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एक यहूदी महिला हज़रत मोहम्मद (स०) से बस इस बात से थी ख़फ़ा थी थी कि उन्होंने बुतपरस्ती के बदले एक ईश्वर की इबादत पर ज़ोर दिया. उसने इसे अपने ख़ुदा (बुत) का अपमान समझा और हज़रत मोहम्मद (स०) से बदला लेने का सोचा. वो एक ईश्वरवाद का सन्देश देने के लिए रोज़ उसकी गली से गुज़रते थे. एक दिन उस महिला ने सोचा कि अगर उनपर कचरा फेंक दिया जाय तो वो गुस्सा होंगे, चीखेंगे-चिल्लायेंगे तो गली में रहने वाले उनका मज़ाक़ बनायेंगे और उनपे हसेंगे और वो सब मेरी तारीफ़ करेंगे क्यूंकि किसी ने उन्हें कभी गुस्सा होते नहीं देखा था.

एक दिन आप (स०) उसकी गली से गुज़र रहे थे तभी उस महिला ने आप पर छत से कचरा फेंक दिया, आप ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराते ही आगे बढ़ गए. महिला की चाल कामयाब नहीं हुई तो उसने ये रोज़ का मामूल बना लिया कि किसी दिन तो वो गुस्सा होंगे और इस नीयत से वो हर रोज़ उनपर कचरा फेंकती और महिला हज़रत मोहम्मद (स०) बिना कुछ कहे कचरा साफ़ करते और मुस्कुराते हुए आगे बढ़ जाते.

एक दिन आप रोज़ाना की तरह गली से गुज़र रहे थे, उस दिन आप पर छत से कचरा नहीं गिरा तो आप हैरान हुए कि क्या बात है कि आज उस महिला ने मुझ पर कचरा नहीं फेंका? आप ने उसका दरवाज़ा खटखटाया तो अन्दर से एक कमज़ोर आवाज़ आई, कौन? आपने कहा मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह., मैं अन्दर आ सकता हूँ? उस यहूदी महिला ने समझा कि आज मैं कमज़ोर हूँ, मुक़ाबला नहीं कर सकती इसलिए ये बदला लेने आये हैं. लेकिन अन्दर आने का आग्रह इतनी विनम्रता से किया गया था कि वो महिला इनकार नहीं कर सकी और उसने अन्दर आने की इजाज़त दे दी.

अन्दर जाने पर आपने उस महिला से कहा कि आज तुमने मुझपर छत से कचरा नहीं फेंका तो मैं चिंतित हुआ कि कहीं तुम बीमार तो नहीं? उसे बीमार देख आपने कहा कि किसी भी तरह की मदद चाहिए तो मुझ से कहो. हज़रत मोहम्मद (स०) के स्नेही और नर्म लहजे ने उसका सारा डर दूर कर दिया. उसने आपसे पीने के लिए पानी माँगा. आपने उसे एक बर्तन में पानी दिया जिस से उसने अपनी प्यास बुझाई और अपनी पिछले बुरे बर्ताव के लिए माफ़ी मांगी. आपने उसे फ़ौरन माफ़ कर दिया और उसके जल्द स्वस्थ होने की दुआ की और वो जबतक स्वस्थ नहीं हो गयी आप उसकी तीमारदारी को उसके घर जाते रहे, यहाँ तक आप उसके घर को साफ़ करते, उसे खाना खिलाते. वो आपके बर्ताव से बहुत प्रसन्न थी और अंततः उसने इस्लाम क़बूल कर लिया.

अपने ऊपर कचरा फेंकने वाली महिला के साथ हज़रत मुहम्मद (स०) ने कोई बुरा सलूक नहीं किया बल्कि उसके साथ नर्मी का बर्ताव किया सो, जब रह्मतुल्लिलआलेमीन (सभी के लिए एक समान दया भाव रखने वाले) की उनपर कचरा फेंकने से तौहीन नहीं हुई तो कार्टून बनने से या उन्हें कुछ भी अपशब्द कहने से उनकी तौहीन कैसे हो सकती है? पैग़म्बर मोहम्मद (स०) तशद्दुद (हिंसा) के सख़्त मुख़ालिफ़ थे और अपने ऊपर कूड़ा फेंकने वाली बूढ़ी औरत को न सिर्फ़ माफ़ किया बल्कि उसकी तीमारदारी भी की मगर अपने पैग़म्बर को मानने वाली क़ौम उन्हीं के नाम पर हिंसा कर क्या उनकी शान में गुस्ताख़ी नहीं कर रही है?  पैग़म्बर मोहम्मद (स०) की शान में गुस्ताख़ी करने वाले कमलेश तिवारी के ख़िलाफ़ देश के कई हिस्सों में लाखों लोगों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया लेकिन सबसे भयावह मालदा का प्रदर्शन रहा। बेक़ाबू भीड़ हिंसा और आगजनी तक पर उतर गयी।

झूट बोलना, चुग़ली करना, चोरी करना, ज़ना करना, ज़ना बिल जब्र करना, सूद का लेन देन करना, जहेज़ का लेन देन जैसे तमाम बुरे कामों को करने से इस्लाम और उसके पैग़म्बर ने मना किया है मगर मुस्लिम क़ौम इन्हें धड़ल्ले से करती है। क्या अपने पैग़म्बर के हुक्म को न मानना पैग़म्बर की शान में गुस्ताख़ी नहीं है? जिस नमाज़ को हम बड़ी आसानी से छोड़ देते हैं वो पैग़म्बर मोहम्मद (स०) के आँखों की ठंडक है। ज़कात ग़ज़ब कर लेना, ग़रीबों-यतीमों का माल हड़प लेना, हराम माल खाना, नाप-तौल में कमी करना, मिलावट करना, हर काम में बेईमानी करना, पड़ोसियों को तंग करना जैसे तमाम ग़ैर इंसानी कामों को करने से भी ख़ुदा और उसके नबी ने मना किया है मगर हम बिना डरे करते हैं। पैग़म्बर की शिक्षा को दरकिनार कर देना पैग़म्बर की शान में गुस्ताख़ी नहीं है?

मुसलमानों ! तुम पहले अपने गिरेबान में झाँको, अपनी ग़लतियों और गुनाहों पर शर्मिंदा होना सीखो और अपने कुकर्मों के लिए सड़क पर उतर कर अपने लिए सज़ा (चाहे वो फाँसी ही क्यूँ न हो) की माँग करो फिर दूसरों के लिए सज़ा की माँग करना। भारत में ईशनिंदा क़ानून नहीं है (क्यूँकि ये एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है) जो किसी को फाँसी हो जाए। क़ानूनी तरीक़े से सज़ा की माँग की जा सकती है मगर हिंसात्मक रूप से नहीं।

देश का क़ानून तुम्हारे घर का क़ानून नहीं है जो तुम विरोध प्रदर्शन के दौरान तोड़ते हो ना ही पब्लिक प्रॉपर्टी तुम्हारी बपौती है जिसे तुम अपने गुस्से में फूँक देते हो। पहले सड़कों पर उतरने की तमीज़ सीखो फिर सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उतरना। आजकल सस्ती पब्लिसिटी पाने का सबसे आसान तरीक़ा है धर्म और धार्मिक लोगों पर कुछ भी बोल देना और उससे भी आसान तरीक़ा यूरोपीय और अमेरिकी देशों ने निकाला है पैग़म्बर को टारगेट करने का। चाहे वो कार्टून के ज़रिये हो या अपशब्द के ज़रिये. जिस अज़ीम शख्सियत को The 100: A Ranking of the Most Influential Persons in History में Michael H. Hart में पहले नम्बर पर रखा है वो किसी की घटिया सोच, कार्टून, अपशब्द या गाली से छोटा नहीं हो सकता.

कलतक कमलेश तिवारी को कोई नहीं जानता था पर आज हमने उसे इतना बड़ा ‘ब्रांड’ बना दिया है कि कल को वो चुनाव आराम से जीत जाए और यही RSS की रणनीति है जिसमें वो सफल हो गए और हमने ही उन्हें सफल किया है। लोग हमें उकसा देते हैं और हम भावना में बाह जाते हैं जब्कि हमें सब्र से काम लेते हुए पैग़म्बर की शिक्षाओं को आम करना चाहिये ताकि लोग ये जान लें कि कमलेश ने जो कहा वो सरासर बकवास और ग़लत है लेकिन हमने ठीक इसका उल्टा किया और आज कमलेश को ग़लत कहने की बजाय लोग मुसलमानों को ही ग़लत कह रहे हैं। जज़्बात और जाहिलियत में हमने अपना नुक़सान कर उनको फ़ायदा पहुँचाया है। कमलेश तिवारी और उसकी मण्डली जो चाहती थी, मुसलमानो ने ठीक वही किया। वो बयान देकर जितना फ़ेमस नहीं हुआ था हमलोगों ने उसके ख़िलाफ़ जुलूस कर उसे फ़ेमस दिया।

कर्नल बैंसला के नेतृत्व में जब लाखों गुज्जरों ने आरक्षण की माँग को लेकर रेल की पटरियाँ उखाड़ डालीं, सार्वजनिक संपत्तियों को स्वाहा कर दिया तब तो आपने उन्हें आतंकवादी नहीं कहा। हार्दिक पटेल के नेतृत्व में आरक्षण के लिए लाखों पटेलों ने और आरक्षण के लिए ही जब जाटों ने सार्वजनिक संपत्तियों को जलाया तब भी आपने उन्हें आतंककड़ी नहीं कहा। स्वर्णों ने जब दलितों को ज़िंदा जला दिया तब भी आपने स्वर्णों को आतंकवादी नहीं कहा। राजनीतिक राक्षकों ने जब गुजरात में मुसलमानों और ओडिशा में ईसाईयों को ज़िंदा जलाया तब भी आपने उन्हें आतंकवादी नहीं कहा तो आप मालदा के हिंसक मुसलमानों को आतंवादी कैसे कह सकते हैं? बाक़ियों की तरह इन्होंने भी सार्वजनिक संपत्तियों को ही स्वाहा किया है फिर ‘आतंकवादी’ का सर्टिफ़िकेट बाँटने में भेदभाव क्यूँ? आख़िर आतंकवादी की परिभाषा है क्या?

मालदा की हिंसक घटना के लिए मैं मुसलमानों को आईना दिखा चूका चूका हूँ सो मुझपर मालदा की घटना को ‘जस्टिफ़ाई’ करने का ठप्पा न लगाइये। मैं तो बस आपके दोगलेपन के सामने आइना रख रहा हूँ। एक ग़लत घटना पर चुप्पी साध कर और दूसरी ग़लत घटना पर आलोचना कर सेलेक्टिव क्रन्तिकारी न बनिए। अगर आपने कमलेश के बयान के लिए कमलेश की आलोचना की है तभी आप मालदा की घटना के लिए वहाँ के मुसलमानों को गारियाईए। कुछ लोगों की नज़र में अच्छा बनने के लिए फ़र्ज़ी क्रांति का रायता न फैलाइये।

अकबरुद्दीन ओवैसी के बयान को आप ‘हेट स्पीच’ मान करवाई करते हैं, जेल भेजते हैं मगर कमलेश के बयान को ‘ईशनिंदा’ के क़ानून के आड़ में हम ख़ुद ही संरक्षण दे रहे हैं। धार्मिक मुद्दे पर घटिया और भड़काऊ बयान हेट स्पीच कैसे नहीं हो सकता? हेट स्पीच के लिए मियाँ मसूद जेल की सलाख़ों के पीछे पहुँचा दिए जाते हैं और आदित्यनाथ छुट्टे सांड़ की तरह घूमता है। योगियों और साध्वियों की ज़बान पर लगाम लगाने की हिम्मत तो है नहीं किसी में लेकिन सबमें इतनी हिम्मत ज़रूर है कि वो छुटते ही मुसलमानों को आतंकवादी बोल सके। लोगों की भावनायें और उनका विरोध भी धर्म देख उबलता है अपराध देख कर नहीं।

मलेश तिवारी के बयान के बाद ‘छुईमुई’ जैसे लोग जो मुरझा गए थे वो मालदा की घटना के बाद ‘हरित क्रांति’ में बदल गए हैं. मुसलमानों और इस्लाम को गरियाने वाले ये क्रांतिकारी ये इस सवाल पे चुप्पी साध जाते हैं कि आखिर मालदा की घटना घटी ही क्यूँ, और इसके पनपने किसने दिया, भड़काऊ बयान के इतने दिनों बाद भी आख़िर कमलेश पर कोई करवाई क्यूँ नहीं हुई? कई क्रांतिकारी लोग तो कमलेश के बयान को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ मानते हैं तो कईयों ने मालदा में बसे ‘आतंवादियों’ की गिनती भी पूरी कर ली है. जो कल तक कमलेश के बयान के मौन समर्थन में मुरझा गए थे वही लोग मालदा के बहाने मुसलमानों को गरियाने के लिए लहालोट हुए पड़े हैं. अपने देश में मुसलमान शिक्षा के मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं और संघी ब्रिगेड ये बाद जानती है कि जाहिलों को धर्म के आड़ में भड़का कर कैसे अपना उल्लू सीधा करना है. पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं और संघ ने अपनी तैय्यारी शुरू कर दी है. मालदा घटना के रूप में चुनावी बीज तो डाली जा चुकी है इंतज़ार है तो बस चुनावी फ़सल लहलहाने की. मालदा के मुसलमानों ने संघ के एजेंडे को ही कामयाब किया है फिर भी बदनाम मुसलमान हो रहे हैं, कमलेश तिवारी नहीं. जबतक मुसलमान अपनी शिक्षा के स्तर को नहीं बढ़ाते तब तक यूँ ही सड़कों पे उतर कर जाहिलियत और हिंसा फैला कर क़ौम को बदनाम करते रहेंगे जिसका खामियाजा हमें ख़ुद भुगतना पड़ेगा और फ़ायदा संघी ब्रिगेड उठाती हैं. अगर मुसलमानों को सड़कों पर उतरना ही है तो मुस्लिम समाज में फैली बुराईयों, कुरीतियों और अशिक्षा के ख़िलाफ़ उतरें, दूसरों को राजनीतिक फ़ायदा देने के लिए नहीं.

~-नैय्यर इमाम


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