फर्राह शाकेब
फर्राह शाकेब

अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद अब एक ऐसा शब्द जो अब देश दुनिया की आंतरिक सुरक्षा से कहीं अधिक सामन्तवाद, मनुवाद और पूंजीवाद के इस दौर और भौतिकतावादी अवसरवादी राजनीती और राजनेताओं की सुविधा, लाभ, हानि, वोटबैंक और सत्ता के गणित से कहीं अधिक जुड़ गया है और इससे भी कहीं अधिक जुड़ा है अपनी तथाकथित संस्कृतयों की तबाही के डर से प्रतिशोधात्मक रवैय्ये और व्यवाहार के साथ एक धर्म विशेष, एक समुदाय विशेष की नकारात्मक छवि निर्माण और भारत में चाणक्य निति का अनुसरण करते हुए एक बड़े समुदाय के सामने एक काल्पनिक शत्रु के अस्तित्व को जीवंत रखने की मंशा और इरादों के साथ अपनी विध्वंसक उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक उच्च मारक क्षमता वाला साधन बन चुका है.

इस विषय पर केवल एक मज़्मून में सब कुछ तहरीर कर देना असम्भव है लेकिन कुछ बिंदुओं पर चर्चा अवशय की जा सकती है विशेषकर भारत में आतंकवादी घटनाओं और उनके गर्भ से निकलने वाली लाभ हानि के गणित और सांख्यिकी पर कुछ रौशनी डालना इस मज़्मून का मक़सद है.आज़ादी के बाद से ही इस मुल्क में ब्राह्म्णवाद का वर्चस्व स्थापित करने और सेक्युलर हिन्दुस्तान को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करने के मनसूबे पर लम्बी प्लानिंग के साथ ज़मीनी तौर पर उस सिम्त में कोशिश शुरू कर दी गयी थी और ज़ाहिर है के मुल्क की सबसे बड़ी अकलियत इस हिन्दू राष्ट्र के रस्ते का सबसे बड़ा रुकावट थी लिहाज़ा क़ौम ए मुस्लिम जो ज़ेहनी , जिस्मानी और समाजी तौर पर प्रताड़ित करने का सिलसिला शुरू किया गया. कांग्रेस हमेशा पर्दे के पीछे रही, इस पुरे सिलसिले की मॉनिटरिंग की और फ्रंट पर संघ परिवार ने मोर्चा सम्भाला. ये बात किसी से ढंकी छुपी नही है के संघ क़बीला षड्यंत्र, मक्कारी, फरेब, नफरत, झूठ, प्रोपोगंडा इत्यादि का एक ही शब्द है और अपने मक़सद को पूरा करने के लिए वो इन सफलता मन्त्रों के साथ किसी भी हद तक जा सकता है. मुसलामानों को प्रताड़ित करने के लिए सांप्रदायिक दंगों की शुरुआत की गयी जिसमे चुन चुन कर उन इलाक़ों को निशाना बनाया गया जिन इलाक़ों में मुसलमान आर्थिक और सामाजिक तौर पर मज़बूत थे. सबसे पहले आर्थिक रूप से इस क़ौम की कमर तोड़ने की कोशिश शुरू हुई और उसके बाद बाबरी मस्जिद की शहादत अमल में आई.

बाबरी की शहादत के बाद संघ और कांग्रेस की तमाम साज़िशों का तोप का रुख मुसलामानों तालिमयाफ़्ता पीढ़ी की तरफ मोड़ दिया गया और कभी बाबरी का बदला कभी गुजरात का बदला के नाम पर बम धमाके और उसके बाद उसके इलज़ाम में मुस्लिम नौजवानों की दहशतगर्दी के नाम पर गिरफ़्तारी का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक जारी है. दंगे फसाद और दहशतगर्दी का मौज़ू सिर्फ हमें प्रताड़ित करने तक ही सीमित नही रहा है बल्कि इससे कई शिकार एक साथ किये गए. एक तरफ हमे शारीरिक, सामाजिक, मानसिक, आर्थिक रूप से प्रताडित करना और दूसरी तरफ इसका राजनितिक लाभ ले कर सत्ता सुख भोगना, एक तरफ 18 परसेंट की आबादी से बक़ीया बहुसंख्यक समाज को डराये रखना और दूसरी तरफ मज़हब ए इस्लाम की  क्रूर से क्रूरतम छवि निर्माण और ब्रह्मणवाद के पाखण्ड को उससे बेहतर बताते हुए दलित आदिवासियों को हिन्दू बनाये रखते हुए फिर्कावारणा फसादात में हमारे खिलाफ़ इस्तमाल करने के रास्ते को आसान बनाये रखना , ये सबकुछ एक साथ चलता रहा है और चल रहा है.

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इस मज़्मून में विशेषकर पिछले कुछ सालों में जितनी भी दहशतगर्दी की वारदात और उसके बाद अरेस्टिंग हुई हैं उस दौरान मुल्क के राजनितिक हालात पर नज़र डालते हुए ये सवाल फिर एक बार ज़ेहन में आता है के क्या वाक़ई इस मुल्क का बहुसंख्यक समाज इस क़दर पूर्वाग्रही हो चुका है इस्लाम और मुसलमान के ताल्लुक़ से के उसने कभी ये सोचने की ज़हमत क्यों नही की बाबरी विध्वंस के बाद तक़रीबन 7 8 साल तक सिमी का दफ़्तर खोल कर मुस्लिम युवाओं को ” बाबरी का बदला “” नाम पर उठाने की मुहीम चलती रही.

गुजरात दंगों के बाद 7-8 साल तक इंडियन मुजाहिदीन का दफ़्तर खोल कर मुस्लिम युवाओं को” गुजरात का बदला” नाम पर उठाने की मुहीम चलती रही, फिर जब इंडियन मुजाहिदीन वाला स्टंट बहुत ज़ियादा दमदार नही रह गया गया तो आईएसाइएसीआई, जैश ए मोह्हमद, लश्कर ए तैबा, इत्यादि पर फ्रेम किया जाने का सिलसिला शुरू किया गया.

कमाल की बात ये है की न कभी बाबरी के मुजरिमों को खरोंच आई और न गुजरात के क़ातिल को.. बल्कि बाबरी से ले कर दादरी तक में हमारी लाशें गिरा कर, हमारे युवाओं को बेगुनाही के 10-10 साल जेलों की कोठरियों में सजा कर उनपर आतंकवादी का ठप्पा लगा कर सब के सब सत्ता के सुख भोग रहे हैं.

जो लोग मुल्क के राजनितिक हालात पर गहरी नज़र रखते हैं उन्हें याद होगा के सितम्बर 2001 में जब मुल्क में पहली बार जनता के सामने कारगिल युद्ध के बाद ताबूत घोटाला जैसे शब्द की बाज़गुज़श्त सुनाई दी थी ठीक उसी वक़्त 1 अक्टूबर 2001 को जम्मू कश्मीर विधानसभा के पास बम धमाका हुआ और जनता का ध्यान थोड़ी देर के लिए ताबूत घोटाले की तरफ से हटाने में कामयाबी हासिल कर ली लेकिन ये कामयाबी बहुत ज़ियादा टिक नही पाई और महीने डेढ़ महीने बाद ही एक बार फिर देश की संसद  ताबूत घोटाले की आवाज़ से गूंजने लगी. एक बार फिर शहीदों की आत्मा संघ और भाजपा के देशभक्तों को डराने लगी थीं और नौबत यहां तक आ पहुंची थी के विपक्ष तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडिस साहेब का इस्तेफ़ा मांगने पर अदा था. जॉर्ज साहेब एनडीए के संयोजक हुआ करते थे और उनके इस्तेफ़ा देने से केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अस्थिर हो सकती थी.

चुनावी विश्लेशकों और राजनितिक चिंतकों ने जॉर्ज साहेब के इस्तेफ़ा देने के बाद मध्यावधि चुनावों तक का इशारा दे दिया था और भाजपा इस बात को समझ चुकी थीं के अभी मध्यविधि चुनाव हुए तो ये ताबूत घोटाला एनडीए की ताबूत में आखरी कील साबित होगा.

13 दिसम्बर 2001… अचानक गृह मन्त्रालय की स्टिकर लगी सफ़ेद अम्बेसडर कार पर हथियारों से लैस दहशतगर्द संसद भवन पहुँचते हैं, गोलियां चलती हैं, किसी नेता को कोई खरोच तक नही आती, सभी दहशतगर्द ढेर होते हैं और पाकिस्तान से तार जुड़ते है. मीडिया के अनुसार लोकतन्त्र पर हमला होता है और संघियों का मनुवादी राजतन्त्र कुछ दिनों के लिए और सुरक्षित हो जाता है.जनता देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत हो कर पाकिस्तान के विरुद्ध आक्रोश में अपना हर दर्द भूल जाती है.

Muzaffarnagar Riots Court Lets Off 10 In Murder Of Boy Woman

गुजरात की सत्ता पर मोदी के बैठने के बाद पहली बार दिसम्बर 2002 में विधानसभा चुनाव होने थे. बीजेपी गुजरात में पहली बार तन तक एक अघोषित क़ातिल बन चुके नेता की अगुआई में विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही थी. वाजपेयी जी प्रधानमन्त्री हुआ करते थे और एक तरफ जहां तत्कालीन गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी से ले कर पूरी बीजेपी गुजरात के क़तल ए आम को क्रिया की प्रतिक्रया साबित करने के लिए चीख रही थी, मोदी जी अपना दामन बचा रहे थे वहीँ ठीक उसी वक़्त वाजपेयी ने अपने विदेश दौरे से पहले मिडिया के सामने ये गुजरात के सम्बन्ध में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए ये स्वीकार किया के गुजरात के दंगे भाजपा के माथे पर कलंक हैं और मैं दुनिया को क्या मुंह दिखाऊंगा.अपने सबसे वरिष्ट नेता और प्रधानमन्त्री की स्वीकारोक्ति से पूरी बीजेपी अंदर तक हिल गयी थी और विपक्ष पूरी तरह संसद में भाजपा पर आक्रमण कर रहां था ठीक उसी समय 24 सितम्बर 2002 को गुजरात में अक्षरधाम मन्दिर पर आतंकवादी हमला हुआ और फिर उसे गुजरात का बदला के रूप में प्रचारित करते हुए देश भर में ये प्रभाव देने की कोशीश शुरू की गयी के मुसलमान गुजरात में अराजाकता फ़ैला रहे हैं और गुजरात को इस बहाने न्यायसंगत ठहराने और मोदी को दंगाइयों और आतंकियों से लोहा लेने वाले के रूप में प्रस्तुत करते हुए दिसम्बर 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव की रणभूमि पर विजयी पताका लहरा दिया गया.

संघ वाजपेयी नीत सरकार के आते ही अपने एजेंडे और मूल उद्देश्यों की पूर्ति को आतुर हो उठा था और मुसलामानों की ज़िन्दगी तबाह ओ बर्बाद करना उसका प्राथमिक एजेंडा रहा है इसलिए देश की आंतरिक सुरक्षा की आड़ में पोटा (POTA) जैसे क़ानून को और सख़्त से सख़्त बनाने की मुहीम शुरू की गयी लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को डर लग रहां था के ये एक ब्रहम्मास्त्र है और मुसलामानों की मसीहाई का दावा इसके बाद कमज़ोर पड़ सकता है लिहाज़ा वो इस संशोधन के विरोध में खड़ी थी.अन्य विपक्षी दल भी कांग्रेस के साथ खड़े थे तो इसको आवशयक क़रार देने और अपने आप को ही देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए अंतिम आवश्यकता मनवाने के लिए उसके अनुकूल माहौल बनाना ज़रूरी था.27 जनवरी विरले पारले और 13 मार्च को मुलुंड स्टेशन पर बम धमाके हुए और बीजेपी पोटा में संशोधन को अत्याधिक ज़रूरी क़रार देने की अपनी मुहीम में जुट गयी.फिर  26 मार्च 2003 को गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री और बीजेपी के क़द्दावर नेता हरेन पंड्या की हत्या हुई थी और पंड्या का परिवार और विशेषकर उनकी पत्नी और उनके पिता जी लगातार कह रहे थे की पण्डया की हत्या राजनितिक षड्यन्त्र है और इसके पीछे मुख्यमन्त्री नरेंद्र मोदी का हाथ है क्योंकि पण्ड्या गुजरात दंगों के षड्यंत्र के सम्बन्ध में बहुत सारे राज़ जान गया थे जिसके सर्वाजनिक होने का खतरा उन्हें सता रहा था इसलिए उन्हें रास्ते से हटा दिया गया.ये आरोप काफी गम्भीर थे और केंद्र तथा प्रदेश में सत्तासीन भाजपा पर अपने ही पार्टी के एक नेता की हत्या में हर कुछ दिन में उंगलियां उठ रही थीं.28 जुलाई 2003 को घाटकोपर, 25 अगस्त 2003 को जावेरी बाज़ार मुम्बई और मुम्ब्रा देवी मन्दिर में धमाके हुए और संसद में भारी हंगामे के बाद पोटा में संशोधन हो गया.बीजेपी संसद में कामयाब हुई और देश की आंतरिक सुरक्षा के नाम पर कोई समझौता नही जैसी उपलब्धि अपने खाते में जमा कर फिर उसी संशोधित पोटा के अंतर्गत युवाओं की गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ जिसमे से कुछ पर हरेन पण्ड्या की हत्या का आरोप भी मंढ दिया गया.

वर्ष 2004 में लोकसभा चुनाव होना था और देश की जनता 200 रूपये किलो वाला प्याज़ खा कर खून के आंसू रो रही थी लेकिन बीजेपी के नेतागण फ़ील गुड करवाने के लिए इंडिया शाइनिंग के मन्जन बेच रहे थे लेकिन जब परिमाण आये तो बीजेपी को जनता ने नकार दिया इंडिया शाइनिंग कागज़ी हवाई जाहाज की तरह ज़मीन पर गिर पड़ा.. राजनितिक चिंतक और विश्लेषकों ने माना के बीजेपी की हार गुजरात दंगों की वजह से हुई और गुजरात में जब मोदी की कार्यशैली पूरी तरह सवालिया निशाँ लगने शुरू हुए और पार्टी राजनितिक संकट में घिरी थी तो ठीक उसी वक़्त 15 जून 2004 को मासूम इशरत की बलि ली गयी और रुख मोड़ने की एक और कोशिश हुई लेकिन ये एन्कोउन्टर पहले दिन से ही संदिग्ध रहा और बीजेपी खुद ही इस मामले में पूरी तरह घिर गयी . इधर लोकसभा चुनाव के बाद एक महीने बाद पुर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी जी चुप्पी तोड़ते हुए 12 जून 2004 को ये कहा के

” ये कहना मुश्किल है कि चुनावों में भाजपा की हार के सभी कारण क्या थे? लेकिन गुजरात हिंसा का एक नतीजा था कि हम चुनाव हार गए.”

दुसरा ब्यान बम उन्होंने ठीक एक दिन बाद ही फोड़ दिया के “गुजरात दंगों का असर पूरे देश में महसूस किया गया. इसके बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटा दिया जाना चाहिए था”  पूर्व प्रधानमंत्री और अपनी ही पार्टी के वरिष्ट नेता अटल बिहारी वाजपेयी जी के इन बयानों के बाद तो भाजपा और संघ परिवार में ख़लबली मच गई.भाजपा के अध्यक्ष वेंकैया नायडू के साथ-साथ कट्टरपंथी हिंदुवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बचाव में उतर आए जबकि उदारवादी खेमा मोदी को गुजरात के मुख्यमन्त्री पद से हटाये जाने की वकालत में था.कांग्रेस ने अपनी वेबसाइट INC.IN पर वाजपेयी जी के हवाले से लिखा है के कि वाजपेयी का मानना था कि अगर पार्टी ने मोदी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की तो पार्टी अपनी विश्वसनीयता खो देगी. कांग्रेस की इसी वेबसाइट के मुताबिक वाजपेयी ने मनाली में कहा था कि ”कुछ लोग मोदी को हटाना चाहते थे और मेरी भी यही राय थी.” कुल मिला कर वाजपेयी जी मोदी से पूरी तरह आहत थे और इसीलिए बीजेपी के अंदर उदारवादी और कट्टरपंथी खेमों में भीषण खींचतान चल रही हो. लेकिन क्या वाजपेयी जैसे अनुभवी राजनीतिक नेता को इस विषय पर ऐसी प्रतिक्रिया होने का अहसास नहीं था? यदि पार्टी अध्यक्ष वेंकैया नायडू कुछ सप्ताह पहले तक प्रधानमंत्री रहे अपने नेता की बात काटते नज़र आएँ तो इसका क्या मतलब निकाला जाए? क्या भाजपा में कट्टरपंथी हिंदुवादी खेमा हावी हो रहा है? मीडिया पूरी तरह भाजपा की अंदरुनी खींचतान को सर्वजनिक करने का कोई मौक़ा हाथ से जाने नही दे रहां था थी तो दूसरी तरफ अखबारों में सोनिया गांधी के तथाकथित त्याग की कहानियां जगह बना रही थीं.सुषमा जी को सर मुंडवाने का मौक़ा नही मिला था और सोनिया गांधी पर विदेशी महिला वाला प्रहार उतना धारदार नही हो पा रहा था क्योंकि उस वक़्त संसद में लालू यादव जी गरजते थर, ठीक उसी वक़्त 15 अगस्त 2004 को आसाम के धेमाजी में स्कुल में मासूम बच्चों की लाशें गिरा कर आक्रमक राजनीति की शुरुआत की गयी और बीजेपी ने विपक्ष की हैसियत से कांग्रेस को घेरने का पहला मुद्दा बनाया.

… इस लेख का दूसरा भाग पढ़े 

(पाठकों के लेख में प्रकाशित किये जाने वाले आर्टिकल लेखकों के निजी विचार है, कोहराम न्यूज़ की सहमति आवश्यक नही है )

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