आज तमाम दुनिया देहश्तगर्दी पर अपने आंसू बहा रही है । कोई किसी मज़हब को उसका ज़िम्मेदार मान रहा है और कोई दूसरे पर इलज़ाम साज़ी कर रहा है । आज के दौर में जो मुसलमानो के मुल्को का हाल है उससे कोई बेख़बर नहीं है ,सब जानते है की अफ़गान में क्या हो रहा है पाकिस्तान में क्या हालात हैं और सबको पीछे छोड़ता हुआ एक इदारा इराक़ में जो की (आई एस आई एस)के नाम से उभर कर सामने आया है वो इंसानो को इंसान न समझते हुए अपनी हुकूमत क़ायम करने पर उतारू है ।

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सवाल उठता है की कभी अफ़ग़ान कभी चचेनिया कभी सीरिया कभी इराक़ में ऐसा क्या और क्यू हो रहा है जो दुनिया के 120 करोड़े मुसलमानो को सवालो के कटघरे में खड़ा कर देता है । अगर आप इसका गेहराई से मुताला करेंगे तो आपको मालूम होगा की इन मुस्लिम मुल्को में जितनी भी तंज़ीमे इस तराह के कामो को अंजाम दे रहीं है वो सब अपना एक ही मक़सद बयान करती नज़र आएंगी और वो ये “इस्लामी रियासत” क़ायम करना और इसके लिए जद्दो जेहद करना (जिहाद ), और वो ऐसा इसलिए करती हैं की हमने सियासत को मुक़द्दम कर दिया है ।

जबकी होना ये चाहिए था की इस्लामी निज़ाम को अमल में लाने के लिए हमें अपनी इस्लामी तरबियत की ख़ास तदबीरात करनी चाहिए थी ,हमें अपने किरदार को क़ुरआनी आइना दिखाना चाहिए था । हम ये भूल गए की हुकूमत की तामीर मुआशरे के बदन से पैदा होती है । हमने तालीम को कभी अपना मौज़ू ही नहीं बनाने की कोशिश की ,हमने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की के दुनिया में हक़ीक़ी इंक़लाब इल्म और तालीम से आता है । हमने कभी क़ुरआन को तालीम का माख़ज़ ही नहीं समझा । अब जब हमने बिना क़ुरआन इल्म और शऊर के आगे बढ़ने की कोशिश की तो हमारे मुआशरे में उसी तराह की रियासतो का ज़हूर होना शुरू होता गया ।

इसकी एक बड़ी वाजाह ये भी है की हमारे मदारिस दौर ए रसूल के 3,4 सादियो के बाद जहाँ थे आज भी वही खड़े है । क्यूंकी उसके बाद हमने इल्म का मेहवर क़ुरआन को नहीं बनाया । कुछ ग़ैर मुस्लिम दानिश्वर कहते हैं की इस्लाम को रेफोर्मेशन की ज़रूरत है मगर आप अगर सच्चाई का गेहराई से मुताला करेंगे तो मालूम होगा की इस्लाम को रेफोर्मेशन की नहीं बल्कि मुसलमानो को क़ुरआन की ज़रुरत है ।मुसलमानो को चाहिए की वो अपने इल्म की बुनियाद क़ुरआन मजीद को बनाये । आप अपने यहाँ मौजूद लाखो मदारिस के इल्म का जायज़ा लेकर देखेंगे तो एहसास होगा की आप खुद क्या पैदा कर रहे हैं ।

हमें ये समझना बहुत ज़रूरी है की रियासत और इल्म ए क़ुर्आन में क्या फ़र्क़ है । रियासत असल में मौजूदा हक़ायक़ को रहनुमा करने का नाम है ,इसमें नए हक़ायक़ नहीं पैदा किये जाते । बल्कि नए हक़ायक़ को हमेशा इल्म और तालीम से पैदा हिट हैं । याद रखिये जब भी कोई आप कही रियासत क़ायम करेंगे तो उस मुआशरे की तालीम का ज़हूर नुमाया हो जायेगा । अगर उस मुआशरे के इल्म का मेहवर क़ुरआन रहा होगा तो ज़हूर क़ुरआन के तालीमात के साथ होगा और अगर उसके इल्म का मेहवर कुछ और रहा होगा तो उसी तरीके से मुआशरे ज़हूर में आ जायेगा । आप पाकिस्तान अफगानिस्तान इराक़ को देख लीजिये की मुआशरे की तरबियत आपने जिस तराह से की उसका वही चेहरा आपके सामने आज मौजूद है ।

यानी जो भी इल्मी बुनियाद आपके मुआशरे ने क़ायम कर रक्खी है उसका ज़हूर आपके सामने हो जाता है । एक और बात पर ग़ौर कीजिये की ये जो इतना तशद्दुद और इख़्तेलाफ आज मुसलमानो के मुआशरे में पाया जाता है आखिर उसकी क्या वजाह है ? मुताला करने पर आप इसी नतीजे पर पहुँचेंगे की जिस चीज़ यानी क़ुरआन को आपके इल्म की बुनियाद बनाना था और जो आपस के इख़्तेलाफ मिटा सकता था हमने उसको अपनी बुनियाद बनाना छोड़ दिया है। बस जो शुरू की 3 सदियो में काम हो गया था उसी पर आज तक रुके हैं ।

एक बात और ग़ौर कीजिये की हमारे याह हनफ़ी मदरसे हैं शाफ़ई मदरसे है अहले हदीस मदरसे है मगर अफ़सोस इस्लामी मदरसा कोई नहीं ।आप खुद देख लीजिये हमारे यहाँ मस्जिदे भी देवबंदी बरेलवी अहले हदीस होती जा रही हैं बस यही वजाह है की आज हम दूसरे रास्ते पर भटके जा रहे है। । हमें चाहिए की हम अपनी तालीम को रिफार्म करे बिलखुसुस मज़हबी तालीम के तरीके को और उसका मेहवर क़ुरआन को बनाये और तालीम को ऑब्जेक्टिव करे जैसे दुनिया ने किया है तो हम सिरात उल मुस्तक़ीम पर जा सकते है मुसलमानो को अपनी दुनिया फताह करने की सोच को बदलना होगा और क़ुरआन की तालीम को मुक़द्दम करना होगा जिससे उस तालीम के मुताबिक़ मुआशरे ज़हूर में आजायेगा और अपने आप ही आपका झंडा ऊपर उठता चला जायेगा। और दुनिया में अम्न सुकूम चैन क़ायम होगा और आप अम्न के सौदागर ख़लीफ़ा ए रब कहलायेंगे।

फ़ैसल इक़बाल

 


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