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हर सवाल जवाब मांगता है। यह अलग बात है कि कभी-कभी जवाबों में भी कई सवाल छुपे होते हैं। यह जरूरी तो नहीं कि जिंदगी में जो देखा जाए, वह हरदम याद ही रहे। कुछ बातें बीत जाती हैं मगर कई यादें दिल के एक कोने में हमेशा महफूज रहती हैं।

मेरे पास ऐसी बेहिसाब यादें हैं। इतनी कि आप मेरे पास बैठें तो पूरा दिन बीत जाए, मगर बातों की यह बारात कभी विदा नहीं होगी। मेरे पास ऐसे कई सवाल हैं, जिनका आज तक मैंने किसी से जवाब नहीं मांगा।

शायद इस झिझक से कि मेरी समझ पर ही लोग सवाल न उठाने लगें या जवाब देना जरूरी न समझें। आज मैं आपसे सिर्फ दो सवाल पूछूंगा। अगर आप इनके जवाब जानते हैं तो मुझे बताइए, बड़ी मेहरबानी होगी।

1- आजादी का साल यानी 1947 हमें यह हक देकर गया कि अब चाहे तो अपने हाथों अपनी तकदीर बना लें या बिगाड़ लें। आजादी के आंदोलन में कई जानें खप गईं। उन महान लोगों में मैं सबसे ज्यादा महात्मा गांधी और नेताजी सुभाषचंद्र बोस का जिक्र करता हूं।

खासतौर से महात्मा गांधी, जिन्हें नेताजी भी बापू कहते थे। गांधी को करोड़ों लोगों ने अपना नेता माना। उनमें हर धर्म के लोग शामिल थे। मि. जिन्ना की जिद थी कि उन्हें जल्द से जल्द पाकिस्तान दे दिया जाए और वे उसे लेकर ही माने। मैं उन मुसलमानों को निष्ठावान और देशप्रेमी मानता हूं जिन्होंने जिन्ना के बजाय गांधी की बात मानी।

उन्होंने गांधी को अपना नेता स्वीकार किया, जिन्ना को नहीं। उन्होंने जिन्ना के इशारों पर चलने से अच्छा गांधी का हुक्म मानना पसंद किया। मगर अफसोस, आज कुछ लोग भारत के मुसलमानों से उनकी देशभक्ति का प्रमाण पत्र मांगते हैं।

आपको इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तान के नहीं बल्कि हिंदुस्तान के परचम को सलाम करना, उसकी छाया तले जीना और यहां की मिट्टी में दफ्न होना पसंद किया।

देशभक्ति का यह प्रमाण उस समय दिखाना और ज्यादा जरूरी हो जाता है जब भारत और पाकिस्तान का मैच हो। अब साहब हर कोई हनुमानजी तो नहीं हो सकता कि वह छाती फाड़कर दिखा दे और कहे- आइए और देख लीजिए कि मेरे दिल में क्या है!

आपको पाकिस्तान से समस्या है तो उससे झगड़ा कीजिए। देश का बंटवारा उन लोगों ने किया था। पाकिस्तान उन लोगों को चाहिए था। उन लोगों की दुश्मनी यहां के लोगों के साथ क्यों? आप पाकिस्तान को जो कहना चाहते हैं, कह दीजिए। एक बार नहीं हजार बार कहिए, मगर यूं बात-बात पर देशभक्ति का सबूत मांगना बंद कीजिए।

अगर किसी मुस्लिम पर गुनाह साबित हो जाए तो उसे वही सजा दीजिए जो भारत का कानून कहता है। अगर उसका गुनाह माफी के लायक नहीं तो उस पर कोई रहम मत कीजिए। सरेआम फांसी पर लटका दीजिए, लेकिन हर दाढ़ी, हर टोपी और हर बुर्के को शक की निगाह से देखना बंद कीजिए। मेरा सवाल है, जो भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए, लोग उन्हें गद्दार कहते हैं लेकिन जो भारत में रह गए, उन्हें वफादार क्यों नहीं कहते?

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2- हमारे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में किसी न किसी बात को लेकर भेदभाव मौजूद है। अगर अफ्रीका से कोई व्यक्ति यहां आ जाए तो उसके रंग को लेकर लोग ऐसे बर्ताव करते हैं, जैसे कि वह बेचारा किसी चिडिय़ाघर से बाहर आ गया। भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है।

मैं ब्राह्मण परिवार से हूं और ब्राह्मणों को लेकर कई किताबों-पत्रिकाओं में मैंने पढ़ा है कि ये बहुत जालिम होते हैं। इन्होंने लोगों के कानों में गर्मागर्म शीशा पिघलाकर भरा, बहुत जुल्म किए।

मैंने मेरे परिवार से इसकी खोजबीन शुरू की। क्या हमने किसी इन्सान पर जुल्म के पहाड़ तोड़े, उसके कान में गर्मागर्म शीशा भरा? मुझे मेरे पिछले 10 पुरखों में ऐसा कोई नहीं मिला। वे सभी बहुत नेक और धर्मपरायण लोग थे। मैंने मेरे दादा को देखा है, वे बहुत सज्जन थे। मुझे याद नहीं आता कि उन्होंने बाहर किसी व्यक्ति से झगड़ा भी किया हो। मैं यह कैसे मान लूं कि मेरे पुरखों ने किसी पर जुल्म किया था?

कई बार मेरा सामना ऐसे बौद्धिक लोगों से हुआ जिनका कहना है कि ब्राह्मण ही देश के असल गुनहगार हैं। उन्होंने मुझे हिकारत की नजर से देखा, मानो सब समस्याओं की जड़ मैं ही हूं। अगर आपको लगता है कि ब्राह्मणों ने देश को बर्बाद किया है तो उन गुनहगाहरों को पकडि़ए, जेल में डालिए, सबूत जुटाइए और मुकदमा चलाइए।

उनका बदला आप मुझसे क्यों ले रहे हैं? मुझे सिर्फ उसी गुनाह की सजा दीजिए जो मैंने किया है। किसी और का गुस्सा मुझ पर क्यों? आज देश में एक लहर चल पड़ी है, ऐसे विचारक पैदा हो गए हैं जो किसी दाढ़ी वाले को देखकर उसे आतंकी का तमगा दे देते हैं तो किसी तिलक वाले को देखकर उसे ढोंगी घोषित कर देते हैं। कोई व्यक्ति किसी जाति या वंश में जन्म लेने से अच्छा नहीं हो जाता, लेकिन इसी से वह बुरा भी नहीं हो जाता।

मुझे एक घटना याद आती है। स्कूली दिनों में एक बार किसी छात्रवृत्ति का जिक्र हुआ था। मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी। मैं कई किताबें खरीद नहीं पाया था। जब लिपिक ने कक्षा के बच्चों को बुलाया तो मुझे भी उम्मीद बंधी कि शायद अगला नाम मेरा पुकारा जाएगा, लेकिन मुझे नहीं बुलाया गया।

उन बच्चों को बुलाया गया जिनके बाप करोड़पति थे, जो दिन में स्कूल आते और रात को कहीं बैठकर शराब पीते। मैंने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि नहीं चाहिए मुझे यह भीख। मैं अपने दम से आगे बढूंगा। मैंने अधूरी किताबों से पढ़ाई की और क्लास में टॉप किया। मैं हमेशा अव्वल आया।

आप मानें या न मानें, लेकिन मेरा अनुभव है कि भारत में ब्राह्मण के घर जन्म लेना बहुत मुसीबतों भरा है। अगर आप ब्राह्मण हैं तो आपको अक्सर उन गुनाहों का जिम्मेदार ठहराया जाता है जो आपने कभी किए ही नहीं।

मेरा सवाल है, अगर गरीबी और भूख जाति देखकर नहीं आतीं तो सरकारी सुविधाएं जाति देखकर क्यों दी जाती हैं? यह हर उस व्यक्ति को क्यों नहीं दी जातीं जो जरूरतमंद है? बाकी सवाल फिर कभी पूछूंगा।

– राजीव शर्मा –

गांव का गुरुकुल से


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