प्यारी हिजाब विरोधी,

पिछले कुछ दिनों से मैं देख रहा हूं कि आपने हिजाब के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। बहुत अच्छा लग रहा है आपके इस अंदाज़ को देखकर। मैंने हमेशा से चाहा है कि हर सामाजिक बुराई के खिलाफ सबसे पहली आवाज़ वे लोग उठाएं जो उससे पीड़ित हैं या फिर महिलाएं सामने आएं।

हिजाब पहनने न पहनने की आज़ादी सबको है, मुंह ढक कर स्कूटी चलाने की भी। आपको पता है या नहीं फिर भी बता दूं कि मध्य प्रदेश के तीन शहरों में मुंह ढक कर धूप से बचने वाली लड़कियों को दुपट्टे का इस्तेमाल करने पर पाबंदी है। हो सकता है किसी रोज़ सरकार कहे कि बारिश में छतरी लेकर चलना मना है। आपको नहीं लगता कि ऐसा कोई फरमान आ सकता है, मुझे तो लगता है जब कभी हिजाब पर चल रही बहस को देखता हूं।

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यूरोप और अमेरिका में मुस्लिम औरतें जो हिजाब लगाती हैं उन पर कट्टरपंथी हिंसक होकर हमले करते हैं। पिछले साल अगस्त में ब्रुसेल्स की एक घटना बताता हूं। एक बेहद खूबसूरत यमनी लड़की जो कि शिया है को एक ईसाई कट्टरपंथी ने मेट्रो स्टेशन के बाहर तब तक मुक्के से वार करता रहा जबतक कि उसकी पूरी शक्ल न बिगड़ गई। बाद घटना के वह पकड़ा गया और उसने कहा कि,’मुझे हिजाब से नफरत है। और इस अंजान लड़की ने हिजाब पहना हुआ था।’ वह यमनी लड़की तीन महीने कोमा में रही फिर जब घर पहुंची तो उस शख्स को माफ कर दिया। लेकिन कानून ने नहीं माफ किया।

अमेरिका में किसी भी न्यूज़ एंकर को हिजाब लगा कर एंकरिंग करने की मनाही थी। गूगल पर आप फोटो सर्च इंजिन में जा कर देखें कि आज वहां कितनी महिलाएं हिजाब लगाकर ख़बर पढ़ रही हैं। हिजाब न तो प्रगतिशीलता का पैमाना है न तो कूपमंडूक और कट्टरपंथी होने का सबूत। मेरी बहुत सी महिला मित्र शराब और सिगरेट पीती हैं। सिगरेट स्टेटस सिंबल और प्रोग्रेसिव कैसी बनी, इसे महिलाओं में कब स्थापित किया गया उसके लिए आप गूगल का सहारा ले सकती हैं। पूरी थ्योरी है इस पर। बिजनेस+मार्केटिंग का पूरा फंडा रहा है पीछे।

खैर, हिजाब पर आते हैं, मैं कह रहा था कि हिजाब सांस्कृितक पहचान है। पश्चिमी देश कभी नहीं चाहते कि उनकी संस्कृति और सभ्यता पर किसी और की परछाईं पड़े। दुनिया भर के देशों में समुदायों की अपनी रहन सहन और वेशभूषा है। खानपान, बोली भाषा सब अलग। पर पश्चिम का अधिनायकवाद और उसकी लील जाने की गति इतनी तेज है कि अंग्रेजी आज हम सबकी पहली भाषा बन गई है। यह अचानक से नहीं हुआ। ऊर्दू, हिंदी से गुजरते हुए भाषा हमारी अंग्रेजी हो गई, हमें एहसास तक नहीं हुआ। क्यों ? क्योंकि, हमें बताया और समझाया गया कि जो यूरोप अमेरिका कर रहे हैं वही सबसे उत्तम है।

दिल्ली से होते हुए मैं गुजरात गया और फिर उत्तर प्रदेश में हूं, रात पश्चिम बंगाल की तरफ जाना है। इससे पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में रहा और देखा कि जिन मुस्लिम महिलाओं को हिजाब या नक़ाब नहीं पहनना वे नहीं पहनती। हां , निम्न आयवर्गीय एवं थोड़ा बहुत मध्यम आय वर्गीय परिवारों की मुस्लिम महिलाओं को पितृसत्तामक समाज की अड़चनों के कारण सख्ती से पर्दे का पालन करना होता है। अब देखिए, पितृसत्ता तो सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं है न। जायदाद से लेकर पढ़ाई लिखाई तक, जीने के तरीकों तक में वह शामिल है भारतीय उपमहाद्वीप में। सारा गुस्सा हिजाब पर उतारना, मुझे तर्कसंगत नहीं लगता। कोशिश होनी चाहिए कि जहां जबरियन ऐसी प्रैक्टिस करवाई जा रही है वहां पर रोक लगे, लेकिन जिन लोगों के बीच हिजाब सिर्फ परदा नहीं बल्कि उनकी पहचान की वजह है उनसे उनकी पहचान छीनने का हक़ किसी को नहीं।

अरब में जब इस्लाम का उदय हुआ तो उस दौरान कबीलों में बंटे समाज में औरतों को दासी बना कर रखा जाता था। एक आदमी अनगिनत औरतों को अपने पास रख सकता था। पैंगबर मुहम्मद ने कहा,’नहीं, सिर्फ चार। वो भी तब जब चारों के मध्य एक जैसा व्यवहार कर सको।वरना नहीं।’

तब जब तन पर कपड़ा रखने का रिवाज नहीं था। तो पैगंबर ने कहा,’सर ढको औरतों, मर्दों नज़र नीची रखो।’ सोचिए, किस महान सांस्कृतिक विरासत और सभ्यता में आपका जन्म हुआ है। जिस धर्म और तहज़ीब ने आपके सशक्तिकरण की खातिर उस समय के ताकतवर कबीलों और लोगों से लड़ाई लड़ी आज आप तथाकथित प्रगतिशीलता जिसका पैमाना आज तक तय नहीं हो सका की खातिर खुद को र*** कह देती हैं।

क्या आपको पता है र** होना समाज में कितना दुखदाई है। किसी असल र** से पूछिएगा, उसकी पीड़ा सुनकर आप तो क्या आपके साथ उठ खड़ी हुईं महिलाओं में भी ताकत नहीं बचेगी खुद को र** क्लेम करनी की। आपको जो पहनना है पहनें। जिसे जो कहना है कहिए, पर हिजाब को गुलामी की दास्तां तो मत कहिए। हिजाब ने तो गुलाम औरतों को सम्मान प्रदान किया है। हिजाब ने सर उंचा रख कर आंख में आंख मिला कर उन्हें बोलने का मौका दिया जिसे समाज सिर्फ र** कहना पसंद करता था।

आपका भाई.
-मोहम्मद अनस।

ये लेख मुहम्मद अनस की फेसबुक वाल से लिया गया है


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