सैय्यद ज़ैगम मुर्तज़ा

सदियों पुरानी कहानियां हैं। हिंदू कहते हैं हर आदमी के अंदर भगवान और शैतान किसी का भी वास हो सकता है। मुसलमान कहते हैं इंसान अपने साथ अच्छे और बुरे फरिश्ते लिए घूमता है। बहरहाल कुल मिलाकर कहा यही जा रहा है कि अच्छे बुरे की तमीज़ करना आपका काम है। धर्म अच्छाई और बुराई का भेद बताने के लिए है मगर इंसान इसका इस्तेमाल अच्छाई और बुराई गढ़ने के लिए कर रहा है। हमारे घरों मे कहा जाता है ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर। यानि ख़ाली इंसान शैतानी की फिराक़ मे लग जाता है। मौलाना अरस्तू उर्फ अफलातून भी समाज में अराजकता और क्रांति से बचाव के लिए मध्यम वर्ग के विस्तार की वकालत करते हैं।

ये भी सत्य है कि मनुष्य पर ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए तो वो अफरा अफरा फिरता है और ज़रूरत पूरी न हो तो बौखलाया घूमता है। हिंदुस्तान की परेशानी है कि भूखे और पेट भरे, दोनो वर्गों का विस्तार हो रहा है। संसाधन सीमित हैं और जो हैं वो कुछ हाथों में केंद्रित हैं। ये विडंबना है कि आपको दुनिया के सबसे अमीर और सबसे ज़्यादा ग़रीबों की भीड़ एक ही मुल्क में मिलेगी। हाल के सालों का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि राजनीतिक संक्रमण और आर्थिक विपत्तियों के काल में देश में हिंसा और धार्मिक उन्माद की घटनाओं में इज़ाफा हुआ है। आर्थिक प्रगति के काल मे सद्भाव बढ़ा हुआ दिखाई देता है। ऐसा नहीं है कि प्रगति काल मे इंसान अपने मूल स्वभाव को भूल जाता है बल्कि व्यस्त हो जाता है।

हाल के दिनों में भीड़तांत्रिक घटनाओं को देखा जाए तो समझ आता है कि ख़ाली लोग बहुत हैं। बस हो हो कीजिए और मानसिक विक्षिप्तता के शिकार लोगों का झुंड जमा हो जाएगा। लोगों के पास या तो अपने मां, बाप और पड़ोसी को भी देखने का समय नहीं होता था, यहां एकदम सैकड़ों लोग पल भर में आ जा रहे हैं। ज़ाहिर है लोगो के पास शैतानी प्रवृत्ति को हवा देने वाला ख़ाली समय बढ़ा है इसलिए शैतान की व्यस्ता बढ़ रही है। सरकार रोज़गार के नए अवसर मुहैया करा पाना दूर ये विश्वास दिला पाने में भी नाकाम रही है कि रोज़गार के अवसर आएंगे। रही सही कसर नोटबंदी के बाद फैली व्यापक बेरोज़गारी पूरी कर रही है। असंगठित क्षेत्र तबाह है। नए कारख़ाने लग नहीं रहे। नोटबंदी के बाद शहरों से लाखों मज़दूर गांव लौट आए हैं। गांव मे खेती तबाह है। मनरेगा में न अब पैसा है और न काम। इससे फ्रस्ट्रेशन का स्तर बढ़ रहा है।

एक तो पहले से ख़ाली इंसान काफी थे। हर साल इसमें तमाम डिग्री लेकर और जुड़ रहे हैं। यूं कहिए कि गांव, देहात और क़स्बों भीड़ बढ़ रही है। इस भीड़ मे अधपढ़े, कुंजीछाप डिग्रीधारकों की भरमार है। इसमें वो लोग हैं जिनका काम छिन गया है। इसमें उन लोगों का शुमार है जिन्हें न खेती भा रही है और न कारोबार। भीड़ तक ठीक था लेकिन ये भीड़ कुंठित और गुस्साए लोगों की भीड़ है। इस भीड़ को कभी लगता है कि उसकी विफलता में आरक्षण की व्यवस्था का क़सूर है। कभी ये धर्म विशेष, उसकी जनसंख्या और पाकिस्तान न जाने को अपनी नाकामयाबी की वजह समझती है। कभी इस भीड़ को लगता है कि घुसपैठिए और दूसरे राज्यों से घुस आए लोग उसके संसाधनों पर डाका डाल रहे।

राजनीतिक दलों ने भीड़ की इन अजीब कुंठाओं को और हवा दी है। सरकारी नौकरियों की घटती तादाद, डूबती खेती और कारोबार को सत्ताधारी बढ़ते जातीय और धार्मिक उन्माद से ढक पाने में कामयाब रहे है। ये उन्माद सत्ता धारकों के हित में है इसलिए इसे रोकने की कोशिश ही नही की जा रही। सरकार को वजहें मालूम है लेकिन वो अपनी विफलताओं से ध्यान हटाए रखने के लिए इनका ज़िक्र तक नहीं होने दे रही। इधर कमज़ोर विपक्ष जनता के मूल मुद्दे उठा पाने मे नाकाम रहा है।इस बीच भीड़ में अधीरता बढ़ रही है।उसका ग़ुस्सा जगह जगह-जगह फूटता नज़र आ रहा है। आने वाले दिन और बुरे ही होंगे। आज भीड़ के निशाने पर अख़लाक़, अयूब और पहलू ख़ां हैं, कल सुरेश, रमेश, उमेश भी होंगे। ये इस बात पर निर्भर करेगा कि आप किस भीड़ के हाथ लगते हैं। धार्मिक उन्मादियों की, बेरोज़गार अधपढ़ो की, लगातार विफलता की फ्रस्ट्रेशन के शिकार विक्षिप्तों की या फिर जातीय क़बायलियों की। कुल मिलाकर सुरक्षित कोई भी नहीं रहने वाला। घरों में आग सबके लगेगी।

लेखक राज्यसभा टीवी से जुड़ें हैं 


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