शुक्रिया उन सभी का जिन्होंने भारत माता की जय बोलने के विवाद को फिर से तूल दिया। यही विवाद कभी वंदे मातरम को लेकर होता था और होता रहा है और भारत माता की जय को लेकर। वंदे मातरम और भारत माता की विकास यात्रा में कई वर्षों का अंतर है मगर कब दोनों एक-दूसरे के पूरक हो जाते हैं यह ठीक ठीक बताना मुश्किल है। इन विवादों से हमें यकीन होता है कि घबराने की जरूरत नहीं है। हम कहीं गए नहीं हैं, वहीं हैं। भारत की राजनीति ने पहले भी इस विवाद का सामना किया है और आगे जब भी होगा सामना कर लेगी। भारत माता की जय बोलने में न तो समस्या है न नहीं बोलने में। समस्या है कि आप कौन होते हैं बोलने वाले कि भारत माता की जय ही बोलो या देशभक्त होने का यही अंतिम प्रमाण क्यों है। बहरहाल बहस हो रही है। कुछ तर्क इस खेमे के लोग जीत रहे हैं तो कुछ तर्क उस खेमे के लोग। रेफरी परेशान है कि जल्दी मैच टाई हो जाए, कि घर भागे। यह सच है कि भारत माता है लेकिन क्या यह भी सच है कि भारत माता हमेशा से थी। हमने कब पहले पहल भारत माता को देखा था जिस रूप में आज देखते हैं।

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पुरानी दिल्ली के कैलेंडर पोस्टरों की दुकान में मिलने वाली भारत माता की तस्वीरों को देखिएगा कभी। पता चलेगा कि भारत माता के स्वरूप की कितनी विविधता है। कई शोध छात्रों ने इन कैलेंडर और पोस्टरों में देवी-देवता से लेकर भारत माता की विकास यात्रा का गहन अध्ययन किया है। ज्योतिंद्र जैन, मृणालिनी सिन्हा, गीती सेन और सदन झा जैसे कई लोग इन तस्वीरों के जरिए राष्ट्रवाद, उसके तमाम पहलू का अध्ययन करते हैं। सुमति रामास्वामी ने भी एक किताब लिखी है THE GODESS AND THE NATION, MAPPING MOTHER INDIA। ज़ुबान की प्रकाशक उर्वशी बुटालिया ने इस किताब की तस्वीरों और जानकारी के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी है। हम अंतिम बात कहने का दावा नहीं करते मगर यही कोशिश है कि हम इस विवाद के जरिए भारत माता की विकास यात्रा को समझें। क्या हमारी भारत माता शुरू से वैसी ही दिखती है जैसी आज दिखती हैं। हर तस्वीर में भारत माता बदल जाती है। हमारी कोशिश बस इतनी है, आपको इतिहास की यात्रा पर ले चलें और वहां से लौटकर कुछ और बात करें। जरूर कुछ बातें अधूरी रह जाएंगी और कुछ ऐसी बात भी होगी जिसे आप जोड़ना चाहेंगे, लेकिन इसके लिए अभी से माफी। पुराणों में जन्मभूमि से लेकर जगत के स्वरूप को बयान करने वाले तमाम श्लोक मिलेंगे।

क्या मुल्क का वैसा नक्शा भी मिलता है जैसा हम आज देखते हैं। कभी सोचिएगा गर नक्शा और ग्लोब न हो तो आप किसी भी मुल्क की कल्पना कैसे करेंगे। इनके पहले लोग अपने मुल्क की कल्पना कैसे करते होंगे। देश के दायरे में तो गांव भी था और राज्य भी। एक गांव से दूसरे गांव जाना परदेस जाना हो जाता था। विनोबा भावे ने एक बार चुटकी लेते हुए कहीं कहा था कि एक शब्द है राष्ट्र। अगला शब्द है महाराष्ट्र और तीसरा शब्द है सौ राष्ट्र। तो हमारे राष्ट्र में एक से लेकर सौ राष्ट्र वाले नाम के राज्य से लेकर क्षेत्र मौजूद हैं। इस राष्ट्र की एक माता भारत माता की जय बोलने को लेकर विवाद हो रहा है।

अवनींद्र नाथ  टैगोर की कल्पनाशीलता से बनी हमारी पहली भारत माता। तस्वीरों के ज़रिये लोगों ने पहली बार इस भारत मां का दीदार किया था। 1905 में स्वदेशी आंदोलन के दौरान अवनींद्र नाथ टैगोर की कूची से जब भारत माता का स्वरूप अवतरित हुआ तो देश की आज़ादी का सपना देख रहे लोगों की कल्पनाओं में आग लग गई। जब यह पहली बार एक पत्रिका में छपी तो शीर्षक था स्पिरिट आफ मदर इंडिया। अब अवनींद्र नाथ  टैगोर ने पहले इनका नाम बंग माता रखा था बाद में भारत माता कर दिया। सोचिए अगर पहला नाम बंग माता ही रह जाता तो भारत माता की विकास यात्रा कैसी होती। उस बंगाल में इस तस्वीर से पहले आनंदमठ की रचना हो चुकी थी और वंदे मातरम गाया जाने लगा था। इस भारत माता के चार हाथ हैं। शिक्षा, दीक्षा, अन्न और वस्त्र हैं इनके हाथों में। आज़ाद भारत की फिल्मों में यही रोटी कपड़ा और मकान बन जाता है। कोई हथियार नहीं है कोई झंडा नहीं है। ज्ञात तस्वीरों के हिसाब से पहली भारत माता एक सामान्य बंगाली महिला भी नज़र आती हैं।

जल्दी ही देश भर में भारत माता की अनेक तस्वीरें बनने लगीं। क्रांतिकारी संगठनों ने भारत माता की तस्वीरों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। छापों के दौरान भारत माता की तस्वीर मिलते ही अंग्रेजी हुकूमत चौकन्नी हो जाती थी। अनुशीलन समिति, युगांतर पार्टी भारत माता की तस्वीरों का इस्तेमाल करते हैं तो पंजाब में भारत माता सोसायटी, मद्रास में भारत माता एसोसिएशन का वजूद सामने आता है। सब अपनी-अपनी भारत माता गढ़ने लगते हैं लेकिन धीरे-धीरे तस्वीरों में भारत माता का रूप करीब-करीब स्थाई होने लगता है।

भारत माता के चार हाथ की जगह दो हाथ हो जाते हैं। शुरू में ध्वज दिखता है फिर त्रिशूल और तलवार दिखने लगता है। कई तस्वीरों में तिरंगे का भी आगमन होता है। किसी में चक्र नहीं है तो किसी में चरखा है। कुछ तस्वीरों में भारत माता के चरणों में श्रीलंका भी आ जाता है। तो आज अगर आप पुरानी तस्वीरों को देखेंगे तो विभाजन से पहले का पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी नज़र आएगा। देखने वालों ने देवी दुर्गा में भारत माता को देखा और भारत माता में मां दुर्गा को। अबनिंद्रनाथ टगौर की भारत माता बंगाल की होने के कारण न तो शेर के साथ हैं न त्रिशूल के साथ। कई तस्वीरों में शेर के रूप भी अलग-अलग दिखते हैं। कहीं शेर गुर्रा रहा है तो कहीं विजयी भाव से शांत है। कुछ तस्वीरों में शेर को इस तरह से भी देखा गया है कि भारत माता ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत की सवारी कर रही हैं। उन्हें अपने लगाम में ले लिया है।

देवी होने के कारण कुछ लोगों को लगता है कि भारत माता तो हैं मगर सबकी माता नहीं हैं। दरअसल हमारी आज़ादी की लड़ाई में कई आधुनिक तत्व हैं मगर स्वतंत्रता आंदोलन अतीत के हिन्दुस्तान के साथ चलता है। उसके प्रतीकों से पूरी तरह अलगाव नहीं कर पाता। इस वजह से आपको राष्ट्रवाद के साथ धार्मिक प्रतीक दिखेंगे और धार्मिक व्यक्ति राष्ट्रवादी होने का दावा करते मिलेंगे। यहां राष्ट्रवादी से मेरा मतलब स्वतंत्रता सेनानी से है। उत्तर और पूरब की भारत माता की तस्वीरें तो मिलती हैं लेकिन दक्षिण में क्या हो रहा था। वहां भारत माता की कल्पना कैसे पहुंचती है।

सुमति रामास्वामी ने अपनी किताब में एक तस्वीर पेश की है। 20 अप्रैल 1907 की है। बंगाल में अबनिंद्रनाथ टगौर 1905 में भारत माता की कल्पना करते हैं तो सुदूर दक्षिण में महाकवि सुब्रह्मण्यम भारती अपने अखबार के मुख्य पृष्ठ पर भारत माता की तस्वीर छापते हैं। इंतिया अखबार का नाम है। यह तस्वीर नए साल की देवी के रूप में छपी है लेकिन उनका एक हाथ ग्लोब पर है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई दिख रहे हैं, जो नमन कर रहे हैं। तब तो किसी ओवैसी को दिक्कत नहीं हुई कि एक देवी के कैलेंडर में वे क्यों शीश नवा रहे हैं। भारत माता की कई तस्वीरों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई होते हैं।

एक तस्वीर को भारती ने कुछ समय बाद छापा था। तस्वीर छप रही है दक्षिण भारत में लेकिन भारत माता की इस तस्वीर में वंदे मातरम लिखा है देवनागरी में। भारत माता के चरणों में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई हैं, नाव पर खड़े हैं। इस तस्वीर में भारत माता के एक हाथ में उर्दू में कुछ लिखा हुआ है। यह लिखा हुआ है अल्लाहो अकबर। यह सबकी भारत माता हैं लेकिन क्या आज के जमाने में यह संभव है। अक्सर लोग भारत माता की तस्वीर में माता देखने लग जाते हैं और माता में सिर्फ देवी दुर्गा। भारती ने इस तस्वीर में सिर्फ भारत देखा। इसलिए वहां हिन्दी में वंदेमातरम है और उर्दू में अल्लाहो अकबर।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर सुब्रह्मण्यम भारती का जिक्र करते हैं। मोदी सरकार आने के बाद जब कई लोगों के डाक टिकट को बंद कर दिया गया था मगर बाल गंगाधर तिलक, बिस्मिल्लाह ख़ां और सुब्रह्मण्यम भारती के डाक टिकट को नियमित करवाया गया था। मार्च 2015 में श्रीलंका की संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने भाषण देते हुए भारती कि कविता की कुछ पंक्तियां पढ़ीं थीं और कहा था कि भारती महान राष्ट्रवादी कवि थे। भारती पहले शख्स हैं जिनके बारे में जिक्र मिलता है कि उन्होंने भारत माता की तस्वीर से लेकर मूर्तियां बनाने के प्रयास किए। वर्ना बहुत कम लोगों का पता चलता है कि बनाने वाले कौन थे, बनवाने वाले कौन थे।

एक बड़ा ज़बरदस्त किस्सा मिलता है। 1911 में महाकवि भारती अबनिंद्रनाथ की बनाई भारत माता की मूर्ति बनाने का प्रयास करते हैं। मूर्तिकार कहता है कि इस भारत ने कुछ गहने ही नहीं पहने हैं। तो भारती के एक साथी वीवीएस अय्यर कहते हैं कि कैसे होंगे गहने। विदेशियों ने भारत को लूट लिया है। तो भारती ने जवाब दिया कि क्या विदेशी गंगा और यमुना को भी लपेटकर ले गए हैं। हमारी भारत माता तो साम्राज्ञी हैं।

जो भी है भारत माता का वजूद है। अब हम उसे देख सकते हैं। चाहें तो अपनी मर्ज़ी के हिसाब से बना सकते हैं। भारत माता की जय एक नारा हो सकता है लेकिन भारत माता एक नहीं हो सकती है। कई लोगों के लिए भारत माता वो भारत माता है जिनके हाथ में तिरंगा है। लेकिन आरएसएस की वेबसाइट पर जो भारत माता की तस्वीर मौजूद हैं उसमें तिरंगा नहीं है। एक हाथ में भारत मां आशीर्वाद दे रही हैं तो दूसरे हाथ में भगवा ध्वज है। भारत माता की जय बोलने से पहले जान लेने में बुराई नहीं कि किस भारत माता की जय कहना है। जिनके हाथ में तिरंगा है उनकी जयकारा लगानी है या जिनके हाथ में तिरंगा नहीं है उनकी जय-जय कहनी है। वैसे संघ की वेबसाइट पर जो भारत माता है उनके हाथ में तिरंगा क्यों नहीं है। आरएसएस के प्रमुख ने कहा है कि सबको भारत माता की जय कहना होगा। उन्होंने कहा कि वक्त आ गया है कि नई पीढ़ी को बताना होगा कि उन्हें भारत माता की जय बोलना होगा। पर यह अपने आप आना चाहिए और युवाओं के विकास का हिस्सा होना चाहिए।

भारत माता और वंदे मातरम को लेकर राजनीति हो रही है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है। राजनीतिक दलों की दिक्कत यही है कि वे कभी इस मामले पर ईमानदारी से बहस नहीं करते, खासकर कांग्रेस। जिसके अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गाया गया हो वह ऐसे घबराती है जैसे कभी सुना न हो। भाजपा भारत माता की जय की दावेदारी ऐसे करती है कि जब तक आप बोलोगे नहीं आप देशभक्त हो ही नहीं सकते। महाराष्ट्र विधानसभा में जो हुआ वह एक विधायक को बाहर कर दिया जाना भर नहीं है, हमारी राजनीति की हार है। हार इस मायने में है कि वह ठीक से खड़ी होकर मुद्दे को आपके सामने रखती नहीं है। जैसे नज़रें बचाकर इस मामले में कांग्रेस भाजपा हो गई।

भारत माता की जय बोलने से कहीं ज्यादा दिलचस्प है भारत माता की विकास यात्रा। बाज़ार ने भी मौका देख भारत माता कहना शुरू कर दिया था। आज़ादी से पहले ब्रिटेन और जर्मनी से आने वाले सामानों में भारतीय देवी देवताओं की तस्वीरों और भारत माता की तस्वीर का भी इस्तेमाल होने लगा था ताकि लोग उन्हें अपना समझकर खरीदने लगें। मैनचेस्टर के बने विदेशी कपड़ों के जवाब में देसी व्यापारियों ने भी अपने उत्पादों पर भारत माता की तस्वीर लगानी शुरू कर दी।

भारत माता और भारत मां के साथ एक जगह हिन्द माता का नाम भी मिलता है। माचिस की इस डिब्बी पर हिन्द माता की तस्वीर है। यह तस्वीर कब की है इसकी जानकारी नहीं मिल सकी मगर क्या भारत माता हिन्द माता भी कही जाती होगी। क्या अब भी कही जा सकती है। भारत का नाम भरत से हुआ है। एक पुरुष के नाम पर मुल्क की पहचान है लेकिन भारत माता क्या राजा भरत की मां हैं। इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। एक और तस्वीर है जिसमें भारत माता की तस्वीर है मगर वह अहमदाबाद में बने कपड़े के थान पर है। तो भारत माता सिर्फ देशभक्ति का प्रदर्शन नहीं है बल्कि इनके ज़रिये भक्तों की जेब तक भी पहुंचा जा सकता है इसकी खोज उस वक्त के बाजार ने तभी कर ली थी।

रहमान का जब वंदे मातरम आया था तब इस गाने पर फैशन शो तक होने लगा था। दरअसल देशभक्ति का यही स्वाभाविक रूप होता है। हम जब चाहें जहां चाहें इस्तेमाल कर सकें। आज़ाद भारत में भी बाज़ार ने भारत माता का खूब सहारा लिया। एक तस्वीर में ऊपर लिखा है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा। बीच में भारत का नक्शा बना है। नक्शे के बीच में भारत माता हैं। भारत माता रथ पर सवार है जिसे शेर खींच रहा है। हाथ में तिरंगा है। एक हाथ में शेर की लगाम है। नीचे किनारे लिखा है गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं टुडे चाय। नीचे एकता कपूर के लोकप्रिय सीरियल क्योंकि सास भी कभी बहू थी की बहुएं हैं। बा से लेकर तुलसी तक हैं। तुलसी की आज एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान है और वे भारत की मानव संसाधन मंत्री हैं। वे तब कलाकार थीं लेकिन आज भी कई सांसद विज्ञापन तो करते ही हैं। सचिन तेंदुलकर, मनोज तिवारी, हेमा मालिनी…।

भारत माता की महिमा जितनी अपरंपार है उतनी ही तस्वीरों की विविधता अपार है। इन तस्वीरों में कभी भारत माता को गांधी आशीर्वाद दे रहे हैं तो कभी गांधी को भारत माता। एक तस्वीर में गांधी भारत माता की गोद में हैं। कई जगहों पर गांधी नेताजी भी देव रूप में बादलों के बीच नज़र आते हैं। यह तस्वीरें बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन ने उपलब्ध प्रतीकों का ही इस्तमाल किया लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए। यह तस्वीरें ही तब के लिए टेलिविज़न और ट्वीटर के समान थीं जिसके ज़रिये लोगों ने नेहरू को देखा गांधी को देखा, आज़ाद और भगत सिंह को देखा। एक तस्वीर में नेहरू तिरंगे को सलाम कर रहे हैं लेकिन वैसे सलाम नहीं कर रहे जैसे आम तौर पर करते हैं। यहां पर नेहरू का हाथ छाती के पास है। आम तौर पर संघ के लोग इस तरह से सलाम करते हैं। भारत माता बंधनों से मुक्त हैं। उनके दोनों हाथ शिकंजों को तोड़ खुले हुए हैं। तस्वीर के नीचे खड़े सारे लोग सीने के पास हाथ ले जाकर सलाम कर रहे हैं। मैं बहुत ज़्यादा इस तरह की सलामी के इतिहास में नहीं जाना चाहता।

– रविश कुमार


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