की हत्या की हो अथवा पृथ्वी पर उपद्रव किया हो, तो जैसे कि उसने संपूर्ण मानवता की हत्या कर डाली और जिसने एक जान को बचाया, तो संपूर्ण मानवता को बचा लिया। (5: 32)

इसी तरह सूरह आल इमरान में कहा गया है –

प्रत्येक व्यक्ति को मृत्यु का स्वाद चखना है और तुमको संपूर्ण बदला तो मात्र कयामत के दिन मिलेगा। अतः जो व्यक्ति आग से बच जाए और जन्नत में पहुंचा दिया जाए, वास्तव में वही सफल रहा और संसार का जीवन तो मात्र धोखे का सौदा है। (3:185)

यह मेरी सबसे पसंदीदा आयत है। आप इसे एक बार फिर पढ़िए। इसमें जिन बातों पर जोर दिया गया है, वे हैं- कयामत के दिन पर भरोसा, परमात्मा के इन्साफ पर भरोसा, नेक कामों पर जोर ताकि इन्सान नर्क की आग से बचे, लौकिक सफलता असली सफलता नहीं है।

यह आपकी मौत के साथ खत्म हो जाएगी और यह भी हो सकता है कि मौत तक आपके साथ ही न रहे, लेकिन ऐसी सफलता जो मौत के बाद काम आए। कुरआन इस पर खास जोर देता है।

ध्यान रखिए, मौत के बाद सफलता तभी मिलती है जब इन्सान जिंदा रहते नेक काम करे। अगर जिंदगी खोटे कारनामे करते गुजार दी तो यह धोखे का सौदा नहीं तो और क्या है!

जो किताब जीवन दर्शन की इतनी गहरी बात कहे उस पर यह आरोप लगाना कि वह आतंक को बढ़ावा देती है, सरासर गलत है। परमात्मा कुरआन की कई आयतों में कहता है कि उसे बिगाड़, फसाद और बदमाशी बिल्कुल पसंद नहीं है। ऐसे लोगों के लिए परलोक में कठोर दंड है और वे उससे बच नहीं सकेंगे।

धरती पर आप बादशाह, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति तक बन सकते हैं लेकिन मौत के बाद का कानून आपके सात खून माफ नहीं करेगा। अगर मैंने या आपने गुनाह किया है, धरती पर फसाद किया है तो यकीनन उसका दंड मिलकर रहेगा।

और रही बात हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की तो मैं बदगदादी और उसके सभी साथियों को चुनौती देता हूं कि वे ऐसी कोई एक घटना ढूंढ़कर बता दें, जब अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने अपने लिए विजय अभियान चलाया हो। मक्का में उन पर मुसीबतों पर मुसीबतें आती रहीं, मगर उन्होंने शस्त्र उठाने, मारकाट मचाने की बात कभी नहीं की।

उन्हें अबू-लहब से अपमान मिला, लेकिन उन्होंने उसकी भी इज्जत की। अबू-जहल उन पर पत्थर फेंकता था, लेकिन वे उसे माफ करते रहे। उम्मे-जमील उन्हें गालियां देती थी, लेकिन उन्होंने उसे कभी कठोर शब्द नहीं कहे। यहां तक कि जब पूरा अरब उनके कदमों में था, तब भी उन्होंने किसी पर जुल्म नहीं किया।

उन्होंने युद्ध किए थे, लेकिन सिर्फ आत्मरक्षा के लिए। कभी जीत का जश्न मनाने के लिए रणभूमि में लहू नहीं बहाया। चाहते तो मक्का के विरोधियों के सिर कलम करवा सकते थे, लेकिन उन्होंने फरमाया- जाओ, तुम आजाद हो।

इस पोस्ट के जरिए मेरा मकसद इस सच को सामने लाना है कि कुरआन में कहीं भी आतंकवाद को सही नहीं बताया गया है। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन का एक भी अध्याय ऐसा नहीं, जो मानवता विरोधी हो।

कुरआन की जिन आयतों को लोग आतंक से जोड़कर देखते हैं उनका जिक्र अगली पोस्ट में करूंगा। मैं आपका काफी वक्त ले चुका। अब मुझे इजाजत दीजिए।

चलते-चलते आईएसआईएस के खलीफा अबू-बक्र अल बगदादी के नाम यह संदेश छोड़कर जा रहा हूं कि वह कुरआन का सही मतलब समझे, जिहाद का सही मकसद जाने।

जिन बेगुनाह लोगों की हत्या कर वह और उसके लोग जन्नत का खाब देख रहे हैं वहां उनके लिए सिवाय आग के कुछ नहीं है। आखिर बेगुनाह लोगों की कब्र खोदकर तुम किस जन्नत में जाओगे बगदादी?

– राजीव शर्मा (कोलसिया) – 

 


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