नासिर शाह (सूफ़ी)
जुल्म जब चरम पर हो तो देखने वालो की रूह कांप जाती है. छोटे- मोटे सडक हादसे मे घायल व्यक्तियों को देखने मे लोगो का मुँह बिगड जाता है . आज के इस दौर मे महसूस होता है की दुर्घटनाओ मे घायल व्यक्तियों का दर्द उन लोगो के सामने जरा सा भी नही है जिनको  जानबुझकर सरेआम काटा जा रहा है, नंगा करके शरीर को जिंदा जलाया जा रहा है, बच्चो और लडकीयो  के छोटे छोटे टुकडे करके कचरे मे फेंका जा रहा है या समंदर मे बहाया जा रहा है, सरेआम औरतो की आबरू लूटकर जानवरो से बुरा सुलूक किया जा रहा है. लाखो निर्दोष लोगो की लाशों पर नंगा नाच किया जा रहा है. मैदानो, जंगलो और संमदरो मे लाशों के ढेर एेसे बिछे हुए है जैसै बरसात के कीडे मकोडे हो. यह नरसंहार हिटलर की तानाशाही से भी कई अधिक क्रुर प्रतीत होता है.
स्पष्ट है की जिक्र यहॉ रोंहिग्या मुसलमानो पर हो रहे जुल्म का हो रहा है. बात सिर्फ रोंहिग्या  लोगो पर हो रहे जुल्म की ही नही है. सारी स्थिति समझने के लिए हमे सर्वप्रथम ऑखो से साम्प्रदायिकता का चश्मा हटाना होगा. पुरी दुनियां पर दृष्टि डाले तो मालूम होता है की  दुनिया मे जुल्म हर धर्म के लोगो पर किसी ना किसी तरीके से किया जा रहा है. कहने को तो दुनियां ने भले ही बहुत उन्नति कर ली हो लेकिन दुनिया के लगभग सभी देश अपने यहॉ के लोगो के दिये गये  मानवाधिकारों की रक्षा करने मे असमर्थ रहै है.
म्यांमार मे जुल्म सिर्फ रोंहिग्या मुसलमानो पर ही नही हो रहा है बल्कि हजारो हिंदु परिवारों पर भी हो रहा है अतः स्पष्ट होता है की दुनिया मे शांति के दूत के रूप मे जाने वाले बौद्ध लोगो ने आंतकवादी रूप धारण कर लिया है. बौद्ध आंतक के नाम पर वे बरसो से अपने यहॉ रह रहे लोगों को अपना मानने से इन्कार कर रहै है और उनके नागरिक अधिकार छीनकर उन पर जुल्म कर रहै है. म्यांमार मे रह रहै 25 लाख मुस्लिमों मे करीब 10 लाख रोंहिग्या मुसलमान है जो सदियों से म्यांमार के रखाइन क्षेत्र मे रह रहै है, इनके पुर्वज भले ही अराकान से हो लेकिन ये लोग सदियों पहले म्यांमार आकर बस गये. इनका रहन-सहन, संस्कृति व अन्य समस्त गतिविधियाँ विश्व के सबसे गरीब लोगो की तरह है.
1982 मे म्यांमार सरकार ने इनके समस्त नागरिक अधिकार छीनकर इन्हे बहुत दयनीय हालत मे लाकर रख दिया. इनकी शिक्षा, चिकित्सा व अन्य सभी मूल भूत सुविधायें बन्द कर दी गई.
सयुंक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट मे कहा गया है की दुनिया मे अगर सबसे ज्यादा जुल्म हो रहा  है तो वह रोंहिग्या लोगो पर हो रहा है. संघ के  इस महत्वपूर्ण आंकड़े के बाद भी दुनिया के सभी देश हाथ पर हाथ धरे सिर्फ तमाशा देख रहै है. कोई भी इन मजलूम लोगो की मदद के लिए आगे नही आ रहा है और जब ये लोग खुद संघर्ष करके अपनि देश से भागकर दुसरी जगह शरण ले रहे है तो अफसोस की बात है की कोई इनको शरण देने को भी तैयार नही है.
बांग्लादेश, थाईलैण्ड, मलेशिया औऱ इंडोनेशिया आदि देशो ने अपने हाथ खडे कर लिए है, साथ ही “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के लिए प्रसिद्द भारत मे भी रोंहिग्या की शरण पर प्रश्न उठने लगे है,  जबकी इतिहास गवाह है की भारत मे अब तक आये सभी शरणार्थियों को सम्मान के साथ शरण दी गई है. भारत मे करीब 40000 रोंहिग्या शरणार्थी है.
म्यांमार नेता ‘सू की’ ने अपने ही  देश के रोंहिग्या लोगो से 1823 से पहले तक के रहने के नागरिकता के एेसे दस्तावेज़ मांगे है जिन्हे वह देने मे असक्षम है क्योंकी उन्है  कई वर्षों से सभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर रखा है तो एेसे मे नागरिकता के प्रमाण उपलब्ध करवाना असंभव है.
गौरतलब है की रोंहिग्या के नाम से कुछ असामाजिक संगठनों ने म्यांमार सेना पर हमला किया था जिसके परिणामस्वरूप इन निर्दोष रोंहिग्या लोगो पर जुल्म ढाया जा रहा है,  जबकी अभी यह भी स्पष्ट नही है की हमलावर कौन थे और उनका मकसद क्या था.
अगर मान भी लिया जाए की हमलावर रोंहिग्या ही थे तब भी कुछ लोगो के जुर्म की सजा लाखो निर्दोष लोगो को देना कहॉ का न्याय है? बरसो से चले आ रहै रोंहिग्या लोगो पर जुल्म को रोकने के लिए विश्व के सभी देशो एंव सस्थांओ को आगे आकर लोगो के मानवाधिकारों की रक्षा करनी चाहीए.

Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें

अभी पढ़ी जा रही ख़बरें

SHARE