sheikh imam kaba

पिछले एक पखवारे से बिहार में मुस्लिम बहुल गांवों, कस्बों और शहरों में बस एक ही चर्चा थी. जुबान पर एक ही नाम था-  शेख सालेह अल तालेब. वजह थी कि बीते जुमे को राज्य के लाखों लोगों के दिलों में बस एक ही सपना था कि वे उस मस्जिद के इमाम के पीछे जुमे की नमाज अदा करेंगे जहां हर साल दुनिया भर से 50-55 लाख लोग हज के दौरान नमाज अदा करके खुद को धन्य समझते हैं. काबा की इस मस्जिद में नमाज पढने का सपना कभी पूरा नहीं हो पाता.  लेकिन अगर वही इमाम अरब से पटना की भूमि पर आ जायें तो उन लाखों लोगों के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती थी. इसलिए शेख सालेह अल तालेब की आमद का इंतजार बिहार के लाखों लोगों को था.

भाजपा को किया गया बदनाम

शेख सालेह अल तालेब की यात्रा का मकसद अमन के पैगाम को लाना था. उससे बढ़ कर इबादत का था. यह मजहबी भावनाओं से जुड़ी यात्रा थी. लेकिन इमाम साहब की पूरी यात्रा सियासत की नजर हो गयी. दर असल इस यात्रा के नाम पर कुछ लोगों ने सियासी मकसद पाल रखा था. इस यात्रा के नाम पर अवाम की मजहबी भावनाओं को सियासी कीमत वसूल किये जाने की गुप्त योजना थी. लेकिन आयोजकों ने उनके आगमन के कुछ घंटे पहले यह खबर दी कि इमाम साहब नहीं आ पा रहे हैं क्योंकि उनका वीजा नहीं बन सका है. इतना ही नही नौकरशाही डॉट कॉम को इमारत शरिया के नाजिम अनीसुर रहमान कासमी ने तो यहां तक दावा किया कि भारतीय जनता पार्टी के लोग नहीं चाहते कि इमाम साहब आये इसलिए उनके बीजा में डिले की गयी. हालांकि  यह स्पष्ट रहे कि इमारत शरिया का सीधा सबंध इमामे काबा की यात्रा से नहीं था. फिर भी उन्होंने यह दावा किया. लेकिन इस मामले में नौकरशाही डॉट कॉम ने जो अंदर की जानकारी ली तो जो तथ्य सामने आये वे चौकाने वाले थे.

जमियत उलमाये हिंद को दिया गच्चा

सूत्र बताते हैं कि इस यात्रा को ले कर बिहार के आयोजक( तौहीद एजुकेशनल ट्रस्ट) ने भी खूब सियासत खेली. उसने पटना के तमाम चौक, चौराहों को होर्डिंग और बैनर से पाट दिया. और तमाम जगहों पर आयोजक के बतौर तौहीद एजुकेशनल ट्रस्ट का नाम दे दिया. जबकि सूत्र बताते हैं कि इमामे हरम की भारत यात्रा का सीधा संबंध तौहीद एजुकेशनल ट्रस्ट से था ही नहीं. दर असल इमामे हरम की यात्रा के लिए औपचारिक दावत जमीयत उलमाये हिंद ने दी थी. जमीयत उलमाय हिंद के प्रमुख अरशद मदनी हैं. जमायत उलमाये हिंद के निर्णायकों ने पटना में हो रही भव्य तैयारियों को देख कर इसलिए दंग रह गये क्योंकि पटना के आयोजन में, होर्डिंग्स और बैनर्स में उनका कहीं नाम नहीं था.सूत्र यहां तक बताते हैं कि जमियत को यह बात काफी नागवार लगी. दूसरी तरफ इमामे हरम के सम्मान में एक कार्यक्रम दिल्ली में इंडिया इस्लामिक सेंटर में रखा गया था. जिसे सिराज कुरैशी ने रखवाया था. इस तरह इमामे हरम की यात्रा के लिए दावत देने वालों में दो प्रमुख लोग थे- अरशद मदनी और सिराज कुरैशी.

तो ऐसे टली इमाम की यात्रा

इस प्रकार इन दोनों ने तौहीद एजुकेशनल ट्रस्ट की सियासी चालबाजी समझ ली. वे यह भी समझ गये कि इमामे हरम की यात्रा को इबादत और अमन के पैगाम के बहाने सियासी लाभ का गणित बिहार में बिठा दिया गया है. इसलिए जमीयत उलमाये हिंद ने इस सियासत की हवा निकाल दी. अंदर ही अंदर इमामे हरम की यात्रा को दो दिनो के लिए एक्सटेंड करवा दिया गया. वजह बतायी गयी कि भारत के प्रधानमंत्री उसी दिन सऊदी अरब की यात्रा पर हैं ऐसे में कुछ भारतीय कारोबारियों को जो सऊदी अरब में काम करते हैं, को वहां मोदी के कार्यक्रम में रहना पड़ सकता है इसलिए इमामे हरम की यात्रा को दो दिनों के लिए टाल दिया गया. जिससे तहीद एजुकेशनल ट्रस्ट की सारी चतुराई फेल हो गयी. उस कार्यक्रम में जहां तीन लाख से ज्यादा लोग आने वाले थे, उसमें महज पांच हजार के करीब लोग ही जुट पाये.

पप्पू यादव की पार्टी भी कूदी अखाडे में

लेकिन इमामे हरम की यात्रा के पीछ सियासत का खेल खेलने वाले यहीं नहीं रुके. जब देश भर के उर्दों अखबारों में इमामे हरम को बीजा नहीं मिलने की खबर फैल गयी तो दो दिनों के बाद जमियत उलमाये हिंद  ने अपने प्रेस सेक्रेट्री फजलुर्रहमान कासमी के दस्तखत से एक प्रेस रिलीज जारी की और साफ रूप में दावा किया कि जमियत के प्रमुख अरशद मदनी की दावत पर इमामे हरम शेख अल तालेब को रियाद में भारतीय दूतावास ने वीजा जारी किया है. याद रखने की बात है कि इमाम के पटना का कार्यक्रम एक अप्रैल को था. इस तरह तौहीद एजुकेशनल ट्रस्ट का सारा प्रचार चौपट हो गया. इस बीच जब इमाम साहब कार्यक्रम के दूसरे दिन पटना आ सके. तो उनकी यात्रा वीजा के दावेदारों में पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी भी शामिल हो गयी. पप्पू की पार्टी के प्रवक्ता एजाज अहमद ने रिलीज जारी कर दावा ठोक दिया कि पप्पू यादव ने विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज पर दबाव डाल कर वीजा दिलवाया.

यहां ध्यान रखने की बात है कि इमाम हरम को इन तमाम सियासी चालबाजियों की जानकारी शायद ही रही होगी. वह तो अमन और शांती व मुहब्बत का पैगाम देने भारत आये थे. देर से ही सही वह आये और अपनी यात्रा से अमन व मुहब्बत का पैगाम दे गये. लेकिन कुछ लोगों ने इस यात्रा को सियासत के अवसर में बदलने की कोई कसर नहीं छोड़ी.

लेखक – इर्शादुल हक़

साभार – नौकरशाही डॉट कॉम ,इस लिंक पर क्लिक करके आप लेख पढ़ सकते है


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