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प्रिय प्रधानमंत्री जी,

मैं अभी-अभी चार दिन की यात्रा के बाद जम्मू-कश्मीर से लौटा हूं। चारों दिन मैं कश्मीर वादी में रहा और मुझे ये लगा कि मैं आपको वहां के हालात से अवगत कराऊं। हालांकि आपके यहां से पत्र का उत्तर आने की प्रथा समाप्त हो गई है, ऐसा आपके साथियों का कहना है, लेकिन फिर भी इस आशा से मैं ये पत्र भेज रहा हूं कि आप मुझे उत्तर दें या न दें, लेकिन पत्र को पढ़ेंगे अवश्य। इसे पढ़ने के बाद अगर आपको इसमें जरा भी तथ्य लगे, तो आप इसमें उठाए गए बिंदुओं के ऊपर ध्यान देंगे। ये मेरा पूरा विश्‍वास है कि आपके पास जम्मू-कश्मीर को लेकर खासकर कश्मीर घाटी को लेकर जो खबरें पहुंचती हैं, वो सरकारी अधिकारियों द्वारा प्रायोजित खबरें होती हैं उन खबरों में सच्चाई कम होती है। यदि आपके पास कोई ऐसा तंत्र हो, जो घाटी के लोगों से बातचीत कर आपको सच्चाई से अवगत कराए तो मेरा निश्‍चित मानना है कि आप उन तथ्यों को अनदेखा नहीं कर पाएंगे।

मैं घाटी में जाकर विचलित हो गया हूं। जमीन हमारे पास है क्योंकि हमारी सेना वहां पर है, लेकिन कश्मीर के लोग हमारे साथ नहीं हैं। मैं पूरी जिम्मेदारी से ये तथ्य आपके सामने लाना चाहता हूं कि 80 वर्ष की उम्र के व्यक्ति से लेकर 6 वर्ष तक के बच्चे के मन में भारतीय व्यवस्था को लेकर बहुत आक्रोश है। इतना आक्रोश है कि वो भारतीय व्यवस्था से जुड़े किसी भी व्यक्ति से बात नहीं करना चाहते हैं। इतना ज्यादा आक्रोश है कि वो हाथ में पत्थर लेकर इतने बड़े तंत्र का मुकाबला कर रहे हैं। अब वो कोई भी खतरा उठाने के लिए तैयार हैं जिसमें सबसे बड़ा खतरा नरसंहार का है।

ये तथ्य मैं आपको इसी उद्देश्य को सामने रखकर लिख रहा हूं कि कश्मीर में होने वाले शताब्दी के सबसे बड़े नरसंहार को बचाने में आपकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। हमारे सुरक्षा बलों में, हमारी सेना में ये भाव पनप रहा है कि जो भी कश्मीर में व्यवस्था के प्रति आवाज उठाता है, उसे अगर समाप्त कर दिया जाए, तो ये अलगाववादी आंदोलन समाप्त हो सकता है। व्यवस्था जिसे अलगाववादी आंदोलन कहती है, दरअसल वो अलगाववादी आंदोलन नहीं है, वो कश्मीर की जनता का आंदोलन है। अगर 80 वर्ष के वृद्ध से लेकर 6 वर्ष का बच्चा तक आजादी, आजादी, आजादी कहे, तो मानना चाहिए कि पिछले 60 वर्षों में हमसे बहुत बड़ी चूक हुई है और वो चूकें जान-बूझकर हुई हैं। इन चूकों को सुधारने का काम आज इतिहास ने, समय ने आपको सौंपा है। आशा है आप कश्मीर की स्थिति को तत्काल नए सिरे से जानकर अपनी सरकार के कदमों का निर्धारण करेंगे।

प्रधानमंत्री जी, कश्मीर में पुलिसवालों से लेकर, वहां के व्यापारी, छात्र, सिविल सोसायटी के लोग, लेखक, पत्रकार, राजनीतिक दलों के लोग और सरकारी अधिकारी, वो चाहे कश्मीर के रहने वाले हों या कश्मीर के बाहर के लोग जो कश्मीर में काम कर रहे हैं, सबका ये मानना है कि व्यवस्था से बहुत बड़ी भूल हुई है। इसलिए कश्मीर का हर आदमी भारतीय व्यवस्था के खिलाफ खड़ा हो गया है। जिसके हाथ में पत्थर नहीं है उसके मन में पत्थर है। ये आंदोलन जन आंदोलन बन गया है, ठीक वैसा ही जैसे भारत का सन 42 का आंदोलन था या फिर जयप्रकाश आंदोलन था, जिसमें नेता की भूमिका कम थी, लोगों की भूमिका ज्यादा थी।

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कश्मीर में इस बार बकरीद नहीं मनाई गई, किसी ने नए कपड़े नहीं पहने, किसी ने कुर्बानी नहीं दी। किसी के घर में खुशियां नहीं मनीं। क्या ये भारत के उन तमाम लोगों के मुंह पर तमाचा नहीं है, जो लोकतंत्र की कसमें खाते हैं। आखिर ऐसा क्या हो गया कि कश्मीर के लोगों ने त्योहार मनाना बंद कर दिया, ईद-बकरीद मनानी बंद कर दी और इस आंदोलन ने वहां के राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ एक बगावत का रूप धारण कर लिया। जिस कश्मीर में 2014 में हुए चुनाव में लोगों ने वोट डाले, आज उस कश्मीर में कोई भी व्यक्ति भारतीय व्यवस्था के प्रति सहानुभूति का एक शब्द कहने के लिए तैयार नहीं है। मैं आपको स्थितियां इसलिए बता रहा हूं कि पूरे देश का प्रधानमंत्री होने के नाते आप इसका कोई रास्ता निकाल सकें।

कश्मीर के घरों में लोग शाम को एक बल्ब जलाकर रहते हैं। ज्यादातर घरों में ये माना जाता है कि हमारे यहां इतना दुख है, इतनी हत्याएं हो रही हैं, दस हजार से ज्यादा पैलेट गन से लोग घायल हुए हैं, 500 से ज्यादा लोगों की आंखें चली गई हैं, ऐसे समय हम चार बल्ब घर में जलाकर खुशी का इजहार कैसे कर सकते हैं? हम एक बल्ब जलाकर रहेंगे।

प्रधानमंत्री जी, मैंने देखा है कि लोग घरों में एक बल्ब जलाकर रह रहे हैं। मैंने ये भी कश्मीर में देखा कि किस तरह सुबह आठ बजे सड़कों पर पत्थर लगा दिए जाते हैं और शाम के 6 बजे अपने आप वही लड़के जिन्होंने पत्थर लगाए हैं, सड़क से पत्थर हटा देते हैं। दिन में वे पत्थर चलाते हैं, शाम को वे अपने घरों में इस दु:शंका में सोते हैं कि उन्हें कब सुरक्षा बल के लोग आकर उठा ले जाएं, फिर वो कभी अपने घर को वापस लौटें या न लौटें।

ऐसी स्थिति तो अंग्रजों के शासन काल में भी नहीं थी। ये मानसिकता, जितनी हम इतिहास में पढ़ते हैं, सामान्य जन में इतना डर नहीं था, लेकिन आज कश्मीर का हर आदमी, वह हिंदू हो, मुसलमान हो, सरकारी नौकर हो, छात्र हो, बेकार हो, व्यापारी हो, सब्जी वाला हो, ठेले वाला हो या टैक्सी वाला हो, हर आदमी डरा हुआ है और शायद मुझे विश्‍वास नहीं होता है कि क्या हम उन्हें और डराने या और ज्यादा परेशान करने की रणनीति पर तो नहीं चल रहे हैं।

कश्मीर के लोगों में पिछले साठ वर्षों में व्यवस्था की चूक, लापरवाही या आपराधिक अनदेखी की वजह से लोगों को याद आ गया है कि जब कश्मीर को हिंदुस्तान में शामिल करने का समझौता हुआ था, जिसे वो एकॉर्ड कहते हैं, महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच, जिसके गवाह महाराजा हरि सिंह के बेटे डॉ•कर्ण सिंह अभी जिंदा हैं, उसमें साफ लिखा था कि धारा 370 तब तक रहेगी जब तक कश्मीर के लोग अपने भविष्य को लेकर अंतिम फैसला मत संग्रह के द्वारा नहीं कर देते।

A veiled Kashmiri woman walks past a graffiti on a closed shop at a deserted market during a continuing strike in Srinagar, Indian controlled Kashmir, Sunday, Sept. 11, 2016. Kashmir remained under security lockdown and separatist sponsored shutdown after some of the largest protests in recent years were sparked by the killing of a popular rebel commander on July 8. (AP Photo/Mukhtar Khan)

कश्मीर के लोग इस जनमत संग्रह को चार-पांच साल में भूल गए थे। शेख अब्दुल्ला वहां सफलतापूर्वक शासन कर रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री जी भारत के पहले प्रधानमंत्री ने जब शेख अब्दुल्ला को जेल में डाला तब से कश्मीर में भारत के प्रति अविश्‍वास पैदा हुआ। 1974 में शेख अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के बीच एक समझौता हुआ, उसके बाद शेख अब्दुल्ला को दोबारा कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया। शेख अब्दुल्ला पाकिस्तान भी गए और उन्होंने अपना शासन चलाया, लेकिन उन्होंने सरकार से जिन-जिन चीजों की मांग की, सरकार ने वो नहीं किया और फिर कश्मीर के लोगों के मन में दूसरे घाव लगे।

1982 में पहली बार शेख अब्दुल्ला के बेटे फारूक अब्दुल्ला कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े और वहां उन्हें बहुमत हासिल हुआ। शायद दिल्ली में बैठी कांग्रेस कश्मीर को अपना उपनिवेश समझ बैठी थी और उसने फारूक अब्दुल्ला की सरकार गिरा दी। फारूक अब्दुल्ला की जीत हार में बदल गई और यहां से कश्मीरियों के मन में भारतीय व्यवस्था को लेकर नफरत का भाव पैदा हुआ। आपके प्रधानमंत्री बनने से पहले तक दिल्ली में बैठी तमाम सरकारों ने कश्मीर में लोगों को ये विश्‍वास ही नहीं दिलाया कि वो भी भारतीय व्यवस्था के वैसे ही अंग हैं, जैसे हमारे देश के दूसरे राज्य।

कश्मीर में एक पूरी पीढ़ी, जो सन 1952 में पैदा हुई, उसने आज तक लोकतंत्र का नाम ही नहीं सुना, उसने आज तक लोकतंत्र का स्वाद ही नहीं चखा। उसने वहां सेना देखी, पैरामिलिट्री फोर्सेज देखीं, गोलियां देखीं, बारूद देखीं और मौतें देखीं। उसको ये नहीं अंदाज है कि हम दिल्ली में, उत्तर प्रदेश में, बंगाल में, महाराष्ट्र में, गुजरात में किस तरह जीते हैं और किस तरह हम लोकतंत्र की दुहाई देते हुए लोकतंत्र नाम के व्यवस्था का स्वाद चखते हैं। क्या कश्मीर के लोगों का ये हक नहीं है कि वो भी लोकतंत्र का स्वाद चखें, लोकतंत्र की अच्छाइयों के समंदर में तैरें या उनके हिस्से में बंदूकें, टैंक, पैलेट गन्स और फिर संभावित नरसंहार ही आएगा।

प्रधानमंत्री जी, ये बातें मैं आपसे इसलिए कह रहा हूं कि आपको लोगों ने ये बतला दिया है कि कश्मीर का हर व्यक्ति पाकिस्तानी है। हमें कश्मीर में एक भी आदमी पाकिस्तान की तारीफ करता हुआ नहीं मिला। लेकिन उनका ये जरूर कहना है कि आपने जो हमसे वादा किया था, वह पूरा नहीं किया। आपने हमें रोटी जरूर दी, लेकिन थप्पड़ मारते हुए दी, आपने हमें हिकारत से देखा, आपने हमें बेइज्जत किया, आपने हमारे लिए लोकतंत्र की रोशनी न आने देने की साजिश की और इसलिए पहली बार ये आंदोलन आजादी के बाद कश्मीर के गांव तक फैल गया। हर पेड़ पर, हर मोबाइल टावर के ऊपर हर जगह प्रधानमंत्री जी पाकिस्तानी झंडा है और जब हमने पता किया तो उन्होंने कहा कि नहीं हम पाकिस्तान नहीं जाना चाहते हैं, लेकिन आप पाकिस्तान से चिढ़ते हैं, इसलिए हम पाकिस्तानी झंडा लगाते हैं और ये कहने में कश्मीर के बहुत से लोगों के मन में कोई पश्‍चाताप नहीं था।

कश्मीर के लोग भारत की व्ववस्था को, सत्ता को चिढ़ाने के लिए जब भारत की क्रिकेट में हार होती है, तो जश्‍न मनाते हैं वो सिर्फ पाकिस्तान की टीम की जीत पर जश्‍न नहीं मनाते, खुश नहीं होते, अगर हम न्यूजीलैंड से हार जाएं, अगर हम बांग्लादेश से हार जाएं, अगर हम श्रीलंका से हार जाएं, तब भी वो उसी सुख का अनुभव करते हैं। क्योंकि उन्हें ये लगता है कि हम भारतीय व्यवस्था की किसी भी खुशी को नकार कर अपना विरोध प्रदर्शित कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी, क्या इस मनोविज्ञान को भारत की सरकार को समझने की जरूरत नहीं है। कश्मीर के लोग अगर हमारे साथ नहीं होंगे, तो हम कश्मीर की जमीन लेकर क्या करेंगे। कश्मीर की जमीन में कुछ भी पैदा नहीं होता, फिर वहां पर न टूरिज्म होगा, न वहां मोहब्बत होगी, सिर्फ एक सरकार होगी और हमारी फौज होगी।

प्रधानमंत्री जी, कश्मीर के लोग आत्मनिर्णय का अधिकार चाहते हैं, वो कहते हैं कि एक बार आप हमसे ये जरूर पूछिए कि हम भारत के साथ रहना चाहते हैं कि हम पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं या हम एक आजाद देश बनाना चाहते हैं और उसमें सिर्फ भारत के साथ शामिल हुआ कश्मीर नहीं शामिल है। उसमें वो जनमत संग्रह पाकिस्तान के अधिकार में रहने वाले कश्मीर, गिलगिट, बलटिस्तान ये तीनों के लिए जनमत संग्रह चाहते हैं और इसके लिए वो चाहते हैं कि भारत, पाकिस्तान के साथ बातचीत करे कि अगर भारत यहां ये अधिकार देने को तैयार है, तो वो भी यहां पर वो अधिकार दें।

प्रधानमंत्री जी, ये स्थिति क्यों आई, ये स्थिति इसलिए आई कि अब तक संसद ने चार प्रतिनिधिमंडल कश्मीर में भेजे, उन चारों सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों ने जो संसद का प्रतिनिधित्व करते थे, क्या रिपोर्ट सरकार को दी, वो किसी को नहीं मालूम। लेकिन जो भी रिपोर्ट दी हो, उस पर अमल नहीं हुआ। सरकार ने अपनी तरफ से श्री राम जेठमलानी और श्री के सी पंत को वहां पर दूत के रूप में भेजा और इन लोगों ने वहां बहुत से लोगों से बातचीत की, लेकिन इन लोगों ने सरकार से क्या कहा, ये किसी को नहीं पता।

आपके पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इंटरलोकेटर की टीम बनाई थी, जिसमें दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार, एमएम अंसारी थे, इन लोगों ने क्या रिपोर्ट दी, किसी को नहीं पता, उस पर बहुस नहीं हुई, उस पर चर्चा नहीं हुई। जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया कि उन्हें क्या अधिकार चाहिए, उसे कूड़े की टोकरी में फेंक दिया गया।

कश्मीर के लोगों को ये लगता है कि हमारा शासन हम नहीं चलाते, दिल्ली में बैठे कुछ अफसर चलाते हैं, इंटेलीजेंस ब्यूरो चलाती है, सेना के लोग चलाते हैं, हम नहीं चलाते। हम तो यहां पर गुलामों की तरह से जी रहे हैं, जिसे रोटी देने की कोशिश तो होती है, लेकिन जीने का कोई रास्ता उसके लिए खुला नहीं है।

प्रधानमंत्री जी, कश्मीर के लिए जो पैसा एलॉट होता है वो वहां नहीं पहुंचता, पंचायतों के पास पैसा नहीं पहुंचता, कश्मीर को जितने पैकेज मिले, वो नहीं मिले और आपने 2014 में दिवाली कश्मीर के लोगों के बीच बिताई थी, आपने कहा था कि वहां इतनी बाढ़ आई है, इतना नुकसान हुआ है, इतने हजार करोड़ रुपये का पैकेज कश्मीर को दिया जाएगा। प्रधानमंत्री जी, वो पैकेज नहीं मिला है, उसका कुछ हिस्सा स्व•मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद जब महबूबा मुफ्ती ने थोड़ा दबाव डाला, तो कुछ पैसा रिलीज हुआ। कश्मीर के लोगों को ये मजाक लगता है, अपना अपमान लगता है।

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प्रधानमंत्री जी, क्या ये संभव नहीं कि जितने भी संसदीय प्रतिनिधिमंडल अब तक कश्मीर गए, इंटरलोकेटर्स की रिपोर्ट, केसी पंत और श्री राम जेठमलानी के सुझाव तथा और भी जिन लोगों ने कश्मीर के बारे में आपको राय दी हो, आपसे मतलब आपके कार्यालय को अब तक राय दी हो, क्या उन रायों को लेकर हमारे भूतपूर्व प्रधान न्यायाधीशों का एक आठ या दस का ग्रुप बनाकर उनके सामने वो रिपोर्ट नहीं सौंपी जा सकती कि इसमें तत्काल क्या-क्या लागू करना है, उन बिंदुओं को तलाशें। क्या इंटरलोकेटर्स की रिपोर्ट बिना किसी शर्त के लागू कर उस पर अमल नहीं कराया जा सकता, चूंकि ये सारी चीजें नहीं हुईं, इसलिए कश्मीर के लोग अब आजादी चाहते हैं और वो आजादी की भावना इतनी बढ़ गई है प्रधानमंत्री जी, मैं फिर दोहराता हूं, मुझे पुलिस से लेकर, 80 साल के वृद्ध से लेकर, लेखक, पत्रकार, व्यापारी, टैक्सी चलाने वाले, हाउसबोट के लोग और 6 साल का बच्चा तक ये सब आजादी की बात करते दिखाई दिए। एक भी व्यक्ति मुझे ऐसा नहीं मिला, जिसने ये कहा हो कि उसे पाकिस्तान जाना है, उसे मालूम है पाकिस्तान की हालत क्या है और जिन हाथों में पत्थर हैं, उन हाथों को ये पत्थर पकड़ने की ताकत अगर किसी ने दी है, तो ये हमारी व्यवस्था ने दी है।

प्रधानमंत्री जी, मेरे मन में एक बड़ा सवाल है कि क्या पाकिस्तान इतना बड़ा है कि वहां पत्थर चलाने वाले बच्चों को रोज पांच सौ रुपये दे सकता है और क्या हमारी व्यवस्था इतनी खराब है कि अब तक उस व्यक्ति को नहीं पकड़ पाई, जो वहां पांच-पांच सौ रुपये बांट रहा है।

कर्फ्यू है, लोग सड़कों पर नहीं निकल रहे हैं, कौन मोहल्ले में जा रहा है पांच सौ रुपये बांटने के लिए। पाकिस्तान क्या इतना ताकतवर है कि पूरे 60 लाख लोगों को भारत जैसे 125 करोड़ लोगों के देश के खिलाफ खड़ा कर सकता है। मुझे ये मजाक लगता है, कश्मीर के लोगों को भी ये मजाक लगता है। कश्मीर के लोगों को हमारी व्यवस्था के अंग मीडिया से भी बहुत शिकायत है, वो कई चैनलों का नाम लेते हैं जिनको देखकर लगता है कि ये देश में सांप्रदायिक भावना को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसमें कुछ महत्वपूर्ण चैनल अंग्रेजी के हैं और कुछ हिंदी के भी हैं।

मैं मानता हूं कि हमारे साथी राज्यसभा में जाने या अपना नाम पत्रकारिता के इतिहास में प्रथम श्रेणी में लिखवाने के क्रम में इतना अंधे हो गए हैं कि वो देश की एकता और अखंडता से भी खेल रहे हैं। पर प्रधानमंत्री जी, इतिहास निर्मम होता है, वो ऐसे पत्रकारों को देशप्रेमी नहीं देशद्रोही मानेगा, क्योंकि ऐसे लोग जो पाकिस्तान का नाम लेते हैं या हर चीज में पाकिस्तान का हाथ देखते हैं, वो लोग दरअसल पाकिस्तान के दलाल हैं, वो मानसिक रूप से हिंदुस्तान और कश्मीर के लोगों में ये भावना पैदा कर रहे हैं कि पाकिस्तान एक बड़ा सशक्त, बड़ा समर्थ और बहुत विचारवान देश है।

प्रधानमंत्री जी, इन लोगों को जब समझ में आएगा, तब आएगा या नहीं समझ में आए, मुझे उससे चिंता नहीं है। मेरी चिंता भारत के प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर है। नरेंद्र मोदी को इतिहास अगर इस रूप में आंके कि उन्होंने कश्मीर में एक बड़ा नरसंहार करवाकर कश्मीर को भारत के साथ जोड़े रखा, शायद वो आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत दुखद इतिहास होगा। इतिहास नरेंद्र मोदी को इस रूप में जाने कि उन्होंने कश्मीर के लोगों का दिल जीता। उन्हें उन सारे वादों की भरपाई करने का आश्‍वासन दिया, जिन्हें साठ साल से कश्मीरियों को कहा जाता रहा है। कश्मीर के लोग सोना नहीं मांगते, चांदी नहीं मांगते, हीरा नहीं मांगते। कश्मीर के लोग इज्जत मांगते हैं। प्रधानमंत्री जी मैंने जितने वर्गों की बात की, ये सब स्टेक होल्डर हैं।

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प्रधानमंत्री जी, ये सारे लोग स्टेक होल्डर हैं और इनमें हुर्रियत के लोग शामिल हैं। हुर्रियत के लोगों का इतना नैतिक दबाव कश्मीर में है कि वो जो कैलेंडर शुक्रवार को वहां जारी करते हैं, वह हर एक के पास पहुंच जाता है। अखबारों में छपा कि हर एक को उसकी जानकारी हो गई और लोग सात दिन उस कैलेंडर के ऊपर काम करते हैं, वो कहते हैं कि 6 बजे तक बाजार बंद रहेंगे, 6 बजे तक बाजार बंद होते हैं और 6 बजे बाजार अपने आप खुल जाते हैं। प्रधानमंत्री जी, वहां तो बैंक भी 6 बजे के बाद खुलने लगे हैं, जो आपके व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं, वहां पर हमारे सुरक्षाबलों के लोग 6 बजे के बाद नहीं घूमते, 6 बजे के पहले ही घूमते हैं और इसीलिए हमारा कोर कमांडर सरकार से कहता है कि हमें इस राजनीतिक झगड़े में मत फंसाइए।

प्रधानमंत्री जी, ये छोटी चीज नहीं है, हमारी फौज का कमांडर वहां की सरकार से कहता है कि हमें इस राजनीतिक झगड़े में मत फंसाइए। हम सिविलियन के लिए नहीं हैं, हम दुश्मन के लिए हैं।

इसीलिए जहां सेना का सामना होता है, तो वे पत्थर का जवाब गोली से देते हैं। लोगों की मौतें होती हैं, लेकिन सेना की इस भावना को तो समझने की जरूरत है। सेना अपने देश के नागरिकों के खिलाफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की चीज नहीं है। सुरक्षा बल पैलेट गन चलाते हैं, लेकिन उनका निशाना कमर से नीचे नहीं होता है। कमर से ऊपर होता है इसलिए दस हजार लोग घायल पड़े हैं। प्रधानमंत्री जी, मैं कश्मीर के दौरे में अस्पतालों में गया। मुझसे कहा गया कि चार-पांच हजार पुलिसवाले भी घायल हुए हैं। सुरक्षा बलों के लोग घायल हुए हैं। मुझे पत्थरों से घायल लोग तो दिखाई दिए, लेकिन वो संख्या काफी कम थी। ये हजारों की संख्या वाली बात हमारा प्रचार तंत्र कहता है, जिसपर कोई भरोसा नहीं करता और अगर ऐसा है तो हम पत्रकारों को उन जवानों से मिलवाइए जो दो हजार की संख्या में एक हजार की संख्या में घायल कहीं इलाज करा रहे हैं। पर हमने अपनी आंखों से जमीन पर एक-दूसरे से बिस्तर शेयर करते हुए लोगों को देखा, जो घायल थे। हमने बच्चों को देखा जिनकी आंखें चली गईं, जो कभी वापस नहीं आएंगी। इसलिए मैं ये पत्र बड़े विश्‍वास और भावना के साथ लिख रहा हूं और मैं जानता हूं कि आपके पास अगर ये पत्र पहुंचेगा तो आप इसे पढ़ेंगे और हो सकता है कुछ अच्छा भी करें। लेकिन मुझे इसमें शक है कि ये पत्र आपके पास पहुंचेगा इसलिए मैं इसे चौथी दुनिया अखबार में छाप रहा हूं ताकि कोई तो आपको बताए कि सच्चाई ये है।

प्रधानमंत्री जी, एक कमाल की बात आपको बताता हूं। मुझे श्रीनगर में हर आदमी अटल बिहारी वाजपेयी जी की तारीफ करता हुआ मिला। लोगों को सिर्फ एक प्रधानमंत्री का नाम याद है और वो हैं अटल बिहारी वाजपेयी जिन्होंने लाल चौक पर खड़े होकर कहा था कि मैं पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता हूं। उन्हें कश्मीर के लोग कश्मीर की समस्याओं को हल करने वाले मसीहा की तरह याद करते हैं। उन्हें लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी कश्मीर के लोगों का दुख-दर्द समझते थे और उनका आंसू पोछना चाहते थे।

प्रधानमंत्री जी, वो आपसे भी वैसी ही आशा करते हैं, लेकिन उन्हें विश्‍वास नहीं है। उन्हें इसलिए विश्‍वास नहीं है क्योंकि आप सारे विश्‍व में घूम रहे हैं। आप लाओस, चीन, अमेरिका, सऊदी अरब हर जगह जा रहे हैं। दुनिया भर की यात्रा करने वाले आप पहले प्रधानमंत्री बने हैं, पर अपने ही देश के साठ लाख लोग आपसे नाराज हो गए हैं। ये साठ लाख लोग इसलिए नहीं नाराज हुए कि आप भारतीय जनता पार्टी के हैं। इसलिए नाराज हुए कि आप भारत के प्रधानमंत्री हैं और प्रधानमंत्री के दर्द में अपने ही देश के नाराज लोगों के लिए जितना प्यार होना चाहिए वो प्यार अब नहीं दिखाई दे रहा है। इसलिए मेरा आग्रह है कि आप स्वयं कश्मीर जाएं, वहां के लोगों से मिलें, हालात का जायजा लें और कदम उठाएं। निश्‍चित मानिए कश्मीर के लोग इसे हाथों हाथ लेंगे। लेकिन बात आपको वहां कश्मीर के सभी स्टेक होल्डर से करनी होगी। हुर्रियत से भी।

प्रधानमंत्री जी, मेरे साथ अशोक वानखेड़े, जो मशहूर स्तम्भकार हैं और टेलीविजन पर राजनीतिक विश्‍लेषण करते हैं, प्रोफेसर अभय दूबे, ये भी वरिष्ठ राजनीतिक विश्‍लेषक हैं, जो टेलीविजन पर आते रहते हैं और रिसर्च विशेषज्ञ हैं, ये लोग भी साथ थे। और हम तीनों कई बार कश्मीर की हालत देखकर रोए। हमें लगा कि सारे देश में ये भावना फैलाई गई है, योजनापूर्वक एक ग्रुप ने ये भावना फैलाई है कि कश्मीर का हर आदमी पाकिस्तानी है। कश्मीर का हर आदमी देशद्रोही है और सारे लोग पाकिस्तान जाना चाहते हैं। नहीं प्रधानमंत्री जी, ये सच नहीं है। कश्मीर के लोग अपने लिए रोजी चाहते हैं, रोटी चाहते हैं, लेकिन इज्जत के साथ चाहते हैं। वो चाहते हैं कि उनके साथ वैसा ही व्यवहार हो, जैसा बिहार, बंगाल, असम के साथ होता है।

अब प्रधानमंत्री जी, एक चीज और मैंने देखी कि क्या कश्मीर के लोगों को मुंबई के लोगों की तरह, पटना के लोगों की तरह, अहमदाबाद के लोगों की तरह, दिल्ली के लोगों की तरह जीने का या रहने का अधिकार नहीं मिल सकता। हम 370 खत्म करेंगे, 370 खत्म होना चाहिए, इसका प्रचार सारे देश में कर रहे हैं। कश्मीरियों को अमानवीय बनाने का प्रचार कर रहे हैं। लेकिन हम देश के लोगों को ये नहीं बताते कि भारत सरकार का एक निर्णय था कि कश्मीर हमारा कभी अंग नहीं रहा और कश्मीर को जब हमने 47 में अपने साथ मिलाया, तो हमने दो देशों के बीच एक संधि की थी, समझौता किया था। कश्मीर हमारा संवैधानिक अंग नहीं है, लेकिन हमारी संवैधानिक व्यवस्था ने आत्मनिर्णय के अधिकार से पहले धारा 370 दी।

प्रधानमंत्री जी, क्या ये नहीं कहा जा सकता कि हम कभी 370 के साथ छेड़छाड़ नहीं करेंगे और 370 क्या है ? 370 है कि हम कश्मीर पर विदेश नीति, सेना और करैंसी इसके अलावा हम कश्मीर के शासन में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। पर पिछले 65 साल इसके उदाहरण हैं कि हमने, मतलब दिल्ली की सरकार ने, वहां लगातार नाजायज हस्तक्षेप किया।

सेना को कहिए कि वो सीमाओं की रक्षा करे। जो सीमा पार करने की कोशिश करे, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे, जैसा एक आतंकवादी या दुश्मन के साथ होता है। लेकिन लोगों के साथ लोगों को तो दुश्मन मत मानिए। देश के कश्मीर के लोगों को इस बात का रंज है, इस बात का दुख है कि इतना बड़ा जाट आंदोलन हुआ, गोली नहीं चली, कोई नहीं मरा। गुजर आंदोलन हुआ, कोई आदमी नहीं मरा, कहीं पुलिस ने गोली नहीं चलाई। अभी कावेरी को लेकर कनार्र्टक में, बेंगलुरू में इतना बड़ा आंदोलन हुआ, पर एक गोली नहीं चली। क्यों कश्मीर में ही गोलियां चलती हैं और क्यों कमर से ऊपर चलती हैं और छह साल के बच्चों पर चलती हैं ? छह साल का बच्चा प्रधानमंत्री जी वो क्यों हमारे खिलाफ हो गया ? वहां की पुलिस हमारे खिलाफ है।

लोगों का दिल जीतने की जरूरत है और आप इसमें सक्षम हैं। आपने लोगों का दिल जीता इसलिए आप प्रधानमंत्री बने हैं और अकल्पनीय बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने हैं। क्या आप ईश्‍वर द्वारा दी गई, इतिहास द्वारा दी गई, वक्त द्वारा दी गई अपनी इस जिम्मेदारी को निभाएंगे कि कश्मीर के लोगों का भी दिल जीतें और उनके साथ हुए भेदभाव, अमानवीय व्यवहार से निजात दिलाएं। उनके मन में ये भावना भरें कि वो भी विश्‍व के, भारत के किसी भी प्रदेश के वैसे ही सम्माननीय नागरिक हैं, जैसे आप और हम।

मुझे पूरी उम्मीद है कि आप बिना वक्त खोए कश्मीर के लोगों का दिल जीतने के लिए तत्काल कदम उठाएंगे और बिना समय खोए अपने दल के लोगों को अपनी सरकार के लोगों को कश्मीर के बारे में कैसा व्यवहार करना है, इसका निर्देश देंगे। मैं पुन: आपसे अनुरोध करता हूं कि आप हमें उत्तर दें या न दें, लेकिन कश्मीर के लोगों को उनके दुख-दर्द, आंसू कैसे पोंछ सकते हैं, इसके लिए कदम जरूर उठाएं।

(साभार: चौथी दुनिया)

■ वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय , अभय दूबे और अशोक वानखेड़े के काश्मीर दौरे के बाद प्रधानमंत्री को लिखा पत्र ।


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