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इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जिसके बारे में समाज में तरह तरह की बातें फैली हुई हैं जिनमें से अधिकतर या तो इसे बदनाम करने के लिए फैलाई गयी हैं या कुछ खुद को पैदायशी मुसलमान कहने वालों की अज्ञानता के कारण फैली हैं…। वैसे भी अच्छे को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है…।

इस्लाम को बुरा साबित करने की कोशिश करने वालों का मुह बंद करने का आसान तरीका यह है कि इसके बताये कानून पे ईमानदारी से चलकर दिखाओ…।

इस्लाम धर्म आदम अलैहिस्सलाम के साथ आया और इसके कानून पे चलने वाला मुसलमान कहलाया…। अज्ञानी को ज्ञानी बनाने का काम इस्लाम ने किया…। इंसान को अल्लाह ने बनाया और जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को दुनिया में भेजा तो कुछ कानून उन्हें बताये, ऐसे ही तकरीबन एक लाख चौबीस हज़ार पैग़म्बर आए और अल्लाह उनके ज़रिये इंसानों को इंसानियत का पैगाम देता रहा… एक इंसान में इर्ष्या, हसद, लालच जैसी न जाने कितनी बुराईयाँ हुआ करती हैं और इनपे काबू करते हुए जो अपनी जिन्दगी गुज़ार देता है सही मायने में इंसान कहलाता है या कहलें की सही मायने में मुसलमान कहलाता है…।

यह जो कुछ गलतफहमियां समाज में फैला दी गई हैं की नमाज़ ,रोज़ा ,हज्ज ,दाढ़ी का नाम मुसलमान है… जबकि मुसलमान नाम है इस्लाम के बताये मुकम्मल कानून पे चलने का और यह कानून बताते हैं की, लोगों पे ज़ुल्म न करो,इमानदार रहो,नफरत,हसद और लालच से बचो, दूसरो की मदद करो और भी बहुत से अहकाम हैं जिनको एक लेख मे शामिल कर पाना मुमकिन नहीं…।

इस्लाम अपराध करने वाले जालिमों का साथ देने, उनसे सहानभूति करने वालों और ज़ुल्म देख के चुप रहने वालों को भी अपराधी करार देता है…
आप कह सकते हैं कि इस्लाम न अपराध करने वालों को पसंद करता है और न ही अपराध को बढ़ावा देने वालों को पसंद करता है…।
यह फ़िक्र करने की बात है कि इंसानियत और अमन का सबक सिखाने वाला इस्लाम आज आतंकवाद के शिकंजे में कैसे फँस गया…?

इंसान की फितरत है कि वो दौलत, शोहरत, ऐश-ओ-आराम के पीछे भागता है और अल्लाह कहता है कि इसके पीछे न भागो वरना जीवन नरक बन जाएगा…। हमें बात समझ नहीं आती और हम लगते हैं दूसरों का माल लूटने, दहशत फैलाने, बलात्कार करने और नतीजे में इंसानियत का क़त्ल होता जाता है…।

पैग़म्बर ए इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही वसल्लम के इस दुनिया से रुख्सत के बाद ऐसे बहुत से ताक़तवर लोग थे जिनका मकसद था दौलत, शोहरत, ऐश-ओ-आराम हासिल करना और वही लोग ताक़त और मक्कारी के दम पे बन बैठे इस्लाम के ठेकेदार…। नतीजे में हक़ की राह पे चलने वाले मुसलमानों और गुमराह करने वाले मुसलमानों में आपस में जंग होने लगी…। कर्बला की जंग इसकी बेहतरीन मिसाल है… जहां एक तरफ यजीद था जो मुसलमानों का खलीफा बना बैठा था और दुनिया में नाइंसाफी फैलाता नज़र आता था… ज़ुल्म और आतंक की ऐसी मिसाल आज तक नहीं देखने को मिली और दूसरी तरफ़ थे पैग़म्बर ए इस्लाम (सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही वसल्लम) के नवासे इमाम हुसैन रज़िअल्लाहु तआला अन्हु जिन्होंने दुनिया को सही इस्लाम सिखाया, इंसानियत और सब्र का पैग़ाम दिया…। नतीजे में उनको ज़ालिमों ने शहीद कर दिया…।

आज भी इस समाज में खुद को मुसलमान कहने वाले दो तरह के लोग हुआ करते हैं… एक वो जो नाम से तो मुसलमान लगते हैं ,नामाज, रोज़ा, हज, ज़कात के पाबंद दिखते तो हैं लेकिन इस्लाम के बताये मुकम्मल कानून पे नहीं चलते… यह वो लोग हैं जो इस्लाम का साथ तभी तक देते हैं जब तक इनका कोई नुकसान न हो… जैसे ही इनके सामने दौलत, शोहरत, औरत आती है यह इस्लाम के बताये अहकामात को भूल जाते हैं और जब्र से, मक्कारी से, झूट फरेब से, दौलत व शोहरत को हासिल कर लिया करते हैं…। कुरअान में इन्हें मुनाफ़िक़ कहा गया है और इनसे दूर रहने का हुक्म है…। ऐसे फरेबियों का हथियार होते हैं समाज के अज्ञानी लोग…।

एक उदाहरण है इस्लाम में पर्दे का हुक्म…

यह सभी जानते हैं कि औरत के शरीर की तरफ़ मर्द का और मर्द के शरीर की तरफ़ औरत का आकर्षित होना इन्सान की फितरत है…। इसी वजह से इस्लाम में इसको उस वक़्त तक छुपाने का हुक्म दिया है जब तक की दोनों को एक दुसरे से शारीरिक सम्बन्ध न बनाना हो…। इस्लाम में शारीरिक सम्बन्ध बनाने के भी कुछ कानून हैं, यानी निकाह के बाद…।
शायरों को भी कहते सुना जाता है कि “चेहरा छुपा लिया है किसी ने हिजाब में, जी चाहता है आग लगा दूँ नक़ाब में” इसका मतलब साफ़ है कि पर्दा उसे बुरा लगता है जो औरत के शरीर को खुला देखना चाहता है…।
इस्लाम में एक दुसरे का “महरम” उसे कहते हैं जिसके साथ शादी न हो सके जैसे माँ, बहन, बेटी, दादी, नानी इत्यादि और जिसके साथ शादी हो सकती है उसे “नामहरम” कहते हैं और नामहरम का एक दुसरे से शरीर का छिपाना आवश्यक (फर्ज) है… संसार की सभी सभ्यताओं में ऐसा ही कानून है बस इस पर्दे का अलग-अलग तरीका है…।

वो औरतें या मर्द जो जानवरों की तरह कहीं भी ,कभी भी, किसी से भी ,शारीरिक सम्बन्ध बना लेने को गलत नहीं समझते यदि अपने शरीर का प्रदर्शन करते दिखाई दें तो बात हजम हो जाती है लेकिन आश्चर्य तो उस समय होता है जब वो लोग जो इस्लाम के कानून को मानने का दावा करते हैं अपने शरीर का प्रदर्शन करते नज़र आते हैं…। कई बार तो हम लोग महरम और नामहरम की परिभाषा भी बदल देते हैं… कभी किसी नामहरम के करीब जाते हैं तो कहते हैं बेटी जैसी है, कभी कहते हैं बहन जैसी है वहीं इस्लाम कहता है यह नामहरम है इस से पर्दा रखो… इसी तरीके से हमने इस्लाम के अहकामात को अपनी आसानी के लिए मनमर्जी तरीके मे ढाल लिया… नतीजा क्या निकला? लोग इस्लाम और मुसलमान से बदजहन होते चले गए…।

अगर आपको यह पहचानना हो कि यह शख्स इस्लाम को मानने वाला है या नहीं, मुसलमान है या नहीं ? तो उसके सज्दों को न देखो, न ही उसकी नमाज़ों को देखो, न उसके लिबास को देखो बल्कि देखो उसके किरदार को, उसकी सीरत को और यदि वो हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वआलैही वसल्लम से मिलती हो, या वो शख्स समाज में अमन और शांति फैलाता दिखे या वो शख्स इंसानों में आपस में मुहब्बत पैदा करता दिखे तो समझ लेना मुसलमान है…।

• ज़ालिम, नफ़रत का सौदागर कभी मुसलमान नहीं हो सकता…।
• बुरा इस्लाम नहीं बल्कि उसका इकरार करने के बाद भी उसके कानून को न मानने वाला इंसान है…।

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तनवीर त्यागी

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