ज़मीन एवं ज़मीर की लड़ाई का सबसे बड़ा उदाहरण है। हक़ और बातिल की लड़ाई में अपनी कई पीढ़ियों को क़ुर्बान कर देने वाला मुल्क फ़लस्तीन है।
भारत का वो साथी है जिसके लिये गांधी हमेशा बेचैन रहते थे, नेलसन मंडेला जिसकी आज़ादी के बग़ैर अफ़्रीकियों की आज़ादी को बेमतलब बताते थे।
यासिर अराफ़ात का वो मुल्क जिसके संसद के अंदर हमारे बापू की तस्वीर लगी है, वही यासिर अराफ़ात जो इंदिरा गांधी को अपनी बहन मानते थे। जब यासिर अराफ़ात रूठ जाया करते थे तो इंदिरा उन्हें मनाने एयरपोर्ट पर भागी चली जाती थीं।
ये वही फ़िलस्तीन है जिसके लिये पूरी दुनिया का लगभग हर राष्ट्र अपने दिल में संवेदना रखता है, जिसके संघर्षों को सलाम करता है। पर अफ़सोस आजकी सियासत पर जो मानवीय संवेदना एवं इंसानी रिश्तों को ताक पर रखकर एक हत्यारे मुल्क की महिमामंडन कर रही है।
हम फ़िलस्तीन को धोखा नहीं दे रहे हैं, ये धोखा असल महात्मा गांधी से लेकर दुनिया भर के तमाम न्यायप्रिय अहिंसावादी लोगों के साथ है।
याद रखो! फ़लस्तीन का संघर्ष दुनिया के किसी मुल्क का कभी मोहताज नहीं रहा है, वो कल भी बातिल के ख़िलाफ़ लड़ा था, आज भी लड़ रहा है और जब तक फ़िलस्तीन का एक भी बच्चा ज़िंदा रहेगा तब तक वो लड़ता रहेगा।
माजिद मजाज
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