RSS प्रमुख मोहन भागवत पेशे से पशु चिकित्सक हैं. मध्य प्रदेश के रहने वाले दो नौजवानों शाकिर युनूस और वसीम शेख ने जब उनकी तस्वीर की पैरोडी बनाकर उन्हें हाई हील पहनी हुई एक लड़की के रूप में पेश किया, उसके कुछ ही दिन बाद उत्तराखंड के एक बीजेपी विधायक ने एक घोड़े को इतनी बुरी तरह मारा कि उसका पैर बुरी तरह चोटिल हो गया. बाद में घोड़े का पैर काटना पड़ा.

मोहन भागवत थोड़ा हंस लेते, अपना और देश दोनों का भला करते

मोहन भागवत इस घटना पर एक शब्द नहीं बोले. लेकिन उनकी पैरोडी तस्वीर से ‘हिंदुओं की भावनाएं’ आहत हो गईं. और उन दोनों नौजवानों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

बीजेपी एमएलए गणेश जोशी ने एक मासूम जानवर को लंगड़ा बना दिया. वो भी तब जब गाय की तरह घोड़ा भी वैदिक पशु है. वैदिक काल में घोड़े की महत्ता थी. लेकिन इस मामले में ‘हिन्दू भावनाएं’ आहत नहीं हुईं.

हो सकता है कि जब तक ये लेख छपे तक तक सोशल मीडिया से आरएसएस प्रमुख की पैरोडी तस्वीर हटवा दी गई हो या हटवाने की पुरजोर कोशिश जारी हो.

ये एक तरह की सेंसरशिप की ओर बढ़ना है. जिसका मकसद एक व्यक्ति की छवि की रक्षा करते हुए उसे पूजनीय बनाना है. इस घटना से मुसलमानों का नाम जुड़ा है लिहाजा अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके पीछे क्या मामला होगा.

गाय की तरह घोड़ा भी वैदिक पशु है लेकिन उसकी टांग तोड़ने पर ‘हिन्दू भावनाएं’ आहत नहीं हुईं

जरा कल्पना कीजिए कि घोड़े की टांग किसी मुस्लिम ने तोड़ी होती तो उसपर क्या प्रतिक्रिया होती. आखिरकार, भारत में कुछ लोगों के लिए राम, रहीम का विलोम है.

इसी हफ्ते आरएसएस ने अपने यूनिफॉर्म में बदलाव करने की घोषणा की. संगठन की पोशाक में खाकी हाफपैंट की जगह भूरी फुलपैंट लेगी. हालांकि संगठन लंबे समय से इसपर विचार कर रहा था.

हो सकता है कि फुलपैंट से आरएसएस नेताओं की जांघ छिप जाए लेकिन इससे उनकी सोच नहीं छिप सकती. सोच बदलने के लिए इतिहास को समझने की जरूरत है, न कि मिथकों को जो उनके संगठन की बुनियाद हैं.

इस संगठन में हमेशा ही हास्यबोध की कमी रही है. आप चाहें तो हास्यबोध की जगह ‘सहिष्णुता’ शब्द का भी इस्तेमाल कर सकता है. लेकिन ये साफ है कि आरएसएस के पास समय के साथ चलने की सलाहियत नहीं है.

स्टालिन का दौर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सेंसरशिप किसी सत्ता का आधारस्तंभ हो सकता है. अक्सर इस तरह की सेंसरशिप वास्तव में प्रतिबंध के सहारे नहीं लागू की जाती. बल्कि इसमें ये स्थापित कर दिया जाता है कि राष्ट्रीय विमर्शों में क्या ‘सही’ है और क्या ‘गलत’ है.

‘मोहन भागवत जैसे नेता और आरएसएस जैसे संगठन की किसी बहुलतावाद समाज में कोई जगह नहीं है’

स्टालिन की सरकार में एक विभाग सिर्फ यही काम करता था. ये विभाग लेखों और चित्रों को छांटने का काम करता था. कई बार तो कुछ इंसानों को भी इतिहास से मिटा दिया गया.

स्टालिन के एनकेवीडी (सुरक्षा और कानून-व्यवस्ता मंत्रालय) के प्रमुख येसोफ की एक तस्वीर बहुत ही मशहूर है. तस्वीर में येसोफ एक पुल पर स्टालिन के बाजू में खड़े नजर आते हैं. बाद में येसोफ के संबंध स्टालिन से खराब हो गए. उन्हें 1940 में गोली मार दी गयी. उसके बाद स्टालिन सरकार ने तस्वीर से येसोफ को मिटा दिया.

इसी तरह लेनिन की 1920 की एक तस्वीर में ट्राटस्की और लेफ केमेनेफ भी नजर आते हैं. बाद में दोनों को जनता का शत्रु घोषित कर दिया गया. स्टालिन ने लेनिन की तस्वीर से उन दोनों को निकलवा दिया. उसने उन दोनों की हत्या भी करवा दी थी. स्टालिन अपनी पार्टी की छंटनी नहीं कर रहा था, बल्कि इतिहास की छंटनी कर रहा था ताकि इतिहास में उसका महत्व अधिक से अधिक होता जाए.

भारत में स्थिति अभी इतनी खराब नहीं है. लेकिन मोहन भागवत जैसे नेता और आरएसएस जैसे संगठन का किसी बहुलतावादी समाज में कोई जगह नहीं है. वो भी तब जब वे एक मजाक को नहीं सहन कर सकते, खास तौर अल्पसंख्यक तबके के मजाक को.

मैंने पहले भी कहा और एक बार फिर कहना चाहूंगा कि अभिव्यक्ति की आजादी, आहत करने की भी आजादी है.

अगर मोहन भागवत उन लड़कों के बनाए पैरोडी तस्वीर पर हंसते और न्यायिक हिरासत में बंद उन नौजवानों को घर जाने देते तो वो अपना और देश दोनों का भला करते. और एक अच्छे पशु चिकित्सक की तरह काश, वो उस घोड़े की भी परवाह करते. – सीपी सुरेंद्रन @catchhindi

(ये लेखक ने निजी विचार हैं. संस्थान की इनसे सहमति आवश्यक नहीं)


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