न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दस्तानों में

सभी अमन ओ इंसाफ पसंद लोगों और संगठनों द्वारा देश में चल रहे ज़ुल्म ओ न इंसाफी के कारोबार के ख़िलाफ़ मुल्क भर में बराबर धरने और मुज़ाहिरे किये जारहे हें और जिस को जिस तरह मोक़ा मिल रहा है या जो तरीक़ा समझ आरहा है उस के हिसाब से आवाज़ उठा रहा है !

मगर साथियो आप सब की तमाम कोशिशों के बावजूद हलात वहीं के वहीं हें ,इस से अंदाज़ा हो रहा है की शासन प्रशासन पर और मिडिया पर इन तमाम कोशिशों का कोई ख़ास असर नहीं होरहा है या फिर उन्होंने यह तय कर लिया है कि चाहे कितनी भी मुखालिफत हो उनको जो करना है वह वही करेंगे जो उन्होंने तय करलिया है !

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फ़िर भी सभी लोग मुबराकबाद के मुस्ताहिक़ है जो इस ज़ुल्म की आंधी के ख़िलाफ़ खड़े हुए हें, जो नहीं चाहते के मुल्क में ज़ुल्म ओ सितम का नंगा नाच हो.देश की छवि पूरी दुन्यां में ख़राब हो और मुल्क किसी भी तरह से कमज़ोर हो !

जब हमरी तमाम कोशिशों के बावजूद हलात में कोई बदलाव नहीं आता तो मन में सवाल आता है कि ऐसे हालात में हम किया करें ? क्या यह सब यूंही चलता रहेगा?किया मज़लूम इंसाफ के लिये दर दर की ठोकरें खता फिरेगा और ज़ालिम और ज़ुल्म करने के लिये आज़ाद घूमता फिरेगा?

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दोस्तों और साथियो! असल में आज जो भी हालत हें वह इन नफ़रत की राजनिति करने वालों की कुछ दिन या कुछ सालों की महनत का नहीं बल्कि सदयों (दशकों) की महनत और ज़हर अफ्शानी का नतीजा हे लिहाज़ा सिर्फ़ धरने और अह्तिजाज या कानूनी चाराजोई से शायद अब काम बन्ने वालानहीं है , इस के लिये तो हम सब अमन ओ इंसाफ पसंद लोगों को इस नफ़रत की आग को प्यार मुहब्बत और भाई चारे की शबनम से ठंडा करना होगा , वरना होसकता है हमारे मुज़हिरों (धरनों ) से कुछ समय के लिये तो ज़ुल्म ओ सितम का यह सिलसिला रुक जाए मगर ख़त्म नहीं होगा ! ज़ालिम ज़ुल्म करने का कोई और नया रास्ता निकाल लेगा!

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इस लिए ऐसे हालात में बहुत ज़रूरी है कि देश में आपसी भाई चारे को बढ़ावा दिया जाए और आपस में जो ग़लत फहमियां पैदा होगई हें या पैदा करदी गईं है उनको दूर किया जाए और आपसी रिश्तों को बहतर बनाने की कोशिश की जाए!इसी में मुल्क ओ मिल्लत की भलाई और तरक्क़ी मुमकिन है और यही बात देश हित में भी है और यही असल राष्ट्रवाद है!

लेखक इनाम उर रहमान समाजिक कार्यकर्ता हैं।


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