मुहम्मद (सल्ल.) के एक मित्र थे- अबू-बक्र (रजि.)। वे अबू-कु-हाफा तैमी के पुत्र थे। बहुत गुणवान औरबहुत सज्जन। वे भी ईमान ले आए। आपसे (सल्ल.) बहुत प्रेम करते थे, उनका साथ आपके लिए बड़ी ताकत था।

अबू-बक्र (रजि.) ने सज्जनता के सभी चिह्न आपमें देखे थे। जितना आपसे प्रेम करते, उतना ही सम्मान भी करते। मुहम्मद (सल्ल.) ने उन्हें हमेशा एक नेक दिल, बहादुर और सच्च इन्सान पाया। एक बार दोस्ती का यह रिश्ता बना तो आगे चलकर और गहरा हो गया। इसका उल्लेख यथास्थान करूंगा।

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एक दिन आपने (सल्ल.) उन्हें कुरआन की आयतें सुनाईं। सुनकर आयतों का उजाला उनके दिलो-दिमाग पर छा गया। आपके मुख से इस्लाम की खूबियां सुनकर वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कलमा पढ़ा और इस्लाम को स्वीकार कर लिया।

बोले- मेरे माता-पिता आप पर कुर्बान, आपने सत्य कहा था और सत्य कहना आपका काम है। मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवाय कोई उपासना के योग्य नहीं है तथा आप उसके रसूल हैं।

अब हजरत अबू-बक्र (रजि.) की कुछ और खूबियां जानिए। वे बहुत विनम्र और दयालु स्वभाव के थे। जो भी किसी मदद की उम्मीद से उनके पास आता, खाली हाथ नहीं लौटता। इन्हीं गुणों की बदौलत उनका बहुत नाम था। कुरैश के ऊंचे घराने से थे, पर अहंकार से दूर थे।

मालदार थे तो दिलदार भी बहुत थे। अल्लाह ने दौलत दी तो उसे सही जगह खर्च करने का विवेक भी दिया। बहुत समझदार थे, चुनौतियों का ठीक उपाय करने में माहिर थे। मुश्किलों की घड़ी में काम आते, इसलिए उनसे परामर्श लेने के लिए लोग बेझिझक चले आते।

ऐसे गुणवान मनुष्य की पहचान करना अल्लाह के रसूल (सल्ल.) बखूबी जानते थे। इसलिए उन्हें अपने साथ रखते, वे भी आपके काम को सहारा देते। अबू-बक्र (रजि.) लोगों को इस्लाम की दावत देते। उनकी सूझबूझ की बातें लोगों को ईमान की ओर बुलातीं।

बुराइयों से बचने की सलाह वह राह खोल देती, जिनसे लोग आज तक अनजान थे। प्रेम का बर्ताव ऐसा करते कि दिल में जगह बना लेते। जिन लोगों ने अबू-बक्र (रजि.) के गुणों से प्रभावित होकर इस्लाम में प्रवेश पाया, उनके नाम कुछ इस प्रकार हैं-

उस्मान इब्ने-अफ्फान, जुबैर इब्ने-अव्वाम, अब्दुर्रहमान-इब्ने-औफ, सअद इब्ने-अबी-वक्कास, तलहा इब्ने-उबैदुल्लाह। यह क्रम आगे भी जारी रहा। यहां एक सवाल पैदा होता है, जो आज भी अक्सर पूछा जाता है – क्या इस्लाम धर्म तलवार से फैला?

मैंने पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की जीवनी का निष्पक्षता से अध्ययन किया है और पाया है कि इस्लाम के प्रसार में तलवार व हिंसा का कोई योगदान नहीं है। अपनी जिंदगी में खुद मुहम्मद (सल्ल.) ने कई कष्टों का सामना किया। वाणी से और विभिन्न मोर्चों पर विरोधियों ने उन्हें सताने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परंतु उन्होंने हथियार नहीं उठाए। जब उनके साथियों व परिजनों की रक्षा के लिए बहुत जरूरी हो गया, तब उन्होंने युद्ध का सामना किया। इससे पहले उन्होंने हमेशा टकराव को दूर रखा।

खुद के मान-अपमान के लिए उन्होंने कभी युद्ध की घोषणा नहीं की। आगे आप पढ़ेंगे कि जीवन में सबसे बड़ी विजय के बाद मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने सभी दुश्मनों को सार्वजनिक रूप से माफ कर दिया था। वास्तव में इस्लाम फैला पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के गुणों से।

वे दया, भाईचारा, माफी, बराबरी पर बहुत जोर देते थे। उनके साथियों ने भी इन्हीं गुणों को अपनाने की कोशिश की और इससे इस्लाम एक से दूसरे तक आगे बढ़ा। इसमें तलवार और युद्ध की भूमिका को जोड़ना मुझे तर्कसंगत नहीं लगा, क्योंकि तलवार की धार से आप किसी को मजबूर तो कर सकते हैं, उसका दिल नहीं जीत सकते।

जो धर्म तलवार का डर पैदा कर लागू किया जाता है, उसे शरीर तो स्वीकार कर सकता, मन और आत्मा उसे मानने की गवाही कभी नहीं दे सकते। वह धर्म स्थाई नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में जब हथियारों का पहरा खत्म होता है, तो वह मनुष्य सबसे पहले उस धर्म से अपना पीछा छुड़ाता है, जिसे उसने मजबूरी में स्वीकार किया था।

आज दुनिया में इस्लाम को मानने वालों की संख्या करोड़ों में है और उनमें से कई मुसलमान ऐसे देशों में रहते हैं, जिन्हें पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है। वहां किसी धर्म को मानने, न मानने, यहां तक कि नास्तिक बनने की भी पूरी आजादी है, लेकिन मुसलमान अपने दीन को बहुत पसंद करते हैं। वे पैगंबर (सल्ल.) से बहुत मुहब्बत करते हैं। अगर वे तलवार के जोर पर इस्लाम में दाखिल किए गए होते तो अब तक यह धर्म छोड़ चुके होते, मगर आप देखंेगे कि ऐसा नहीं है।

स्वामी विवेकानंद लिखते हैं- भारत के गरीबों में इतने मुसलमान क्यों हैं? यह सब मिथ्या बकवास है कि तलवार की धार पर उन्होंने धर्म बदला। … जमींदार और … पुरोहितों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए ही उन्होंने ऐसा किया और फलतः आप देखेंगे कि बंगाल में जहां जमींदार अधिक हैं, वहां हिंदुओं से अधिक मुसलमान किसान हैं। (देखिए- अग्निमंत्र, पृष्ठ 111)

युद्ध और बड़े पैमाने पर हिंसा का असली कारण राजनीति, धन व शक्ति प्राप्त करने की इच्छा से जुड़ा है। लोग चालाकी से उन पर किसी तरह धर्म का आवरण चढ़ा देते हैं। लुटेरे भी धर्म के नाम पर नारे लगा सकते हैं और विश्व के इतिहास में ऐसे कई लुटेरे हुए हैं जिन्होंने किसी धर्म का नाम लेकर देश के देश उजाड़ दिए।

भारत में डाकुओं का गिरोह आज भी डाका डालने से पहले देवी की जय-जयकार करता है, लेकिन इससे उनका गुनाह कम नहीं हो जाता। कोई भी धर्म और खासतौर से इस्लाम धर्म लूट, हत्या, जबरन धर्म परिवर्तन, मर्जी के खिलाफ शादी की इजाजत कभी नहीं देता। अगर कोई ऐसा करता है तो इस्लाम की नजर में वह बहुत बड़ा गुनाह है।

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शेष बातें अगली किश्त में

– राजीव शर्मा –

गांव का गुरुकुल से


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