लोकसभा से पास होने के बाद अब जुवेनाइल बिल राज्य सभा में भी पास हो गया है, और अब यह राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा जाएगा। इस बिल के लागू होने के बाद अगर जुर्म ‘जघन्य’ हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से अधिक हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग को वयस्क माना जाएगा। हालांकि भारत समेत दुनियाभर के करीब 190 देशों ने ‘यूएन कन्वेंशन ऑन चाइल्ड राइट्स’ पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें किसी बच्चे को ‘वयस्क’ मानने के लिए उम्र सीमा को 18 साल रखने की सलाह दी गई है।

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इस कानून के जरिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर ‘जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड’ ये जांच करेगा कि उसे ‘बच्चा’ माना जाए या ‘वयस्क’ और वयस्क माने जाने पर किशोर को मुकदमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाएगा। हालांकि अगर नाबालिग को वयस्क मान भी लिया जाए तो मुक़दमा ‘बाल अदालत’ में चले और आईपीसी के तहत सज़ा हो उम्र क़ैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकती।

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के एक नाबालिग आरोपी के रिहाई के कारण यह बहस तेज हो गई थी कि आखिर बच्चों को किस तरह की सजा दी जाए। अपराध संबंधी कानूनों पर हमेशा से बहस चलती रही है कि उन्हें दंडात्मक होना चाहिए या सुधारात्मक। हमेशा से तर्क यही दिया जाता रहा है कि हर व्यक्ति में सुधार की गुंजाइश होती है और इसी कारण मृत्युदंड का विरोध होता रहा है।

आज हर कोई जुवेनाईल एक्ट में संशोधन की मांग कर रहा था ताकि किशोर की परिभाषा में उम्र 18 से कम हो और ऐसे नृशंस अपराधियों को  सख्त सजा मिले, लेकिन यह कम से कम निर्भया मामले का समाधान तो नहीं है, जाहिर है भारतीय संविधान में साफ-साफ लिखा है कि अपराध कानून में कोई भी संशोधन पूर्व प्रभाव से लागू नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस रिहाई से समाज उद्वेलित है, और कानून में बदलाव की मांग कर रहा था ताकि कोई किशोर अपराधी इतने सस्ते में न छूट जाए और अपराध पर लगाम लगाई जा सके।

एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या में 132 फीसदी का इजाफा देखने के मिला है, जिसमें बलात्कार की घटनाओं में यह वृद्धि 60 फीसदी से अधिक है। इस रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में 66 फीसदी से अधिक बच्चों की उम्र 16-18 साल के बीच है। इन सबके बीच चौंकाने वाली बात ये है कि महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार 16 साल से ऊपर वाले वो बच्चे जो गंभीर अपराध में लिप्त पाए गए उनमें से 50 फीसदी से अधिक बच्चे इस ऐक्ट के बारे में बखूबी जानते हैं कि इसका इस्तेमाल करके कैसे बचा जा सकता है।

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यकीनन इसके लिए हमें इंग्लैंड से सबक लेना होगा जहां फरवरी 1993 जेम्स बलजर नामक एक बच्चे की दो 10 वर्ष के बच्चों द्वारा अपहरण कर हत्या करने की घटना के एक वर्ष के अंदर वहां क्रिमिनल जस्टिस एंड पब्लिक ऑर्डर एक्ट, 1994 बनाया गया जिसमें किशोर अपराधियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। उस घटना के पहले वहां भी किशोर अपराधियों के लिए सजा के बजाय पुनर्वास की ही व्यवस्था हुआ करती थी।

भारत में अब तक के किशोर न्याय (बाल सुरक्षा) कानून, 2000 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र का व्यक्ति किशोर माना जाएगा और यदि वह कोई अपराध करता है, तो उसका विचारण किशोर (जुवेनाइल) अदालत में होगा और इसी कानून के आड़ में सबसे ज्यादा बर्बरता दिखाने वाला यह नाबालिग अपराधी आज कानून के लंबे हाथों से बाहर है।

किशोर अपराध के मामले ने अब नवीन परिदृश्य ग्रहण कर लिया है और अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ने के बावजूद भी उच्चतम न्यायालय ने किशोर न्याय कानून के तहत किशोर की आयु घटाकर 16 साल करने से इंकार करते हुए इसे संसद के ऊपर छोड़ दिया था। आंकड़ों पर यदि नजर डालें तो पता चलता है कि महिलाओं के प्रति होने वाले यौन अपराधों में 16 से 18 साल की आयु के किशोरों की भूमिका में तेजी से वृद्धि हुई है।

किशोर बच्चों को अपराधियों के बीच रखने की बजाए उन्हें सुधारने की उम्मीद से ही वर्ष 2000 में किशोर न्याय: बच्चों की देखभाल और संरक्षण कानून बनाया गया था। किशोर न्याय कानून के तहत किसी अपराध में 18 साल से कम आयु के किशोर के शामिल होने पर उसे बाल सुधार गृह भेजा जाता था। इसी कानून के तहत ही उसके खिलाफ किशोर न्याय बोर्ड में कार्यवाही होती थी।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किशोर न्याय: बच्चों की देखभाल और संरक्षण कानून 2000 की धारा 15(1)(जी) के तहत जघन्य अपराध में दोषी पाए जाने के बावजूद एक किशोर 18 साल का होते ही रिहा कर दिया जाता था, लेकिन इस कानून में 2006 में संशोधन के बाद स्थिति बदली है। पिछले एक दशक में यौन अपराधों में इन किशोरों की भूमिका में तेजी से इजाफा हुआ है। और यही वजह है कि दुष्कर्म और जघन्य अपराधों में किशोर लड़कों के शामिल होने की बढ़ती घटनाओं के कारण किशोर की आयु सीमा को नए सिरे से परिभाषित करने की मांग जोर पकड़ रही थी। महिलाओं के साथ यौन अपराधों में किशोरों की बढ़ती भूमिका पर संसदीय समिति ने भी चिंता व्यक्त की थी।

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संसद की महिला सशक्तिमकरण मामलों पर गठित समिति ने भी महिलाओं के प्रति यौन अपराधों में 16 से 18 साल की उम्र के किशोरों की भूमिका के मद्देनजर पुरूष किशोर की आयु 18 साल से घटाकर 16 साल करने की सिफारिश की थी।

सवाल यह है कि आखिर अपराध और विशेषकर महिलाओं के प्रति अपराधों में किशोर युवकों की भूमिका में तेजी से इजाफा कैसे हो रहा है। समाज में एक तरफ ऐसे तत्वों की कमी नहीं है जो इन किशोरों को पथभ्रष्ट करने और अपनी विकृत मानसिकता से उपजे मंसूबों को पूरा करने के लिए उन्हें अपराध की दुनिया में ढकेलने से गुरेज नहीं करते है तो दूसरी तरफ समाज में आ रहे खुलेपन, सिनेमा और टेलिविज़न पर दिखाये जा रहे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों और इंटरनेट की दुनिया के कारण किशोरो में बढ़ रही उत्सुकता को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। अक्‍सर देखा गया है कि गंभीर अपराध में किसी किशोर के गिरफ्तार होने पर सबसे पहले उसके नाबालिग होने की दलील दी जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि कि आजकल बच्चे बहुत जल्द बड़े हो रहे हैं।

पेशेवर अपराधी किशोरों का इस्तेमाल जघन्य अपराधों के लिए करते हैं। उन्हें धन का लालच देकर बताया जाता है कि उन्हें काफी सजा कम होगी और जेल में भी नहीं रखा जाएगा। सजा के मामले में भी हमें ब्रिटेन से सीखने की जरूरत है जहां सात से अठारह साल के बीच 7 से 10 और 11से 14 तथा 15-16 और 17-18 के चार आयु वर्ग बनाए जा सकते हैं और उसी के अनुरूप बढ़ती उम्र के साथ सजा को सख्त किया जा सकता है। किशोर-अपराधियों को दंड नहीं, बल्कि उन्हें “सुधार गृह” में रखा जाता है जहां उनकी दूषित हो चुकी मानसिकता को सुधारने का प्रयत्न किए जाने के साथ उनके साथ उनके भीतर उपज रही नकारात्मक भावनाओं को भी समाप्त करने की कोशिश की जाती है।

मनोवैज्ञानिक एवं समाजशास्त्रीय अध्ययनों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि मनुष्य में अपराधवृत्तियों का जन्म बचपन में ही हो जाता है। माना जाता है कि सबसे अधिक और गंभीर अपराध करनेवाले किशोरावस्था के ही बालक होते हैं। ऐस माना जाता है कि किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण में वातावरण का बहुत हाथ होता हैं, यही कारण है कि अपराधी बच्चों के प्रति सहानुभूति, प्रेम, दया और संवेदना का व्यवहार किया जाता है। किशोर बालक अपराध क्यों करते है, इस संबंध में विभिन्न मत हैं।

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मानवशास्त्री कहते हैं कि अपराध का संबंध वंशानुक्रम, शारीरिक बनावट एवं जातिगत विशेषताओं से है तो शरीरवैज्ञानिकों का मत भी इसी से मिलता जुलता है। उनके अनुसार विशेष प्रकार की शारीरिक बनावट और प्रक्रियावाला व्यक्ति विशेष प्रकार का अपराध करेगा लेकिन मनोवैज्ञानिकों की राय इससे अलग है। उनके अनुसार अपराध का संबंध न तो उत्तराधिकार से होता है और न शारीरिक बनावट से ; उत्तराधिकार में केवल शारीरिक विशेषताएं ही प्राप्त होती हैं, उनका व्यक्ति की भावनाओं,आकांक्षाओं, प्रवृत्तियों एवं बुद्धि से सीधा संबंध नहीं होता।समाजशास्त्री कहते हैं कि अपराध का जन्मदाता दूषित वातावरण, यथा—गरीबी, उजड़े परिवार, अपराधी साथी आदि है।

एक वक्त था जब अपराधों की दुनिया में किशोरों के शामिल होने पर उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, गरीबी, निरक्षरता और अभावों पर सवाल उठाए जाते थे लेकिन समय के साथ यह बदलाव देखा गया कि संभ्रांत परिवार के किशोरों में भी इस तरह की आपराधिक प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। मौजूदा कानून के तहत किसी भी किशोर आरोपी का न तो नाम सार्वजनिक किया जा सकता है और न ही उसे सामान्य आरोपियों के साथ जेल में रखा जा सकता है। संगीन अपराध में लिप्त होने के बावजूद नाबालिग को उम्र कैद जैसी सजा भी नहीं दी जा सकती है। किशोर न्याय कानून के तहत उसे तीन साल तक ही बाल सुधार गृह में रखा जा सकता है और दोष सिद्ध होने के बावजूद उसे सरकारी नौकरी या दूसरी सेवाओं से न तो वंचित किया जा सकता है और न ही चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है।

दुर्भाग्य की बात यह है कि भारतीय समाज इस विचार पर भी एक मत नहीं दिख रहा। जहां एक तरफ लोग किशोर अपराधी के लिए कठोर कानून की मांग कर रहे हैं तो दूसरी तरफ इसके विपरीत बाल अधिकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह किशोरों द्वारा जघन्य अपराध का यह कोई पहला मामला नहीं है और इस घटना के आधार पर इतना बड़ा संशोधन नहीं किया जाना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हाल के वर्षों में किशोर अपराधियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है, इसलिए कानून पर पुनर्विचार जरूरी है। साभार: khabar.ibnlive


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