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अख़लाक़ अहमद उस्मानी

राहुल गाँधी में कांग्रेस ही नहीं आम भारतीय अब भी राजीव गाँधी की झलक ढूँढते हैं। उनकी तलाश बेज़ा नहीं है। कहीं राहुल गाँधी अपने पिता की तरह दीखते हैं तो कभी लगता है वह उनके कई फ़ैसलों को अब वैसा नहीं लेते जैसा राजीव के ज़माने में लेना चाहिए था। यानी राहुल गाँधी तकनीक और अपडेशन के मामले में पिता की तरह हैं चाहे अपने पिता के फ़ैसलों को ही क्यों ना बदलना पड़े। राहुल गाँधी की राजनीति में आलोचना की काफ़ी गुंजाइश है मगर फिर भी यह कहा जा सकता है कि राहुल गाँधी बहुत फ़ैसलों में अपने पिता से कहीं अधिक बोल्ड और पार्टी के दूरगामी लाभ के हितार्थ लिए गए फ़ैसलों में अडिग हैं। राहुल अपने पिता पूर्व प्रधानमंत्री और तकनीक प्रेमी राजीव गाँधी के क़ायल हैं लेकिन यह भी जानते हैं कि उन्हें वह ग़लतियाँ नहीं दोहरानी हैं जो उनके पिता और बाद में गाँधी परिवार के हटने पर कांग्रेस में हुईं। वह ग़लतियाँ भी नहीं जो उनकी माता और कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गाँधी से हुईं। राहुल गाँधी की मीडिया के एक वर्ग की तरफ़ से की जाने वाली नकारात्मक रिपोर्टिंग से हटकर देखने वाले मानते हैं कि वह अब काफ़ी परिपक्व हैं, गंभीर बात करते हैं, छिछली राजनीति से दूर रहते हैं। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौतीपूर्ण माने जाने वाले जातीय त्रिकोण यानी दलित, मुसलमान और सवर्ण के प्रति उनकी सोच में काफ़ी वृद्धि हुई है। राहुल गाँधी में राजीव गाँधी का नई तकनीक के प्रति प्रेम, नवीन प्रबंधन नीति, असहज फ़ैसले लेने का साहस और प्रयोगवादिता देखने को मिलती है मगर वह राजीव गाँधी के उस रूप के विपरीत भी हैं जहाँ वह धर्म आधारित राजनीति में नहीं फँसते हैं, कांग्रेस के घोर सेकुलर या काफ़ी हद तक मध्य वाम नीति को बनाकर चल रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि शाहबानो प्रकरण और बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाकर राजीव गाँधी ने कांग्रेस को मध्य वाम से मध्य दाएँ की जिस राजनीति की तरफ़ मोड़ा था, वही भारतीय जनता पार्टी, देश में हिन्दूवादी ब्राह्मणवादी, पुरोहितवादी राजनीति का सर्जक था जिसकी क़ीमत कांग्रेस आज भी उठा रही है। राहुल गाँधी ने इस बीच अपने अध्ययन को काफ़ी सम्पन्न किया है और सख़्ती के साथ पार्टी और अपनी युवा टीम को मध्य वाम नीति की तरफ़ ले आए हैं।

लेफ़्ट टू सेंटर की ओर

राजीव गाँधी के राजनीतिक यश में भारत में कम्प्यूटर और तकनीक को लॉन्च करने का रहा है लेकिन उनके दो फ़ैसलों को लेकर कांग्रेस पार्टी की गत को आज भी नहीं सुधारा जा सकता। हालांकि इसके पीछे राजीव गाँधी की मंशा कांग्रेस के जनाधार को बढ़ाना था लेकिन राजीव गाँधी शायद भूल गए कि बात क़ाबू से निकलने पर उसका ख़मियाज़ा भी उठाना पड़ता है। शाहबानो प्रकरण में मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बरक्स गुज़ारा भत्ता क़ानून बनाने से हिन्दूवादी ताक़तों को बल मिला और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय जनता पार्टी को नया शब्द देकर उसे हवा देने को कहा- ‘तुष्टिकरण’। यह तुष्टिकरण मुसलमानों को ख़ुश करने के नाम पर दी गई संज्ञा थी जिसका मतलब था जातीय आधार पर बँटे हिन्दुओं को संघ संचालित सवर्ण हिन्दू लीडरशिप के अधीन लाना। शाहबानो प्रकरण में संघ और भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के प्रति यह कह कर ख़ूब प्रचार किया कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है। राजीव गाँधी ने 1984 में प्रधानमंत्री बनने के एक साल बाद शाहबानो मामले में पहले क़ानून बनवाया और अगले ही साल यानी 1986 में बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाकर विश्व हिन्दू परिषद् की उस माँग को पूरा करने की कोशिश की। यही नहीं 1991 में राजीव गाँधी ने अपने चुनाव प्रचार की शुरूआत अयोध्या से की और इसे रामराज्य की स्थापना की शुरूआत बताया। राजीव गाँधी समाजवादी सेकूलर राजनीति की बजाय कांग्रेस को सेंटर टू राइट पर ले जा रहे थे। राजीव गाँधी सोचते थे कि 1985 में शाहबानो के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को लेकर उन्होंने जो मुस्लिम परस्ती दिखाई है वह हिन्दू समुदाय में कांग्रेस की साख को घटा सकती है लेकिन इसे ठीक करने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाना कितना महँगा पड़ सकता है, यह 2014 के लोकसभा चुनावों में 44 लोकसभा सीटों पर सिमटी कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को बहुत बेहतर पता है।

राहुल गाँधी अपने पिता की धार्मिक राजनीति से कांग्रेस पार्टी को हुए बड़े नुक़सान को बहुत गहरे तक समझते हैं। दस साल मनमोहन सिंह ने कई बार पार्टी लाइन के विरुद्ध काम कर मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को बहुत मौक़े दिए लेकिन पार्टी स्तर पर धार्मिक आधार पर कोई भी अजीब फ़ैसले को राहुल गाँधी ने हमेशा रोका। यही नहीं उन्होंने ना सिर्फ़ धार्मिक आधार पर पहचान वाले लोगों के लिए पार्टी में नो एंट्री का बोर्ड लगवाया। सूत्र बताते हैं कि असम में कट्टर छवि के मुस्लिम नेता और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता बदरुद्दीन अजमल को कांग्रेस ज्वाइन करने से राहुल गाँधी ने रोका। असम में बेशक मुस्लिम वोटों का पार्टी को नुक़सान हुआ और हो सकता है इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसकी क़ीमत भी पता चले लेकिन राहुल गाँधी ने तय कर रखा है कि कांग्रेस को अपनी दादी इंदिरा की ‘लेफ़्ट टू सेंटर’ की तरफ़ ही ले जाना होगा। यही कांग्रेस पार्टी की मूल विचारधारा है। राहुल गाँधी की युवा टीम में धार्मिक पहचान वाले एक भी व्यक्ति की एंट्री नहीं है। वह बात सबसे करते हैं लेकिन पार्टी की ‘लेफ़्ट टू सेंटर पॉलिसी’ के साथ समझौता करने के लिए तैयार नहीं। इसका एक उदाहरण उनकी अप्रैल 2015 की उत्तराखंड की केदारनाथ यात्रा से भी मिलता है जहाँ उन्होंने यात्रा तो की लेकिन किसी ने उन्हें पूजा करते हुए नहीं देखा। वह पुराने सवर्ण कांग्रेसियों के उलट हाथों में कलावा, अंगूठियों, तावीज़, माला और तिलक के बिना ही नज़र आते हैं। कई कांग्रेसी सूत्रों ने इस संवाददाता को बताया कि राहुल गाँधी ने पार्टी के भीतर हिन्दूवादी (ब्राह्मणवादी या पुरोहितवादी) या वहाबी (कट्टर मुस्लिम) राजनीति करने वालों के दायरे को समेटा है और पार्टी अध्यक्ष बनने के साथ ही उनका रिटायरमेंट भी पक्का है।

सवर्ण से दूर, पिछड़ों के क़रीब

राजीव गाँधी के टीम में अरुण नेहरू सबसे मज़बूत नेता थे। राजीव गाँधी ने अपनी टीम में माता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की टीम को जगह दी। आर के धवन, माखनलाल फ़ोतेदार, अर्जुन सिंह, अरुण सिंह, सतीश शर्मा, पी. वी. नरसिम्हा राव और विश्वनाथ प्रताप सिंह सभी सवर्ण थे जबकि मुस्लिम, दलित और ईसाई चेहरे के रूप में क्रमश: अहमद पटेल, पी. शिवशंकर और ऑस्कर फ़र्नांडिस और को भी जगह थी। राजीव गाँधी की टीम में सवर्ण सदस्यों का दबदबा था और उनकी सलाह पर पार्टी आज कहाँ हैं यह कांग्रेस बहुत ख़ूब जानती है। आज राहुल गाँधी की टीम में बहुत सवर्ण हैं लेकिन उसमें दलित, आदिवासी, महिला, सिख, मुसलमान और ईसाइयों की तादाद बहुत अधिक है। उनकी टीम लो प्रोफ़ाइल है और रिसर्च पर ध्यान देती है।

वैश्विक लहर के साथ

युवा राजनीति आज विश्व राजनीति का केन्द्र है। कनाडा में युवा जस्टिन पियेरे जेम्स ट्रूडो युवाओं के वोट के आधार पर जीते हैं। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के नेता 67 साल के जैरेमी बर्नार्ड कॉर्बिन और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के 74 साल के उम्मीदवार बर्नी सैंडर्स युवा आधारित राजनीति कर रहे हैं। युवा राजनीति में संघर्षशीलता, सबको साथ लेकर चलने की नीयत, पारदर्शिता और जोश की दरकार है। भारत से इस लहर के मुताबिक़ एक की चेहरा है, वह राहुल गाँधी का है। राहुल छात्र संगठन और युवा कांग्रेस को बहुत तवज्जो दे रहे हैं, पार्टी में सभी पदों पर नियुक्ति के लिए अंदरूनी चुनावों को आवश्यक मानते हैं, सभी समुदायों को बराबरी के आधार पर बाँटते हैं, पार्टी में आलोचकों को जगह दी जाती है और निंदकों को पार्टीबदर नहीं किया जा रहा। राहुल गाँधी के अलावा आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी इस लहर के अनुसार नेता कहे जा सकते हैं लेकिन पार्टी से निंदकों, सचेतकों को विदाई, पोस्टर प्रेम, सवर्णों को तवज्जो और अधिनायकवाद की वजह से अरविंद केजरीवाल इस वैश्विक लहर में राहुल गाँधी के क़रीब नहीं ठहरते। जवाँ देश के जवाँ नेता के रूप में 1984 में राजीव गाँधी को देश ने चुना था, अगर राहुल भी उसी पसंद के क़रीब आते हैं तो उन्हें ध्यान रखना होगा कि राजीव गाँधी की प्रगतिशीलता को साथ रखना है और धर्म आधारित राजनीति के नाम पर आत्मघाती प्रयोग नहीं करने हैं। कांग्रेस में राहुल गाँधी की एंट्री के बाद से लग तो यही रहा है कि राहुल गाँधी कांग्रेस के रिफ़ाइंड राजीव गाँधी हैं।


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