मंगलवार को पत्रकारों के मार्च से लौट कर कब सो गया पता नहीं चला। कई टाइम ज़ोन पार कर आया था, इसलिए कई मुल्कों की रातों की नींद जमा हो गई थी। इसी को जेटलैग कहते हैं। अचानक नीचे से हुंकार भरी आवाजें आने लगी। इन आवाज़ों को सुनकर लगा कि मैं किसी दूसरे मुल्क में हूँ। किसी और टाइम ज़ोन में हूँ। शाम के वक्त आसमान से टपकती बूँदों से धरती जितनी तर हो रही थी उससे ज़्यादा मैं इन नारों की आक्रामकता से सूखने लगा। घर में घुसकर मारने के नारे लगाये जा रहे हैं। उन नारों से जो शोर पैदा हो रहा था वो मेरे भीतर बैठ गया। मारने के नारे और टीवी पर गोली मार देने के बयानों के बीच बची हुई जगह मिल नहीं रही थी। हर किसी की पीठ पर बंदूक तनी नज़र आ रही थी।

ravish kumar

टीवी के एंकर डिबेट में दर्शकों को उलझाए हुए थे और दूसरी तरफ गली गली में शाम के वक्त जे एन यू विरोधी नारे लग रहे थे। द्वारका और राजेंद्र नगर इलाक़े में शाम के वक्त ऐसी ही रैलियाँ निकाली गईं, जिसमें मारने और दागने के नारे थे। मीडिया को ख़बर भी नहीं थी कि इन नारों से जे एन यू के ख़िलाफ़ माहौल बनाया जा चुका है। गिनती के तथ्य तो नहीं है, मगर कह सकता हूँ कि कई मोहल्लों में मॉल में और बाज़ार में इस तरह की रैलियाँ निकली हैं और आक्रामक नारे लगे हैं।

पूर्वी दिल्ली के रेज़ीडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन के किसी सदस्य ने अपने ग्रुप में एक स्क्रीन शाट शेयर कर दिया। कि ये फ़लाँ लड़की है और अफ़ज़ल की समर्थक है। ऐसे ही एक मैसेज में मैंने देखा कि एक लड़की की तस्वीर है जिसे काले रंग से घेरा गया है। उसमें नाम के साथ लिखा गया है कि ये लड़की बंगाली है और इसकी तस्वीर को इतना वायरल किया जाए कि दुनिया को पता चले कि ये अफ़ज़ल की साथी है। तस्वीर में जो लड़की है वो जे एन यू के छात्रों के साथ प्रदर्शन में शामिल है। हम पत्रकारों की तो ऐसी प्रोफाइलिंग होती रही है, हमारे बारे में तरह तरह की अफ़वाहें फैलाई जाती रही हैं कि ये देश का दुश्मन है। यहाँ तक ट्वीट हुआ कि रवीश कुमार सौ फीसदी वेश्या की औलाद है। वैसे मेरी माँ भारत माता है और वेश्याएँ को मुझे माँ कहने में कोई दिक्कत नहीं है।

 

लेकिन आम लड़की की ऐसी प्रोफ़ाइल बनाकर उसकी निशानदेही की जाएगी, हमें इसका ख़्याल ही नहीं आया। वो भी रेज़िडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन के सदस्य भी ये सब करेंगे तब तो ये बहुत ख़तरनाक है।

गनीमत है वो लड़की उस सोसायटी में नहीं रहती लेकिन ये आदत अगर सोसायटी के अंदर पहुँच गई तो क्या होगा। ये लड़कियों और औरतों की आज़ादी के ख़िलाफ़ हैं। पहले यही लोग उनकी स्कर्ट की लम्बाई नापते रहे और अब राजनीतिक विचारों की गहराई पता करने लगे हैं। सोसायटी के गेट पर बैठकर लड़कियों के बाप बन जायेंगे।

एक खास विचारधारा के लोग रेज़िडेंट वेलफ़ेयर एसोसिएशन में घुस गए हैं या पहले से हैं मगर अब उस विचारधारा के लिए काम करने लगे हैं। इस पर सदस्यों ख़ासकर नौजवानों को सोचना चाहिए। कल इन्हीं में से कोई फोटो खींचकर या फेसबुक का कमेंट उठाकर वायरल करेगा कि अंतरा नाम की लड़की कालेज जाने के बहाने सेक्टर छह के राजीव नाम के लड़के के साथ मस्ती कर रही है। इस तस्वीर को इतना वायरल करो कि उसके माँ बाप को इसकी कारस्तानी का पता चले। यही भाषा थी उस व्हाट्स अप में। अगर इतनी सी बात का ख़तरा एक लड़की नहीं समझती है और एक लड़का नहीं समझता है तो ये देश का दुर्भाग्य है। क्या राष्ट्रवाद के नाम पर हम अपनी आज़ादी ऐसे लंपट तत्वों के पास गिरवी रख सकते हैं ? माँ बाप इस तरह से सोचे कि संस्कृति बचाने के नाम पर कहीं ऐसे लोगों ने उनके बच्चों को घेर का मार दिया या शर्मसार करने की इस तरकीब से डरकर उनके बच्चों ने ख़ुदकुशी कर ली तो क्या होगा।

सोशल मीडिया आम नागरिक की आज़ादी कुचलने का माध्यम बनता जा रहा है।

टीवी थोक में लोगों को गद्दार बताने लगा। एंकर चीख़ रहे थे। चिल्ला रहे थे। धारणाएँ हमेशा के तय हो गई। मैं ऐसी वहशी आवाज़ों के शोर में डूबने लगा। लगा कि हम संतुलन खो रहे हैं। लगा कि कुछ ज्यादा हो रहा है। सवाल सही या गलत का नहीं है। जब भी लगे कि हमारी ही बात अंतिम रूप से सही है तभी वो वक्त होता है कि हम ठहर कर सोचें। संशय को जगह दें। एक बार फिर से सवाल करें।

 

 


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