मुझे आज भी वे दिन बहुत याद आते हैं जब गर्मियों की छुट्टियां होतीं और हम ननिहाल जाते। मेरा ननिहाल दोरासर राजस्थान के झुंझुनूं जिले में है। वो भी क्या दिन थे! हम दिनभर बहुत उधम मचाते। जब शाम होती तो नानाजी की अंगुली पकड़कर खेतों में जाते। मेरे नाना बहुत धैर्यवान मनुष्य थे। मैंने उन्हें कभी गुस्सा होते नहीं देखा।

जब हमारी शरारतें बहुत ज्यादा बढ़ जातीं तो वे हमें कुछ किताबें लाकर देते और इस तरह हम पढ़ने में मशगूल हो जाते। उनके पास सभी किताबें धार्मिक ही होतीं। किस्से-कहानी और मनोरंजन वाली पत्रिकाओं का नितांत अभाव था।

एक बार उन्होंने मुझे श्रीराम के जीवन पर आधारित कोई किताब दी जो गीता प्रेस, गोरखपुर ने प्रकाशित की थी। गीता प्रेस बहुत बड़ा नाम है। श्रीराम को पढ़कर मैंने महसूस किया कि वास्तव में महानता क्या होती है। राम ही थे जिन्होंने भाई के लिए गद्दी को ठोकर मार दी और खुद वनवास चले गए। उनके भाई भरत भी इतने महान कि कसम ले ली कि जब तक बड़े भैया अयोध्या नहीं लौटेंगे, वे गद्दी पर नहीं बैठेंगे, बल्कि साधु की तरह जीवन बिताएंगे।

पता नहीं मेरे मुल्क हिंदुस्तान में जाति और संप्रदाय का जहर कहां से आ गया, क्योंकि मेरे राम ने तो शबरी के जूठे बेर खाते वक्त भी न उसकी जाति पूछी और न उसका धर्म। चाहते तो राजाओं के मेहमान बन सकते थे, लेकिन महलों में न जाकर उस गरीब-बूढ़ी औरत की कुटिया में गए। जब रावण से जंग की और लंका फतह कर ली तो सुनहरा मौका था कि यहां के राजा बन जाएं, लेकिन नहीं बने। विभीषण को शासन सौंपा और फरमाया- मेरे लिए तो मां और मादरे-वतन की मिट्टी जन्नत से भी बढ़कर हैं। कितना बयान करूं, श्रीराम की महानता बताने वाली तो ऐसी कई-कई घटनाएं हैं।

गर्मियों की छुट्टियों के बाद स्कूल खुले। हमारी बदमाशियों पर थोड़ी लगाम लगी। अब हम स्कूल में अखबार-पत्रिकाएं पढ़ने लगे। अखबारों से पता चलता था कि अयोध्या में बसे भरकर जा रही हैं। कोई कहता था कि हर हिंदू से एक ईंट और एक रुपया लिया जाएगा। जब हम अध्यापकों से पूछते तो उनका जवाब होता- चुपचाप अपनी किताबों में ध्यान लगाओ, अभी तुम बच्चे हो।

और पढ़े -   कामरेड ज़फर - हमने उसे खो दिया जो हमारे लिए बरसों से लड़ रहा था

उसके बाद दिन, महीने, साल बदले। एक-एक कर कई बातें पढ़ने-समझने को मिलीं। कोई कहता कि वहां रामजी का मंदिर था। फिर बाबर आया और उसने मस्जिद बनवा दी। किसी का जवाब होता- साहब, माना कि हजारों साल पहले श्रीराम की पैदायश शहर अयोध्या में हुई थी, पर मंदिर यहां था ही नहीं। बाबा तुलसी से बढ़कर रामजी का भक्त और कौन होगा? उन्होंने भी अपनी किताब में कहीं जिक्र तक नहीं किया। उस दौर में कई संत-महात्मा पैदा हुए, एक ने भी नहीं लिखा कि बाबर ने उनका मंदिर ढहाया।

किसे सच मानूं? हर एक की दलील दमदार लगती है। इससे अलग एक और तस्वीर है। विवाद के बाद हुए दंगों ने सैकड़ों लाशें बिछा दीं। उनके जिस्म के घाव और उनसे बहता खून देखकर मैं कैसे अंदाजा लगाऊं कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान! क्या इन्सानों की लाशें देखकर राम और अल्लाह खुश होंगे? अलबत्ता अयोध्या ने कई राजनीतिक दलों का करियर जरूर बना दिया। उन्हें राम और अल्लाह से कोई मतलब नहीं है। मतलब है सिर्फ वोटों से। उनकी स्पष्ट रणनीति है कि लोगों को मंदिर-मस्जिद के बखेड़े में उलझा दो ताकि वे रोटी न मांगें। यह रणनीति खूब कामयाब हो रही है।

मुझे नहीं मालूम कि मंदिर-मस्जिद का यह मुद्दा कब सुलझेगा। अगर यह मुद्दा सुलझाने की जिम्मेदारी मुझ पर होती तो मैं ये तीन सुझाव देता।

1- सभी राजनेताओं को इस मामले से अलग किया जाए। जिन्होंने फसाद किया है, उन पर मुकदमा चला जाए। इसके बाद विवादित जमीन के तीन हिस्से किए जाएं। एक हिस्से में मंदिर बने, दूसरे हिस्से में मस्जिद और इन दोनों के बीच में एक बहुत अच्छा अस्पताल बनाया जाए। नाम रखो राम-रहमान अस्पताल। अगर ऐसा हो तो यह फैसला पूरी दुनिया सराहेगी और हिंदुस्तान से सीखेगी कि इन्साफ क्या होता है। यहां आम-अवाम को मुफ्त में या बहुत कम कीमत में इलाज मिलेगा, लोगों की जिंदगी बचेगी तो इससे बड़ी पूजा-इबादत और क्या होगी! कुरआन तो एक जिंदगी को बचाने का पुण्य पूरी मानवता को बचाने के बराबर बताता है। (देखें –  5:32) मैं तो इस फैसले को सबसे ज्यादा सराहूंगा।

और पढ़े -   काश खेल को खेल ही रहने दिया होता

2- दूसरी सूरत में भी राजनेताओं को इस मामले से दूर किया जाए। हिंदू भाई मुसलमानों के लिए एक बहुत अच्छी मस्जिद बनाकर दें और मुस्लिम भाई एक आलीशान राम मंदिर। इसमें कोई सौदा न हो। एक-दूसरे की इज्जत और साथ-साथ जीने का वायदा। मगर यह तभी मुमकिन है जबकि राजनेता अपनी टांग न अड़ाएं। मैं इस फैसले को भी सराहूंगा।

3- अगर राजनेताओं को इस मामले से दूर न रखा जाए, वे माहौल को बहुत जहरीला बनाने को आमादा हों तो उस आखिरी सूरत में मुसलमान एक बड़ा कदम उठाएं। ऐसे लोगों की राजनीति खत्म करने के लिए कहें कि हिंदू भाइयों के लिए ये लो जमीन और बनाओ मंदिर, मगर अब मुल्क में अमन होना चाहिए, सबको रोटी मिलनी चाहिए। फिर यह कहते न फिरना कि हम इसलिए विकास नहीं कर सके क्योंकि मंदिर नहीं बना पाए। आप मुल्क को मंदिर दीजिए, हम मुल्क को स्कूल, कारखाने और दवाखाने देंगे। देखते हैं कि कौन ज्यादा सेवा करता है, कौन अमनपसंद है।

मैं मानता हूं कि आपमें से कई लोग मेरी बात से सहमत नहीं होंगे लेकिन इस फैसले के परिणाम बहुत असरदार होंगे। देश में एक बहुत अच्छा पैगाम जाएगा। वहीं कई पार्टियों की राजनीति खत्म हो जाएगी। राम मंदिर के मुद्दे ने कई बेरोजगार नेताओं को संसद-विधानसभा भेज दिया। उनका एक बड़ा मुद्दा समाप्त हो जाएगा। इसके बाद अवाम उनसे रोटी-रोजगार मांगेगी, जो वे दे नहीं सकेंगे। जल्द ही लोगों का उनसे मोह भंग हो जाएगा। इसलिए वे चतुर हैं और चाहते हैं कि राम मंदिर का मुद्दा बना रहे, यह कभी न सुलझे।

और पढ़े -   हिन्दू तय करें की उन्हें क्या चाहिए?

मुसलमान चाहें तो इन्हें बेपर्दा कर सकते हैं। मुसलमान यह समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे कि जो सांप्रदायिक पार्टियां आज पूरी दुनिया में अपनी जीत का डंका बजा रही हैं, उनकी असल ताकत आप ही हैं। जब तक आप उनका सख्त विरोध करते रहेंगे, पूरा-पूरा दिन सोशल मीडिया में उन्हें खरी-खोटी सुनाते रहेंगे, उनका प्रचार होता रहेगा और वे जीतते रहेंगे।

अमरीका में मिस्टर ट्रंप कभी राष्ट्रपति नहीं बनते मगर मुसलमानों ने बार-बार उनका विरोध कर सबको बता दिया कि दुनिया में ट्रंप नाम का भी कोई प्राणी है। आप अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी शक्तियों के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। वे लोगों को आपके नाम से डराकर वोट ले रहे हैं, इसलिए बड़ी जरूरत है कि मुसलमान कुछ ऐसे बड़े फैसले लें कि गैर-मुस्लिम इन सांप्रदायिक पार्टियों से अपना गला छुड़ाएं और आपको आगे बढ़कर गले से लगाना चाहें। अन्यथा आप इनका विरोध करते रहेंगे और ये जीतते रहेंगे।

याद कीजिए, हमारे हुजूर (सल्ल.) का वह फैसला जब कुरैश अपनी मनमानी शर्तों पर अड़ गए। फिर हुदैबिया का समझौता हुआ, उसमें भी ऐसी शर्तें जोड़ी गईं कि आपके साथी तो मायूस ही हो गए। मगर आपने (सल्ल.) मुस्कुराकर फरमाया- जाओ, ये भी मंजूर है। जिन शर्तों को कुरैश अपनी जीत समझ रहे थे, वे ही उनके लिए जी का जंजाल बन गईं। आगे क्या हुआ, तारीख गवाह है।

देश के हिंदू और मुस्लिम भाइयों के लिए अयोध्या एक बहुत बड़ा मौका है। आप चाहें तो इसके जरिए दुनिया को दिखा सकते हैं कि अमन, इन्साफ और भाईचारा क्या है। अन्यथा नेताओं के पीछे भीड़ में चलते रहें। आखिर आपसे ज्यादा सस्ते वोटर और कहां मिलेंगे! मेरा राम तो आज भी उनसे खफा है जो गरीबों के घर जलाकर शान से संसद में बैठे हैं।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



Facebook Comment
loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें

SHARE