सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन को असंवैधानिक करार दिए जाने का फैसला मोदी सरकार के लिए एक ज़बरदस्त झटका है .. इतिहास में ऐसे कई मौके आये हैं , जब न्यायपालिका ने राजनेताओं के असंवैधानिक व्यव्हार पर कड़ी टिप्पणियां कीं और उन्हें कानून और संविधान के मूल ढांचे के अनुपालन के लिए बाध्य किया . इसी वजह से विदेशी मीडिया तक यह कहने को मजबूर हो जाता है कि विश्व में न्यायपालिका को जितनी स्वतंत्रता भारत में है उतनी किसी और देश में नहीं.

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ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की कोलेजियम प्रणाली को बदलने और इन नियुक्तियों में सरकार के हस्तक्षेप को बढ़ाने वाला जो संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा पास किया गया था , वह राजनेताओं को और अधिक निरंकुश बनाने के लिए था या लोकतंत्र को मज़बूत बनाने के लिए था , अथवा किसी और उद्देश्य के लिए था ?

. . यही वजह है कि ” राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ” के गठन पर ही कई सवाल उठने लगे थे . आयोग के ज़रिये सरकार को न्यायपालिका में हस्तक्षेप का अवसर मिलने की आशंका व्यक्त की जा रही थी . आयोग में विधि मंत्री की मौजूदगी स्पष्ट इंगित कर रही थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राजनीति से प्रेरित और प्रभावित होगी .यह आयोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करता प्रतीत हो रहा था .

शायद यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग अर्थात NJAC को असंवैधानिक करार दिया और कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति पहले की तरह कोलेजियम प्रणाली से ही होगी और इसमें सरकार या संसद का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा. यह कथन कि -” भारतीय लोकतंत्र को इसके चुने हुए प्रतिनिधियों से बचाना चाहिए ” –देश के वर्तमान लोकतंत्र की बदहाल तस्वीर को बताता है जो कि देश के राजनैतिक दलों और उनके नेताओं द्वारा तैयार की गयी है . इस निर्णय पर अरुण जेटली की तरफ से काफी कड़ी प्रतिक्रिया आई है . उन्होंने कहा कि अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को कमज़ोर किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जायेगा /// जेटली जी का यह वक्तव्य या तर्क अपने आप में बहुत कमज़ोर है . सच्चाई तो यह है कि देश में कई ऐसे मौके आये हैं जब ” चुने हुए ” लोगों ने ही लोकतंत्र को कमज़ोर किया है , कानून और संविधान की धज्जियाँ उड़ाई हैं , खुद को संविधानेत्तर-संस्था की तरह व्यवहार करते हुए देश के कानूनों को ठेंगा दिखाया है .

ऐसे में इसी ” गैर चुने हुए लोगों ” अर्थात न्यायपालिका के माननीय न्यायाधीशों ने अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी समझते हुए उन निरंकुश व्यक्तियों / संगठनों /पार्टियों पर नकेल कसी और लोकतंत्र को मज़बूत करने का काम किया है ! अगर जेटली जी मानते हैं कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है तो उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि इस स्वतंत्रता को ख़त्म या सीमित करने का कोई प्रयास क्यों किया जाना चाहिए जो कि NJAC के गठन से स्पष्ट होता है ??? . न्यायपालिका और विधायिका में हमेशा से एक टकराव की स्थिति निर्मित होती आई है . विधायिका का कहना है कि न्यायपालिका सिर्फ क़ानून की व्याख्या कर सकती है , कानून बना नहीं सकती , जबकि न्यायपालिका हमेशा इस बात पर सजग रहती है कि संसद कोई भी ऐसा कानून न बना सके जो संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता हो .अगर यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट से रद्द न होता तो इस बात की सम्भावना थी कि सरकार उस व्यक्ति को न्यायाधीश नियुक्त करती , जो उसकी इच्छा के अनुसार फैसले दे और उसके इशारों पर नाचे .

ऐसा न करने पर शायद उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ता जिसकी आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता . इससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा धूमिल होती और जनता के विश्वास को भी आघात पहुंचता . इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इस आयोग को रद्द कर के एक हिसाब से जनता की आकाँक्षाओं को ही अपना स्वर दिया और लोकतंत्र को मज़बूत किया है ///.

एक बात तो तय है कि देश की आम जनता को जितना भरोसा न्यायपलिका पर है उतना संसद के सदस्यों पर नहीं . इस अवमूल्यन के लिए कुछ नेताओं का खुद का आचरण ज़िम्मेदार है न कि संसद स्वयं . फिर भी जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने ” राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग ” को असंवैधानिक करार दे कर न्यायाधीशों की नियुक्ति को विधायिका से मुक्त रखने का फैसला दिया है , उससे कम से कम उनको तो ज़बरदस्त झटका लगा ही होगा , जो ” कानून मेरी मुट्ठी में ” का सपना ले कर लोकतंत्र को अपने हिसाब से हांकना चाहते थे ///

( मोहम्मद आरिफ दगिया ) 19/10/2015


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