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मुसलमान से आतंकवाद तक – पार्ट 1 पढने के लिए यहाँ क्लिक करें 

फर्राह शाकेब
फर्राह शाकेब

लेकिन ये मुद्दा भी जल्दी ही खत्म हो गया.. उसके बाद भी बीजेपी पूरी तरह आक्रमक नही हो आई के अचानक वर्ष 2001 के तहलका स्टिंग के आधार पर बीजेपी पुर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण पर सीबीआई ने घेराबन्दी शुरू की जिसमें लक्ष्मण को ब्रिटेन की एक फर्जी कम्पनी एम/एस वेस्ट इंड इंटरनेशनल को ठेका देने के लिए कैमरे पर कथित हथियार विक्रेता से रुपये लेते दिखाया गया था। बीजेपी अपने पुर्व अध्यक्ष पर रिश्वत के गम्भीर आरोप से बच पाती के 30 मई 2005 को आडवाणी जी जन्मभूमि की पावन तीर्थ यात्रा पर गए और वहाँ जिन्ना की मज़ार पर मत्था टेक आये और यहीं सांस नही ली बल्कि लगे हाथों जिन्ना को सेक्युलर भी बता दिया जो आडवाणी जी की राजनितिक पाठशाला आरएसएस की मूल विचारधारा पर करार प्रहार था.

6 जून 2005 को आडवाणी जी स्वदेश लौटे तो पूरा देश लोकसभा में विपक्ष के नेता पर हंस रहा था. मुम्बई अधिवेशन में अध्यक्ष पद की कुर्सी चली गयी जिस पर संघ की पसन्द से राजनाथ सिंह विराजमान हो गए और आडवाणी जी की चौतरफा फ़ज़ीहत होनी शुरू हुई. 29 जुलाई 2005 को जौनपुर में ट्रेन ब्लास्ट हुआ तो मीडिया के कैमरे फिर जैश और लश्कर की तरफ घूम गए लेकिन बीजेपी को इसका एहसास हो चुका था के जिन्ना प्रकरण पर बीजेपी का मूल वोट बैंक उससे खासा नाराज़ है..

विपक्ष के पास मुद्दा नही था क्योंकि वो खुद ही घिरा हुआ था और ऐसे में अचानक दीपावली से पहले 29 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में कई सीरियल ब्लास्ट हुए तो देश का ध्यान फिर देश की आंतरिक सुरक्षा की तरफ खिसका और बीजेपी थोड़ा ऊर्जावान महसूस करने लगी. लेकिन ये ऊर्जा भी अस्थाई थी क्योंकि 12 दिसम्बर 2005 को प्रश्न के बदले नोट प्रकरण में बीजेपी के 11 सांसद के संलिप्त होने की खबर आ गयी और सत्ता पक्ष उनके इस्तीफ़े की मांग पर अड़ गया.
बीच बीच में संघ और बीजेपी की आपसी रस्साकशी की खबरें भी राजनतिक चिंतकों के माध्यम से आने लगी थीं.फिर उसी दौर में 7 मार्च 2006 को वाराणसी के संकट मोचन मन्दिर में बम धमाके और 14 अप्रैल 2014 को दिल्ली की जामा मस्जिद पर आतंकी हमला हुआ और देश में फिर आंतरिक सुरक्षा और मुसलमान इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा जैसी चर्चा होने लगी.इसी बीच 3 मई 2006 को बीजेपी के थिंक टैंक माने जाने वाले प्रमोद महाजन की हत्या उनके भाई के द्वारा ही पारिवारिक कलह के कारण कर दी गयी जिसके कारण पूरी बीजेपी शर्मिंदगी महसूस कर रही थी और बगारु लक्ष्मण से ले कर महाजन तक जैसे उनकी पहली पंक्ति के नेताओं पर उंगलियां उठ रही थीं.11 जुलाई 2006 को मुम्बई में ट्रेन ब्लास्ट होता है 11 अगस्त 2006 को इम्फाल के मन्दिर में धमाका और उसजे बाद 8 सितम्बर 2006 को मालेगावँ की मस्जिद में शब् ए बरात के मौके पर ब्लास्ट होता है आउट ये सभी चर्चाएँ पीछे चली जाती हैं और फिर सिस्टम और सुरक्षा एजेंसियों में सुधार का मुद्दा अहम होता है.

ये भी सभी जानते हैं की संघ परिवार बीजेपी की सत्ता के बाहर निकल कर पकिस्तान से वार्ता अथवा कोई सम्बन्ध नही रखना चाहता है. 20 फ़रवरी से 23 फ़रवरी 2007 तक पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी का दौरा कार्यक्रम आयोजित था और शिवसेना विहिप संघ से ले कर बीजेपी का एक बड़ा भाग इस दौरे का विरोध कर रहा था..18 फ़रवरी 2007 को हिंदुस्तान पाकिस्तान के दरमियाँ चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में रात के अँधेरे में ब्लास्ट किया गया..मार्च 2007 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए और उस वक़्त बीजेपी ने अपने इतिहास का सबसे बदतरीन प्रदर्शन किया उत्तर प्रदेश में क्योंकि जिन्ना प्रकरण, प्रमोद महाजन प्रकरण और बंगारू लक्ष्मण प्रकरण जिन पर 6 दिसम्बर 2006 में रिश्वतखोरी केस में प्राथमिकी दर्ज की गयी थी के कारण बीजेपी का मूल वोट बैंक उससे काफी हद तक खिसक चुका था.

Muzaffarnagar Riots Court Lets Off 10 In Murder Of Boy Woman
और यही वो वर्ष था जब बीजेपी सबसे अधिक राजनितिक संकट में घिरी हुई थी.हिंदुत्व की प्रयोगशाला गुजरात में उसी वर्ष दिसम्बर में विधानसभा चुनाव होने वाले थे.बीजेपी को एहसास हो चुका था जे जिस तरह के कुकर्म एनडीए शासन काल में हुए हैं और उनके नेताओं ने जो बोया है उसकी बहुत ज़ियादा अच्छी फसल इस बार गुजरात में नही मिलेगी तो अब केवल ध्रुवीकरण ही सफलता मन्त्र है जो गुजरात में तो बहुत आसान है.इधर कांग्रेस ने भी 2004 के आम चुनावों में जनता विशेषकर मुसलामानों से टाडा और पोटा समाप्त करने का वादा किया था और उसकी जगह UAPA लाने का आश्वासन दिया गया जिसके सम्बंध्द में अब कांग्रेस के 2 वर्ष पुरे होने के बाद दबाव बढ़ने लगा था.उस साल तो बम धमाकों की बाढ़ सी आ गयी और शुरुआत हुई 18 मई 2007 को हैदराबाद मक्का मस्जिद ब्लास्ट,25 अगस्त 2007 गोकुल चाट ब्लास्ट और लुम्बिनी पार्क ब्लास्ट हैदराबाद, 11 अक्टूबर 2007 अजमेर शरीफ़ दरगाह ब्लास्ट, ईद के दिन 14 अक्टूबर 2007 को लुधियाना में ब्लास्ट, 24 नवंबर 2007 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी, लखनऊ, फैज़ाबाद में ब्लास्ट और इन तमाम धमाकों को हरा रंग दे कर मीडिया के सहयोग से पूरी तरह ध्रुवीकरण का इंतज़ाम कर लिया गया और पुनः 2007 में बीजेपी की नैय्या गुजरात में पार लग गयी जबकि उसी समय तुलसी प्रजापति, कौसर बी और भी कई अन्य मामले तथा गुजरात में पहली बात सामने आना वाला को-ओपरेटिव घोटाला इन सबको साल भर होने वाले धमाकों के धुएं में गुम कर दिया गया और क्योंकि केंद्र सरकार निर्दोशों की मौत को रोक नही पा रही थी और बीजेपी के पास ही उनकी हिफाज़त का मूल मन्त्र है.

मार्च 2008 में लोकसभा चुनाव 2009 के लिए आडवाणी जी को प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री का खिताब दे कर प्रोजेक्ट करने की शुरुआत हुई लेकिन तब तक एनडीए शासनकाल के घोटालों की एक लम्बी लिस्ट जिसमे ताबूत घोटाले,दूरसंचार घोटाले, जूदेव घोटाले, सेंटुर होटल में डील, दिल्ली भूमि आवंटन घोटाले, गैस एजेंसी पेट्रोल पम्प आवंटन घोटाले, रेड्डी बन्धु सब के सब जनता के सामने चुके थे.दूसरी तरफ कांग्रेस के ऊपर टाडा और पोटा समाप्त करने का दबाव बढ़ता जा रहां है और दबाव बनाने में राजनितिक चिंतक, वामपन्थी और देश का वो न्यायप्रिय हल्क़ा सबसे आगे था जिसे देश की आंतरिक सुरक्षा की कीमत पर एक समुदाय धर्म विशेष के साथ अन्याय नही चाहिए बल्कि जो दोषी हैं उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए.दोनों राजनितिक दल के लिए चुनावी वर्ष 2008 बड़ा चुनौतीपूर्ण था और इस चुनौती से निपटने के लिए साम्प्रदायिकता की फसल ही काट कर सत्ता के बगिया में हरियाली वापस लाइ जा सकती है क्योंकि बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद साम्प्रदायिकता और उन्माद ने देश की लगभग सभी राजनितिक पार्टियों को ईंधन और कच्चा माल आसानी सइ उपलब्ध करवाया है.फिर शुरू हुआ बम धमाकों का दौर जिसमे 13 मई 2008 जयपुर, 25 जुलाई 2008 बैंग्लोर,26 जुलाई अहमदाबाद, 13 सितम्बर 2008 दिल्ली, 27 सितम्बर 2008 दिल्ली, 1 अक्टूबर 2008 अगरतल्ला, 21 अक्टूबर 2008 इम्फाल, 30 अक्टूबर 2008 आसाम में निर्दोषों की बलि ली गयी और उसके बाद 26 नबम्बर 2008 मुम्बई पर पाकिस्तानी आतंकवादियों के हमले ने जनहित से जुड़े तमाम मुद्दों को गर्त में धकेल दिया और कांग्रेस ने UAPA पास कर 2009 का चुनाव जीता तो दूसरी तरफ़ संघ संचालित आतंकवाद के नेटवर्क का पर्दाफाश करने वाले जांबाज़ अधिकारी शहीद हेमन्त करकरे, विजय सलास्कर, नारायण आप्टे निपटा दिए गए.

याद रखिये गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकरी आर वी एस मणि ने दावा किया कि 26/11 को हुआ मुंबई हमला और संसद पर हुआ हमला सत्तारुढ़ सरकार की साजिश थी। उन्हें ये बातें किसी एसआइटी अधिकारी ने बताई थी । 2009 में गृह मंत्रालय में अवर सचिव के पद पर रहे मणि ने 21 जून 2013 को तत्कालीन केंद्रीय शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्णा को अदालत द्वारा नियुक्त की गई एसआईटी के सामने अपनी गवाही के संबंध में बताया था, क्यों कि उस दौरान वो उसी मंत्रालय में पदस्थ थे.लेकिन इस ब्यान पर कांग्रेस और बीजेपी की दोनों की तरफ से किसी आक्रमक प्रतिक्रया का न आना स्वयम् चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत को चरितार्थ करता है.सत्तारूढ़ सरकार का तातपर्य संसद पर हमला बीजेपी ने करवाया और मुम्बई ताज पर कांग्रेस ने और दोनों का फायदा मिला संघ को एक तरफ फ्रंट पर बीजेपी रही और दूसरी तरफ सदा की तरह पीछे से वार करने वाली संघ पोषित कांग्रेस और स्वयम् पूरा संघ क्योंकि यही वो दौर था जब देश ने संघी आतंकवाद और भगवा आतंकवाद का चेहरा देखा और आतंकवाद की परिभाषा में कुछ संशोधन की आवशयक्ता महसूस की गयी थी जब करकरे साहेब एक एक कर साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित, असीमानंद, लोकेश चौहान, राजेन्द्र चौधरी,और अभिनव भारत के पुरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया था.अखबारों में भगवा आतंकवाद जैसे शब्दों ने जगह बनाई थी और ये सच्चाई ऐसी है जिससे कोई इनकार नहीं कर सकता के पूरा संघ परिवार और उसके अनुषांगिक संगठन जिस तरह बौखलाया हुआ था और अपने ज़हरीले बयानों से जिस तरह करकरे साहेब को मानसिक प्रताड़ित कर रहा था के इस स्तिथि में करकरे साहेब के दावों की मज़बूती मिलनी स्वाभाविक थी. मुम्बई एटीएस को आतंकी टीम ऑफ़ सोनिया तक कहा जाने लगा था और पूरा संघ क़बीला उन्हें पद से हटाने की मांग पर अड़ा था.फिर उन्हें जान से मारने की धमकियां तक मिलने लगी थीं और कुछ न्यूज़ चैनलों के अनुसार मौत से 23 घण्टे पहले भी उन्हें जान से मारने की धमकी दी गयी थी जिसके बाद उन्हें 26.11.2008 की रात रास्ते से हटा दिया गया और उनके संदिग्ध क़त्ल ने कई सवालों को जन्म दिया जिसका जवाब शायद ही मिल पाये.धीरे धीरे बाद में परभणी (2003) पूर्णा और जालना (2004) नान्देड़ (2006) मोडासा, थाणे, पनवील (2008) तिनकासि ( तमिलनाडु ) और गोआ (2009) और कानपुर ( 2010 ) में होने वाले धमाकों में भी अभिनव भारत, सनातन संस्था और हिन्दू जनजागरण समिति जैसी उग्र संघी संगठनों की संलिप्तता सामने आई और देश ने नम आँखों से करकरे को याद किया.2009 में कांग्रेस जित गयी और फिर लगभग 2012 अंत तक अजमल क़साब, अफज़ल गुरु जैसे मुद्दे संकट मोचन की तरह काम आते रहे.फिर 2013  जब कांग्रेस के कई घोटाले सामने आ चुके थे और लोकसभा चुनाव में एक साल का समय रह गया था तो कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर में तत्कालीन गृह मंत्री सुशिल कुमार शिंदे ने 21 जनवरी को भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद सम्बन्धी ब्यान दिया जिसके बाद फिर राजनितिक तामपान में साम्प्रदायिकता का तड़का लगा और महीने भर बाद 21 फ़रवरी को दिलसुख नगर हैदराबाद में हुए बम धमाकों ने शिंदे के ब्यान की प्रतिक्रया साबित कर. इधर बिहार में मोदी के प्रधामन्त्री पद के मुद्दे पर जदयू भाजपा का 17 साल पुराना गठबन्धन टूटा और 7 जुलाई 2013 को बोधगया में धमाके हुए और उसके बाद मोदी की रैली में 27 फ़रवरी 2013 को पटना के गांधी मैदान में ब्लास्ट हुआ और सबसे आश्चर्य की बात ये रही के मैदान में धमाके होते रहे तो पटाखे थे और मोदी के भाषण समाप्ति के बाद धमाके हो गए.बारह घंटे के भीतर संदिग्ध पकड़े गए, रांची में छापा पड़ा और कुबूलनामा भी आ गया कि पकड़े गए व्यक्ति ने मुजफ्फरनगर के दंगे का बदला लेने के लिए विस्फोट किया था।

ठीक चार दिन पहले 24 अक्टूबर को राहुल गांधी ने इंदौर में बिना किसी संदर्भ के मुजफ्फरनगर दंगे के पीड़ितों से आइएसआइ के संपर्क किए जाने का हवाला दिया था। क्या यह संयोग है?
क्या राहुल गांधी का बयान वास्तव में गंभीर और सुविचारित नही लगता ??

माफ़ कीजियेगा . यही है देश की घोषित सांप्रदायिक और तथाकथित सेक्युलर राजनीति के गठजोड़ का सच जिसके निशाने पर सिर्फ सिर्फ इस देश का मुसलमान और दलित हैं के इशरत आतंकवादी है और सोनी सोरी नक्सली है.कांग्रेस के घोटालों का जवाब चाहिए जनता को तो धमाकों के धुएं में आप को ढूंढना होगा और हिन्दू राष्ट्रवादी ही आपका मसीहा है जो अच्छे दिन लाएगा जिसके रास्ते में आतंकवादी बड़ी रुकावट है और राजनीति के चूल्हे में पेट्रोल ईंधन की कमी पूरी होती रहेगी इस दौरान एक तरफ धमाके होते रहे दूसरी तरफ मुस्लिम युवाओं को पूर्व निर्धारित योजना के तहत निशाना बनाने का सिलसिला चलता रहा .इस दौरान बटला हाउस इंकॉन्टर, वारंगल एनकाउंटर से ले कर जेलों तक में क़तील सिद्दीकी, खालिद मुजाहिद जैसे मुस्लिम युवाओं को मौत की नींद सुलाया जाता रहा और अपने अपने हिसाब से राजनितिक लाभ हानि का गणित भी एडजस्ट होता रहा.

इस वक़्त भी देश के राजनितिक हालात को ग़ौर से समझना चाहेंगे तो बहुत ज़ियादा मुश्किल नही है समझना के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में साल 2015 में धार्मिक स्वतंत्रता नकारात्मक पथ पर रही क्योंकि धार्मिक सहिष्णुता बदतर हो गई और धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बढ गया. अपनी सालाना रिपोर्ट में कांग्रेस से अधिकार प्राप्त यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने भारत सरकार से सार्वजनिक रूप से उन पदाधिकारियों और धार्मिक नेताओं को फटकार लगाने को कहा है जिन्होंने धार्मिक समुदायों के बारे में अपमानजनक बयान दिये हैं और उस रिपोर्ट के अनुसर भारत में मोदी के आने के बाद से अल्पसंख्यक समुदाय खासतौर पर ईसाई, मुसलमान और सिखों को धमकी, प्रताडना और हिंसा की कई घटनाएं हुई हैं जिसमे हिन्दू कट्टरपन्थी संगठन का है और प्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के नेता उनका संरक्षण कर रहे हैं और केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक ताजा रिपोर्ट ये बताती है केम साल 2015 में भारत में साम्प्रदायिक हिंसा में 17 फीसदी वृद्धि हुई है. ये खबर अच्छे दिन, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इण्डिया वाली सरकार के मुंह पर कालिख पोत रही है तो दूसरी तरफ प्रधानमन्त्री की शैक्षणिक योग्यता पर बहस हो रही है.बीजेपी के पास जवाब देने को कुछ नही है. कांग्रेस अगस्तता वेस्टलैंड पर घिरी है तो अब यही एक आतंकवाद और देश की आंतरिक सुरक्षा अंतिम ब्रह्ममास्त्र है जो हमेशा की तरह संकट मोचन बन सकता है तो दिल्ली से 13 मुस्लिम नौजवानों को उठा लिया गया.मीडिया परम्परागत तरीके से हरकत में आ गयी और राजनितिक तापमान एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा और जैश, लश्कर, आईएसाइएसाइ, इत्यादि पर केंद्रित है…

ये तमाम बातें मेरा वहम या मेरा निजी विचार भी हो सकती हैं और वास्तविकता से इनका कोई सम्बन्ध नही भी हो सकता लेकिन पुनः एक बार इतना ही कह सकता हूँ के ये विषय इतना गम्भीर और व्यापक है के एक लेख में समेट पाना सम्भव नही लेकिन जिस तरह राजनितिक दल, ख़ुफ़िया एजेंसियां और सामन्ती मीडिया का पूरा नेटवर्क मुसलामानों के ख़िलाफ़ एक निर्धारित एजेंडे को धरातल पर लाने की दिशा में तमाम क़ानून,और दिशा निर्देशों को रौंध कर प्रयासरत हैं उसके ख़िलाफ़ अब देश कई न्यायप्रिय जनता के समर्थन से ज़मीन पर उतरने की ज़रूरत है वरना हम आने वाली पीढ़ियों को मुंह तक दिखाने क़ाबिल नही होंगे.


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