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क्या हजरत मुहम्मद (सल्ल.) गैर-मुस्लिम से नफरत करते थे? मैं जानता हूं कि ज्यादातर लोग इसका कोई एक जवाब नहीं देंगे। माफ कीजिए, कई गैर-मुस्लिम तो आज तक इस झूठ पर यकीन करते आ रहे हैं कि रसूल (सल्ल.) गैर-मुस्लिम के कत्ल का हुक्म देकर गए हैं … क्योंकि उन लोगों ने यही पढ़ा और सुना है। हकीकत वे जानते ही नहीं। और माफ कीजिए, कई मुसलमान भी यह नहीं जानते कि रब के रसूल (सल्ल.) ने गैर-मुस्लिम से कैसा सलूक करने का निर्देश दिया है। उन्होंने रसूल (सल्ल.) का सिर्फ नाम भर सुना है। इससे ज्यादा वे कुछ नहीं जानते। दोनों ही लोग अंधेरे में जी रहे हैं।

9/11 के बाद अमरीका, यूरोप और कई देशों में मुसलमानों को नफरत की निगाह से देखा जा रहा है। एक अजीब-सा माहौल बन रहा है तो कई मुस्लिम देशों में पश्चिम के खिलाफ गुस्सा उफान पर है। पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्षों और वहां के नागरिकों से मैं कहना चाहता हूं कि आप टोपी की बनावट और दाढ़ी की लंबाई देखकर किसी का चरित्र मत आंकिए। आतंकवाद किसी की सोच में होता है, टोपी, दाढ़ी और बुर्के में नहीं।

… लेकिन मैं उन मुस्लिम देशों के राष्ट्राध्यक्षों और मेरे सभी मुस्लिम भाइयों से भी कहना चाहूंगा कि दुनिया को देखने से पहले आप नबी (सल्ल.) के रास्ते को देखिए और आंखें खोलकर देखिए। नबी (सल्ल.) के जीवन को सही-सही समझिए। तालीम और तब्दीली दोनों को अपनाइए। उसके बाद खुद को देखिए। खुद से यह सवाल कीजिए कि हम कहां हैं और हमें कहां होना चाहिए।

हम अक्सर यूरोप, अमरीका और पूरे पश्चिम को खरी-खोटी सुनाते रहते हैं। कई मित्रों के हाथ में ब्रिटेन का टिकट होता है और वे जी भरकर गोरों को गालियां देते हैं। वे सपना लेते हैं कि उनके बैंक अकाउंट में हजारों डाॅलर हों लेकिन यह भी चाहते हैं कि अमरीका तबाह हो जाए।

मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि पश्चिम ने कभी बदमाशी नहीं की। बहुत की है लेकिन उन लोगों ने सबसे पहले अपने मुल्क, अपने घर की फिक्र की है। दुनिया की वे बाद में सोचते हैं। वे जालिम हैं, शैतान हैं, बदमाश हैं अथवा शरीफ हैं, जैसे भी हैं, आज दुनिया को वे ही रास्ता दिखा रहे हैं। आखिर कुछ तो खूबी उनमें होगी! दुनिया उनके साथ क्यों चलना चाहती है? क्यों हर साल लाखों बच्चे वहां पढ़ने जाते हैं? इसका एक ही जवाब है- उन्होंने अपना मुल्क ताकतवर बनाया है। उनके नागरिकों ने, उनकी सरकारों ने बहुत मेहनत की है।

सवाल है- हम उनसे बेहतर क्यों नहीं बन सकते? हमारी भी हैसियत है, ताकत है, हमारे पास सबकुछ है। बस इच्छाशक्ति नहीं है। जब बात कुछ करने की आती है तो हम अलग-अलग धर्मों में बंट जाते हैं। अब जाने भी दीजिए, हम तो वोट भी जाति और मजहब देखकर देते हैं। फिर क्या खाकर पश्चिम से मुकाबला करेंगे? हम तो आज तक लोकतंत्र को ठीक से नहीं चला पाए।

हम अमरीका से सीखें कि लोकतंत्र क्या होता है? वहां डोनाल्ड ट्रंप का एक फूहड़ मजाक वाला वीडियो सामने आता है और देश उनके खिलाफ हो जाता है। हम तो बलात्कारियों को पहचानकर भी उन्हें वोट दे देते हैं और संसद में भेज देते हैं। हम ब्रिटेन से सीखें कि लोकतंत्र क्या होता है। वहां डेविड कैमरून पीएम पद से इस्तीफा देते हैं और तुरंत बंगला खाली कर देते हैं। हमारे यहां तो नेता चुनाव हारने के बाद वर्षों तक सरकारी बंगले में टिके रहते हैं।

पश्चिम ने बहुत गलतियां की हैं, पर उनसे सीखा भी है। हम सदियों से गलतियां करते जा रहे हैं और कुछ सीखने के बजाय उन्हें ही दोहराते रहना ज्यादा पसंद करते हैं। कौन है जो ब्रिटेन, नाॅर्वे, इटली जैसे पश्चिमी देशों की सफाई की तारीफ नहीं करेगा, जबकि हमारे यहां तो प्रधानमंत्री को यह अपील करनी पड़ती है कि कृपया गंदगी न फैलाएं, सफाई का महत्व समझें।

किताबें पढ़ें और समझें, नबी (सल्ल.) ने जिंदगी जीकर दुनिया को बताया था कि सफाई से कैसे रहा जाए, जबकि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भारत में गंदगी के ढेर लगे हैं। बताइए, हम कहां नबी (सल्ल.) की बातों पर अमल कर रहे हैं?

भले ही पश्चिम ने दुनिया में बम बरसाए हों लेकिन अपने मुल्क का सदा ध्यान रखा। हमारे यहां रिवाज रहा है कि जो राजा-बादशाह आया उसने पुराने वाले से जंग लड़ी, उसे कत्ल किया या कैदखाने में डाल दिया। हम अपनों की ही गर्दनें उतारते रहे और दुआ करते हैं कि रब हम पर रहम करे! पश्चिम हमसे सैकड़ों साल पहले लोकतंत्र को अपना चुका है और बहुत सावधानी से उसे आगे बढ़ा रहा है।

हम पश्चिम से सीखें कि पढ़ाई-लिखाई क्या होती है। हमारे विश्वविद्यालय जितने बड़े हैं, उनसे ज्यादा बड़े उनके पुस्तकालय हैं। हमारा कुरआन कहता है कि पढ़ो अपने रब के नाम से लेकिन हमारे घर में पढ़ाई की क्या हालत है, यह बताने की जरूरत नहीं।

हम पश्चिम से सीखें कि नए विचार से कारोबार कैसे करते हैं। गूगल, फेसबुक, माइक्रोसाॅफ्ट, अमेजाॅन – इन कंपनियों ने दुनिया बदल दी। हर नया विचार पश्चिम से आ रहा है। जबकि हमारा हाल यह है कि करोड़ों की तादाद में होकर भी एक अच्छा विचार नहीं दे सकते। हम कभी याद नहीं करते कि नबी (सल्ल.) खुद एक अच्छे व दूरदर्शी कारोबारी थे।

जरा गौर कीजिए, पिछले सौ साल में पश्चिम के वैज्ञानिकों ने दुनिया को क्या दिया और हमने क्या दिया। हमारी उपलब्धियां सिर्फ इतनी हैं कि अंगुलियों पर गिन ली जाएं।

रही बात जुल्म की कि ब्रिटेन ने हम पर राज किया, अमरीका ने मासूमों पर बम बरसाए तो मेरी जान यह समझ लो, जो गरीब होता है, जहां भूख होती है, जहां अशिक्षा होती है, जो बीते जमाने में ही रहना चाहता है, उस पर हर कोई जोर चलाता है। यह गलत है, पर ऐसा ही होता है और आगे भी ऐसा होगा। अगर ब्रिटेन आप पर राज नहीं करता तो कोई और करता। अगर अमरीका आपको नहीं मारेगा तो कोई और मारेगा।

अहम बात यह है कि हमने अब तक क्या सीखा। दुनिया को लेकर हमारा रवैया क्या है। नबी (सल्ल.) फरमाते थे कि दुनिया के जिस देश में रहो, उसके कानून का सम्मान करो। एक बार देखें, सोचें और समझें, हम नबी (सल्ल.) का यह हुक्म कितना मानते हैं? इन दिनों पश्चिम में ऐसी कई घटनाएं हो रही हैं जो टकराव की वजह बन रही हैं।

अभी मैंने पढ़ा था कि सीरिया से एक व्यक्ति शरणार्थी के रूप में जर्मनी गया। उसका नाम गाजिया बताया जा रहा है। चूंकि जर्मनी में छोटे परिवारों का चलन है। वहां की नीतियां ऐसी हैं कि अगर आपके दो बच्चे हैं तो उनके पालन-पोषण, शिक्षा का खर्च आराम से वहन कर सकते हैं।

सीरिया से जर्मनी गए व्यक्ति की चार बीवियां और 22 बच्चे हैं। जब स्थानीय लोगों को पता चला कि एक ही परिवार के 27 लोगों पर उनके देश के संसाधन खर्च हो रहे हैं, तो वे भड़क गए। वहां टकराव पैदा हो गया। दूसरी ओर किसी शरणार्थी कैंप में इसलिए झगड़ा हो गया क्योंकि खाने के बाद एक युवक को पता चला कि जिस बकरे का गोश्त उसने खाया, उसे अल्लाह का नाम लिए बिना जिब्ह किया गया था। उसने लोगों से झगड़ा किया तो वे गुस्सा हो गए और बोले- हम तुम्हें खाना खिलाएं, ऊपर से नखरे भी सहन करें। जाओ यहां से, अब भूखे मरो।

ऐसी कई घटनाएं हैं जिनका मैं जिक्र नहीं कर रहा हूं। मेरा मानना है कि अगर हम किसी के देश में जाएं, तो पहले वहां के कानून, लोगों की पसंद-नापसंद, संस्कृति, तौर-तरीकों की जानकारी जरूर लें। अगर वहां रहें तो उनका पूरा सम्मान करें। अगर हम यह नहीं कर सकते तो बेहतर होगा कि अपने घरों में बैठे रहें।

अब मैं मेरा उदाहरण देता हूं। मैं पूरी तरह से शाकाहारी हूं लेकिन मान लीजिए, अगर कभी जापान जाऊं तो यह नहीं हो सकता कि जाते ही जापानियों से कहूं कि देखो, अब मैं आ गया हूं। इसलिए जापान में किसी को भी मछली नहीं खाने दूंगा। यह जिद करूं कि मेरा तो हर मंगलवार को हवन करने का नियम है। इसलिए जिसने मुझे मेहमान बनाया है, आज मैं उसी के बेडरूम में हवन करूंगा। ऐसा नहीं होता है। अगर मैं ऐसा करूंगा तो कोई मुझे पसंद नहीं करेगा। दुनिया का हर देश मेरे लिए अपने दरवाजे बंद कर देगा। यह बात मुझे समझनी ही होगी।

यह नहीं हो सकता कि अमरीका जाऊं और वहां जिद करूं कि मैं तो इंदिराजी को दुनिया की सबसे अच्छी नेता मानता हूं, इसलिए उन्हीं के बनाए कानून अमरीका में भी चलाऊंगा। आप चाहें तो दाईं ओर चलें, मैं तो सड़क के बाईं ओर ही गाड़ी दौड़ाऊंगा। मेरे साथियों और भाइयों, आप समझ लें कि दुनिया ऐसे नहीं चलती।

जब नबी (सल्ल.) मदीना गए थे तो दुनिया को सिखाया कि मेहमान को कैसे रहना चाहिए, किस तरह से पेश आना चाहिए, किस तरह से बात करनी चाहिए, कैसे चलना चाहिए, सब सिखाया। यही वजह थी कि मदीना में घर-घर के दरवाजे आपके (सल्ल.) लिए खुल गए थे। हमें इस घटना से सबक लेना चाहिए और अपनी जिंदगी इस तरह जीनी चाहिए कि दुनिया का हर देश हमें मेहमान बनाना चाहे, दुनिया का हर दरवाजा हमारा लिए खुलना चाहे। जबकि आज इसका उलटा हो रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? इस पर आपको सोचना चाहिए।

चलते-चलते
इस लेख का समापन मैं हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन की उस घटना से करना चाहूंगा जब फरिश्ते जिबरील (अलैहि.) रब का पैगाम लेकर आ चुके थे। उन्हें देखकर रसूल (सल्ल.) को जो दिव्य अनुभूति हुई, उसका मतलब जानने के लिए हजरत खदीजा (रजि.) अपने चचेरे भाई वरका के पास गईं।

वे नौफल के पुत्र थे। विभिन्न धर्मों का अध्ययन करने में उनकी दिलचस्पी थी। वे कई प्राचीन किताबें पढ़ चुके थे। उनकी छवि एक समझदार व ज्ञानी व्यक्ति की थी। एक जमाने में उनका रुझान यहूदी धर्म की ओर हुआ। फिर ईसाई धर्म में उनकी दिलचस्पी पैदा हुई और वे ईसाई बन गए। भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था, इसलिए धार्मिक किताबों का अनुवाद भी करते थे।

उनके बारे में जो जिक्र आता है, उसके आधार पर कहा जाता है कि वे इस घटना के समय बहुत वृद्ध हो चुके थे। उन्हें आंखों से दिखाई भी नहीं देता था। खदीजा (रजि.) ने उन्हें अपने पति के साथ हुई घटना का विवरण सुनाया। सब ध्यान से सुनकर वरका ने कहा, … यह वही फरिश्ता है जो मूसा (अलैहि.) के पास आता था। अल्लाह की कसम, मुहम्मद (सल्ल.) इस उम्मत के नबी होंगे। उनसे कहना कि घबराएं नहीं, वे जो काम कर रहे हैं, उसे निरंतर करते रहें।

मुहम्मद (सल्ल.) काबा का तवाफ करने गए तो रास्ते में वरका से मुलाकात हो गई। उन्होंने जब खदीजा (रजि.) से फरिश्ते के विषय में सुना, गारे-हिरा में हुए संवाद की जानकारी मिली, तभी से वे मुहम्मद (सल्ल.) से मुलाकात करने के इच्छुक थे।

मिलते ही उन्होंने पूछा, मुझे भी बताइए, आपने क्या देखा? आपने प्रारंभ से पूरी बात उन्हें बताई। वरका फिर उसी निष्कर्ष पर पहुंचे, जो वे पहले बता चुके थे। बोले, … आप इस उम्मत के नबी होंगे। यह वही फरिश्ता है जो मूसा (अलैहि.) के पास आता था। वरका यहीं नहीं रुके। उन्होंने इसका दूसरा पक्ष भी बताया- जब नबी होने की घोषणा करेंगे तो लोग आपको झूठा बताएंगे, हर प्रकार के अत्याचार करेंगे। आपको बेघर कर देंगे, युद्ध भी करेंगे। काश, मैं उस समय जिंदा होता जब आपकी कौम आपको निकाल देगी।

आपके (सल्ल.) मन में प्रश्न उठा, क्या लोग मुझे बेघर कर देंगे?

वरका ने कहा- हां, जब भी कोई व्यक्ति इस प्रकार का संदेश लाया, जैसा आप लाए हैं, तो उससे शत्रुता की गई। कोई भी नबी आया हो, कौम ने उससे ऐसा ही व्यवहार किया है। अगर मेरे जीवन में वह समय देखने को मिले, तो आपकी खूब सहायता करूंगा।

वरका ज्ञानी थे, वे जान चुके थे कि जिस व्यक्ति के साथ बात कर रहे हैं, वह भविष्य में क्या बनने वाला है। उन्होंने बहुत प्रेम व आदर से आपके माथे को चूमा। इस घटना के कुछ ही दिन बाद वरका का देहांत हो गया।

ध्यान दीजिए कि उस वरका ने प्यारे नबी (सल्ल.) का माथा चूमा था जो ईसाई मत को मानने वाला था। इससे साबित होता है कि प्यारे नबी (सल्ल.) किसी भी गैर-मुस्लिम से नफरत नहीं करते थे।

आज पूरे विश्व में नबी (सल्ल.) और इस्लाम को लेकर जो गलतफहमियां पैदा हो रही हैं, उन्हें दूर करने तथा इस्लामी जगत का नेतृत्व करने के लिए भारत के मुसलमानों को आगे आना चाहिए, क्योंकि उनसे ऐसी उम्मीद की जा सकती है, उन्हें गैर-मुस्लिम के साथ रहने की तमीज है। मगर मुझे आश्चर्य है, अफसोस है, यहां ऐसा कोई चेहरा आगे क्यों नहीं आ रहा है? भाइयों और बहनों, कहीं ऐसा न हो कि कयामत के दिन आज के हालात के लिए नबी (सल्ल.) हमारा चेहरा भी देखना पसंद न करें। समय मिले तो इस पर जरूर विचार कीजिए। मुझे उम्मीद है कि इस वक्त जो यह लेख पढ़ रहा है, उसी से दुनिया को नई उम्मीद मिल जाए।

राजीव शर्मा


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