– बरसों पुराना दस्तूर –

उसके पास मेहनत के अलावा और कोई पूंजी नहीं थी। जब काम करता तो घड़ी की ओर भी न देखता। उसने सदा वफादारी की, क्योंकि वह जानता था कि कारखाने का मालिक चाहे उसे न देखे, लेकिन रब उसे देख रहा है। महीना भर काम के बाद जब वह मजदूरी लेने पहुंचा तो कारखाने के मनीम ने उसके पैसे काट लिए। पूछने पर बताया – यह तो यहां का बरसों पुराना दस्तूर है।

वह लाचार होकर रपट लिखाने थाने गया, मगर वहां उसकी फरियाद सुनने वाला कोई न था। लौटते वक्त एक पुलिस वाला मिला। उसने उसकी जेबें टटोलीं। बोला – कुछ देकर जाओ, यह तो यहां का बरसों पुराना दस्तूर है। थाने से लुटने के बाद वह इन्साफ के लिए अदालत गया। उसका ग़म भारी था और जेब बहुत हल्की। वहां कानून की देवी मिली जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी थी। वह वकीलों के एक झुंड की ओर गया। इस उम्मीद में कि शायद यहां इन्साफ मिल जाए। वहां बताए गए उसे कुछ कानून-कायदे और खूब मिले सुनहरे वायदे। जब लौटना चाहा तो आवाज आई – जाते कहां हो? हमें भी कुछ देकर जाओ। यह तो यहां का बरसों पुराना दस्तूर है।

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उसकी जेब कुछ और हल्की हो गई। वह अपने हक के लिए दिल्ली गया क्योंकि मुल्क के बादशाह से गुहार लगाना चाहता था। मगर अफसोस! बादशाह के महल में उसे किसी ने घुसने ही न दिया। उसे अब भूख लगी थी। कुछ खाने के लिए एक छोटे-से ढाबे पर गया। जेब टटोली तो मालूम हुआ एक रुपया भी न था। कोई जेब कतरा अपनी करामात दिखा गया। ढाबे वाला बड़ा रहमदिल था। बोला – जेब कट गई तो दिल छोटा न कर मेरे भाई। खाना खा ले और वापसी का किराया मुझसे लेता जा।

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उसकी आंखों में आंसू आ गए। बोला – खाना तो बाद में खा लूंगा। पहले एक जरूरी काम पूरा कर लूं। वहां मौजूद भीड़ ने देखा, उसके कदम एक मस्जिद की ओर बढ़ रहे थे। लोगों ने पूछा – कहां जा रहे हो?

जवाब मिला – मैं रब से मेरे मुल्क के बादशाह की शिकायत करने जा रहा हूं।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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