hajiali759

क्या मर्द व औरत बराबर हैं? मैं कहूंगा – नहीं। ये बराबर हो ही नहीं सकते। औरत का दर्जा हर दर्जे से ऊंचा है। अगर मेरे सामने एक ओर दुनिया के शहंशाह का तख्त हो तथा दूसरी तरफ मेरी मां की गोद हो तो मैं हर बार मेरी मां के पास जाना चाहूंगा। मां के बदले तख्त मिले या ताज, मैं हर चीज को ठोकर मार दूंगा।

इसके लिए मुझे किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मेरा खुदा कहता है कि मां के कदमों तले जन्नत है। मेरी रामायण कहती है कि श्रीराम ने लंका फतह की और वहां की हर चीज उनके कदमों में पड़ी थी। फिर भी उन्होंने लंका का राज लेना मंजूर नहीं किया। चाहते तो अपनी सेना के साथ विश्वविजय के लिए निकल जाते। किस बादशाह में इतनी हिम्मत थी कि उनका रास्ता रोक लेता? पर उन्हें हिंदुस्तान की मिट्टी और अपनी मां की गोद से इतनी मुहब्बत थी कि जीत में मिली जमीन और हर माल छोड़कर आ गए।

हजरत मुहम्मद (सल्ल.) को एक से ज्यादा माताओं की गोद में खेलने का सौभाग्य मिला। मां आमिना ने उन्हें जन्म दिया तो हलीमा ने उन्हें दूध पिलाया। जिस नबी (सल्ल.) का भाषण लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता था, उन्होंने बोलना तो मां हलीमा की गोद में ही सीखा था।

महान लोगों की जिंदगी से मैं सिर्फ ये दो उदाहरण दे रहा हूं। ये बताने के लिए काफी हैं कि मर्द व औरत का हर रिश्ता बहुत पाक और बहुत ऊंचा है। उस रिश्ते में औरत का स्थान मर्द से कहीं कम नहीं, क्योंकि उसकी जिम्मेदारी ज्यादा हैं। एक मर्द अगर गलती कर दे तो उसका परिवार मुसीबत में पड़ सकता है लेकिन एक औरत अगर गलती कर दे तो पूरी दुनिया मुसीबत में पड़ सकती है।

आज जब मैं मीडिया में महिला अधिकारों को लेकर विचित्र किस्म का शोर सुन रहा हूं तो बड़ी निराशा होती है, बहुत दुख होता है। महिला अधिकारों के नाम पर यह किस कथा का कांड रचा जा रहा है? मुझे हर सुधार से पूरी सहानुभूति है। बात जब महिला अधिकारों की हो तो मैं हर कीमत पर उसका समर्थन करूंगा, पर आंदोलन के नाम पर अगर आप बखेड़ा करें, महिलाओं को गुमराह करें तो मैं इसे बदमाशी कहूंगा।

एक हैं बहनजी तृप्ति देसाई। इनकी जिद है कि इन्हें हर देवालय में जाने दिया जाए। मैं उनकी इस मांग का पुरजोर समर्थन करता हूं। महिलाओं को मंदिर में जाने का बराबर हक है लेकिन मंदिर कोई आम जगह तो नहीं है। हमें शास्त्रीय मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए। यह नियम सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं पुरुषों पर भी लागू हो।

तृप्ति हाजी अली दरगाह में जबरन घुसना चाहती हैं। यह मान न मान, मैं तेरा मेहमान की जिद मुझे समझ में नहीं आई। अगर आप हाजी अली दरगाह में जाना चाहती हैं तो पहले उस शख्सियत को जानिए। मैंने बाबा हाजी अली के बारे में पढ़ा था कि वे बहुत संयमी, बड़े तपस्वी थे।

चलते तो नजरें झुकाकर। पराई औरत के करीब जाना तो दूर उन्होंने कभी नजर उठाकर उसकी ओर नहीं देखा। यही कारण है कि उनकी सगी बहन हिंदुस्तान आई थीं। अगर किसी औरत से कोई बात कहनी हो तो यह काम उनकी बहन ही किया करती थीं।

अब मेरे कुछ मित्र कह सकते हैं कि हाजी अली पुरानी सोच के आदमी थे। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। महिलाओं को भी उनके करीब आने का मौका देना चाहिए था। मैं कहता हूं, हाजी अली की इस इच्छा का हमें सम्मान करना चाहिए। यह उनकी मर्जी थी। उन्हें ऐसे ही रहना पसंद था, इसलिए उन्हें अब भी ऐसे ही रहने दिया जाए।

हाजी अली जैसे संत उन हजारों बाबाओं से कई गुना अच्छे हैं, जो रंगीन मिजाज हैं, जो धर्म के नाम पर रास रचाते हैं। तृप्ति देसाई अगर वास्तव में महिला अधिकारों की चिंता करती हैं तो वे उनकी शिक्षा को लेकर आंदोलन करें। इसमें लोग उनका साथ देंगे, मैं भी उनका साथ दूंगा।

मैं महिलाओं से पूछना चाहता हूं- आप पुरुषों के बराबर क्यों आना चाहती हैं? आप उनसे बड़ी बनने की कोशिश कीजिए। आप शिक्षा प्राप्त कीजिए। अगर डॉक्टर बनें तो इतनी काबिल कि औरत क्या हर मर्द आपसे जीवनदान मांगे।

पायलट बनें तो इतनी काबिल कि हवाईजहाज में हर मर्द हजारों मीटर की ऊंचाई पर खुद को सुरक्षित महसूस करे। अगर कारोबार करें तो इतनी कामयाब बनें कि मर्द आपके दफ्तर में नौकरी करना चाहें, उनका परिवार खुशहाल बने। अगर सैनिक बनें तो ऐसी कि आपके नाम से दुश्मन कांपे और जज बनें तो ऐसी कि आपके दर पर हर कोई इन्साफ मांगे।

आप ज्यादा से ज्यादा जोर सीखने पर दीजिए। आधुनिक बनिए, लेकिन विचारों में, तरक्की में, रुतबे में और तालीम में।

यूं कुछ गुमराह महिलाएं बात-बात पर औरतवाद का झंडा उठाकर अजीब किस्म की मांग कर रही हैं। यह आजादी नहीं, बर्बादी और बिगाड़ का तमाशा है। उनके सुर में सुर मत मिलाइए। तस्लीमा नसरीन बनने का शौक मत पालिए। ये खुद अपना घर नहीं बना सकीं, दूसरों का उजाडऩे पर तुली हैं। इनके जैसी बनने का खाब मत देखिए। बनना है तो कल्पना चावला, लक्ष्मी बाई, कैप्टन लक्ष्मी सहगल, इंदिरा गांधी जैसी बनिए। फातिमा अल-फिहरी से प्रेरणा लीजिए।

मैं मर्दों से कहूंगा कि उन्हें किसी भी किताब ने यह हक नहीं दिया कि वे औरतों पर जुल्म या ज्यादती करें। अगर वे ऐसा करते हैं तो संभल जाएं, सुधर जाएं, वर्ना उनकी पीढिय़ां इसकी सजा पाएंगी। औरतों से भी यह कहना चाहूंगा कि औरत होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं कि आप खुद को कमजोर समझें, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि आप सही-गलत में फर्क न करना चाहें।

अगर लडऩा है तो शिक्षा के लिए लडि़ए। आपको स्कूल-कॉलेज न भेजा जाए तो इसका विरोध कीजिए। अगर शादी में लड़का दहेज मांगे तो उसकी बारात बैरंग लौटा दीजिए। अगर लड़का व्यभिचारी, शराबी, जुआरी है तो रिश्ता ठुकरा दीजिए। अभी कई लड़ाइयां बाकी हैं, कई इम्तेहान अधूरे हैं। लडऩा है तो इनसे लडि़ए। यूं दरगाह और देवालय को कुश्ती का अखाड़ा बनाकर शायद तृप्ति देसाई जीत जाए, लेकिन यह आपकी हार होगी, क्योंकि ऐसे मुद्दों से कुछ हासिल नहीं होगा।

– राजीव शर्मा –

गांव का गुरुकुल से


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