राम पुनियानी

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की प्रताड़ना पर अपना आक्रोश और विरोध जताने के लिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत सहित कई देशों में जंगी प्रदर्शन हुए। इस बार की हिंसा की शुरूआत अतिवादियों (अराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी) द्वारा पुलिस और सेना की चैकियों पर हमले के साथ हुई। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमानों के अनुसार, कम से कम 1,000 रोहिंग्या मुसलमान मारे जा चुके हैं और लगभग ढाई लाख ने अपनी जान बचाने के लिए बांग्लादेश में शरण ली है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि हिंसा इतनी व्यापक और भयावह है कि उसे मानवता के विरूद्ध अपराध की संज्ञा दी जा सकती है। पोप फ्रांसिस ने कहा कि ‘‘रोहिंग्या समुदाय की धर्म के आधार पर प्रताड़ना दुःखी करने वाला समाचार है…इस नस्लीय समूह को उसके पूरे अधिकार मिलने चाहिए।’’

म्यांमार के राखीन प्रांत में मुसलमानों के दमन ने अत्यंत गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। ऐसा लग रहा है कि वहां नरसंहार और नस्लीय सफाई का दौर चल रहा है। भारत में भी कई शहरों में रोहिंग्या मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा के विरोध में प्रदर्शन हुए। भारत के कई हिस्सों में हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान रह रहे हैं और हिन्दू दक्षिणपंथी लगातार यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें देश से खदेड़ दिया जाए।

म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान, मुख्यतः, राखीन प्रांत में रहते हैं। वहां की सरकार का कहना है कि वे अवैध अप्रवासी हैं। म्यांमार में रह रहे मुसलमान, उस समय भारत के विभिन्न भागों से जाकर वहां बसे थे जब वह देश भारत का हिस्सा था। राखीन प्रांत का शासक एक मुसलमान था जिसके कारण भी मुसलमानों ने वहां बसना बेहतर समझा। म्यांमार की सैनिक तानाशाह सरकार ने सन 1982 में रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता समाप्त कर दी। तभी से नागरिक अधिकारों से वंचित ये लोग तरह-तरह के अत्याचारों और प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं। इसके पहले तक, रोहिंग्या मुसलमानों का एक प्रतिनिधि देश के मंत्रीमंडल का सदस्य हुआ करता था और जनप्रतिनिधियों में भी उनकी खासी संख्या थी।

दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जाना आम है। चाहे वह पाकिस्तान हो, बांग्लादेश या फिर भारत – लगभग एक-से बहानों के आधार पर अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जाता रहा है। म्यांमार में सैनिक तानाशाही स्थापित होने के बाद से बड़ी संख्या में मुसलमान उस देश से अपनी जान बचाने के लिए भागते रहे हैं। उनमें से कई भारत आ गए हैं। इस शुद्ध मानवीय मुद्दे को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा है और रोहिंग्याओं को भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जा रहा है। भारत हमेशा से प्रताड़ित समुदायों को शरण देता आया है और हमारे कानून में भी इसके लिए प्रावधान है।

श्रीलंका के तमिलों, तिब्बत के बौद्धों और पाकिस्तान के हिन्दुओं को भारत ने अपने यहां शरण दी है। हिन्दू दक्षिणपंथी, रोहिंग्याओं को शरण देने का केवल इस आधार पर विरोध कर रहे हैं कि वे मुसलमान हैं। भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा भी जोरशोर से उठाया जाता रहा है। तथ्य यह है कि जिन लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताया जाता है वे, वे लोग हैं जिन्हें अंग्रेजों ने तत्कालीन बंगाल से असम में बसने के लिए प्रोत्साहित किया था। सन 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बड़ी संख्या में हिन्दुओं और मुसलमानों ने बांग्लादेश छोड़कर भारत के विभिन्न भागों में शरण ली। जहां उन्हें रोज़ी-रोटी कमाने की संभावना दिखी, वे वहीं बस गए।

सन 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मुंबई से बांग्लादेशियों को खदेड़ने के अभियान ने ज़ोर पकड़ा। शमा दलवई और इरफान इंजीनियर द्वारा मुंबई में किए गए एक अध्ययन से सामने आया कि अधिकतर प्रवासी (बांग्लाभाषी मुसलमान) कम आमदनी वाले रोज़गारों में संलग्न हैं। उन्हें अपना पेट पालने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। इस मुद्दे को राष्ट्रवाद और देश की सुरक्षा से जोड़ा जा रहा है और भाजपा इस मुद्दे का इस्तेमाल कर असम और अन्य उत्तरपूर्वी राज्यों में अपनी पैठ जमाने की कोशिश करती आ रही है।

म्यांमार के प्रजातांत्रीकरण की प्रक्रिया बहुत धीमी और कष्टपूर्ण रही है। सन 1962 की सैनिक क्रांति ने वहां के हालात और बिगाड़ दिए। सेना को सामंती तत्वों और कई बौद्ध संघों का समर्थन प्राप्त है। म्यांमार में सामंती शक्तियों का बोलबाला, वहां प्रजातंत्र के जड़ पकड़ने में एक बड़ी बाधा है। जिस तरह पाकिस्तान में सेना-मुल्ला गठबंधन का राज चल रहा है, उसी तरह म्यांमार में सेना-बौद्ध संघों का दबदबा है। पाकिस्तान में चाहे प्रधानमंत्री कोई भी हो, सेना हमेशा शक्तिशाली रहती है और सेना-मुल्ला गठबंधन के आगे चुने हुए प्रतिनिधि भी घुटने टेकने को मजबूर होते हैं।

म्यांमार में जहां बड़े बौद्ध संगठनों, जिनमें ‘‘संघ महा नायक समिति’’ शामिल है, ने मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाने की बात कही है वह अशिन विराथु जैसे कुछ बौद्ध भिक्षु, मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। वे वहां के साक्षी महाराज हैं।  म्यांमार में सेना और बौद्ध संघों का गठबंधन इतना मज़बूत है कि प्रधानमंत्री सू की को सेना के उच्चाधिकारियों के आगे झुकना पड़ रहा है और उस अमानवीय सैनिक कार्यवाही का समर्थन करना पड़ रहा है जो एक तरह का नरसंहार है। सू की केवल सत्ता में बनी रहना चाहती हैं। वे मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए कुछ भी त्याग करने को तैयार नहीं हैं। कई जगह यह मांग की गई है कि उनका नोबेल पुरस्कार उनसे वापस ले लिया जाए। आखिर किसी नोबेल पुरस्कार विजेता से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह जनता के एक वर्ग के नरसंहार को चुपचाप देखता रहे?

भारत में रोहिंग्याओं को आतंकवाद से जोड़ा जा रहा है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे अत्यंत क्षुद्र और नीच प्रवृत्ति के लोग हैं। भारत में कई मानवतावादी एजेंसियों ने रोहिंग्याओं के साथ न्याय करने की बात कही है। इस मुद्दे ने हिन्दू संप्रदायवादियों को एक नया हथियार दे दिया है। वे अब तक बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम पर अपनी राजनीति करते आए हैं। अब उन्हें एक नया मुद्दा मिल गया है। यहां तक कि यह मांग भी की जा रही है कि भारत सरकार ऐसा कानून बनाए जिसके अंतर्गत भारत, हिन्दू शरणार्थियों को तो शरण दे परंतु मुसलमानों को देश से बाहर निकाल दे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल में म्यांमार गए थे परंतु वहां भी उन्होंने मानवाधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाना ज़रूरी नहीं समझा। शायद उनकी राजनीतिक विचारधारा इसके आड़े आ रही थी।

(लेखक आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर हैं ये उनके निजी विचार हैं)


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