mother day special

यह दुनिया प्रत्यके वर्ष मई के दुसरे रविवार को मां दिवस मनाती है। भारत के संदर्भ में मां बहुत अहम भूमिका रखती है। इस बार मां दिवस इसलिये भी ध्यान आकर्षित कर रहा है क्योंकि पिछले डेढ़ साल में इस देश ने ‘माता’ के नाम पर बहुत समय बर्बाद किया है। दरअस्ल वह माता इंसानी शक्ल वाली कोई मां नहीं बल्कि गाय रूपी मां है, तो कभी भारत माता (देश) है। भारत माता की जय के नाम पर जहां महीनों बहस जारी रही वहीं गाय माता के मांस के सेवन में इस देश का ‘अखलाक’ मार दिया गया। हालांकि इस बीच में एक खबर ऐसी आई जिसने इंसानी माता से प्रेम करने वालों को झकझोर कर रख दिया। वह खबर उत्तर प्रदेश के अयोध्या के नारायणपुर से आई जहां पर पांच बेटे हुऐ भी मां को भूखी रखा गया जिससे आजिज आकर उस बूढ़ी 70 वर्षीय मां ने खुद को आग लगाकर अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर ली। यह खबर उस वक्त सामने आई जब यह देश भारत माता कि बहस में उलझा था। खैर मां दिवस आते हैं।

मां दिवस रिश्तों पर भारी पड़ते बाजार ने हमें एक और झुनझुना थमा दिया है, पैदा होने से लेकर मरने तक के हर एक रिश्ते को हम लोग बाजार में बदलते जा रहे हैं। फेसबुक पर अधिकतर दीवारें मां की ममता का हैं, मगर क्या उस मां के लिये जिसने हमें पैदा करने में दोबारा जन्म लिया हो कोई दिन मुकर्र कर देना जायज होगा ? क्या आज के दिन वह अपनी औलाद पर प्यार नहीं लुटायेगी कि क्योंकि आज तो उसका दिन है मां दिवस है ? इसलिये आज का सारा प्यार उसे ही मिलना चाहिये। क्या आज वह अपने बच्चों के लिये खाना नहीं बनायेगी ? मां के लिये कोई खास दिन मुकर्रर कर देने से क्या हम उसके अहसानों का बोझ उतार सकते हैं ? क्या हम उस दर्द को कम कर सकते हैं जब दुनिया भर का दर्द और तकलीफ झेलने के बाद हम पैदा हुऐ थे और वह हमें रोता देखकर मुस्कुराई थी ? पाश्चात्य संस्कृती कि ओर बढ़ते कदमों ने भी उस देश में मां के लिये खास दिन मुकर्रर कर लिया जिसमें नदियों से लेकर जमीन तक को मां की संज्ञा दी गई है। जबकि हर शहर में बने वृद्धाश्रम जिनमें हजारों की संख्या में बूढ़े मां और बाप रह रहे हैं हमारी तरफ मुंह चिढ़कर कह रहे हैं कि हम Happy Mother’s Day  कहने का हक ही नहीं रखते। फिर भी लोग कह रहे हैं जिस मां को उफ्फ तक नहीं कहना चाहिये था उसे घरों से निकाल दिया जाता है यह भी उसी देश की उन्हीं आंगनों की सच्चाई है जिसमें चारों ओर हैप्पी मदर्स डे प्रचारित किया जा रह है। सदियों तक न उतरने वाले कर्ज को हमने सिर्फ साल के एक महीने के दिन पर लाकर लाद दिया है कि आज मदर्स डे है। कैसी कड़वी सच्चाई है इस पंक्ति में कि

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लड़के जवान पांच थे मां को न रख सके
बूढ़ा हुआ शरीर तो घर से निकाल दी।

 जाहिर है सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों, वृद्धाश्रमों, तीर्थ यात्रा पर आपको न जानें कितनी मां मिलेंगी जिनकी आंखों में बुढ़ापा अपने पोती पोतियों, के साथ गुजारने के सपने जिंदा हैं। आज मदर्स डे मुझे भी और मेरी मां को भी उसी पाश्चात्य संस्कति में रंग जाना चाहिये था जिसमें भारत का विशेष वर्ग रंगा पड़ा है। मगर रोजाना की तरह आज भी मेरी मां का फोन मुझे नींद से जगाने के लिये आया उन्हें पता ही नहीं था कि आज उनका दिन है, गांव की हैं न भोली हैं इसलिये उन्हें ही नहीं कि साल के 365 दिनों में उनके लिये भी कोई दिन मुकर्रर किया हुआ है। उन्होंने रोजाना की तरह वही तीन निर्देश कि ठीक है बेटा, नाश्ता कर लेना और ऑफिस जाते समय बाईक आहिस्ता चलाना, मगर उन्हें क्या मालूम कि मैं इन तीनों में से किसी एक भी बस उस वक्त याद रखता हूं जब फोन पर उनसे बात कर रहा होता हूं, और बाद में या तो अन देखा कर देता हूं या भूल जाता हूं। खैर मेरे कहने का आश्य सिर्फ इतना है, कि जो मां स्कूल, सच्ची मौहब्बत की जीती जागती मिसाल है उसके अहसानों को हम एक दिन विशेष मुकर्रर करके नहीं उतार सकते। क्योंकि हम सलामत रहे उसे तो सिर्फ यही चाहिये हजारों मायें एसी होंगी जो इस शब्द हैप्पी मदर्स डे वाकिफ भी नहीं होंगी। फिर इस लफ्ज के क्या मायने रह जाते हैं ? क्या यह लफ्ज मदर्स डे उस पूंजीपति वर्ग का मध्यम वर्ग पर थोपा हुआ एक शिगूफा नहीं है जिसे रिश्तों की समझ ही नहीं होती ? जिंदगी की भागदौड़ में बाजार को भी हमने रिश्तों पर हावी कर दिया ? हर जगह बाजार है प्यार कहां है ? रिश्ते कहां हैं ? मां दिवस पर मां चिल्लाने वाले हम लोगों को क्या हर रोज मां का ख्याल नहीं रखना चाहिये ? उसकी सारी ममता को एक ही दिन में लाकर खड़ा कर देने से क्या हम उसकी अहमियत को कम नहीं कर रहे हैं ?

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ऐसे तो उसकी मौहब्बत में कमी होती है

मां का एक दिन होता सदी होती है।

Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

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