दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी. इस पर संसद की ही नहीं, बल्कि देश की भी नजर होगी कि मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं. क्योंकि पहली बार जाति या धर्म से इतर राजनीतिक बिसात पर राष्ट्रवाद मोहरा बनता दिख रहा है और आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ-पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे हैं. साथ ही संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है. काॅरपोरेट सेक्टर के पास काम नहीं है.
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 औद्योगिक सेक्टर में उत्पादन सबसे निचले स्तर पर है. निर्यात सबसे नीचे है. किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य तो दूर, बर्बाद फसल के नुकसान की भरपाई भी नहीं मिल पा रही है. नये रोजगारों का अता-पता नहीं है. कोयला खनन से जुड़े हजारों मजदूरों को काम के लाले पड़ चुके हैं. जब प्रधानमंत्री मोदी ने विकास मंत्र के आसरे संघ के जिस स्वदेशी तंत्र को हाशिये पर ढकेल दिया है, और जब स्वयंसेवकों के पास आम जनता के बीच जाने पर सवाल ज्यादा उठ रहे हैं, तो फिर उसकी राजनीतिक सक्रियता का मतलब ही क्या निकला?
डर है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण के वक्त विपक्ष कहीं बायकाट ना कर दे. और भगवा बिग्रेड यह सवाल ना उठाने लगे कि नेहरू माॅडल पर चलते हुए ही अगर मोदी सरकार पूंजी के रास्ते विकास की सोच रही है, तो फिर किसी प्रचारक के पीएम बनने का लाभ क्या है?
यानी पेट का सवाल, भूख का सवाल, रोजगार का सवाल, किसान का सवाल, हिंदुत्व का सवाल और मानव संसाधन को विकास से जोड़ कर आदर्श गांव बनाने की सोच का सवाल संघ परिवार के तमाम संगठनों के बीच तो अब उठने ही लगे हैं. यानी मोदी सरकार के सामने अगर एक तरफ संसद के भीतर सरकार चल रही है, यह दिखाने-बताने का संकट है, तो संसद के बाहर संघ परिवार को जवाब देना है कि जिन मुद्दों को 2014 लोकसभा चुनाव के वक्त उठाया गया, वह सिर्फ राजनीतिक नारे नहीं थे.
इसलिए पीएम बनने के बाद मोदी के ट्रांस्फॉरमेशन को संघ बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है. संघ की राष्ट्रभक्ति की ट्रेनिंग का ही असर रहा कि नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव में राइट-सेंटर की लाइन ली थी. लेकिन बीते दो बरसों में उन्होंने राइट-सेंटर की जगह कैपिटल राइट की लाइन पकड़ी और पूंजी की चकाचौंध तले अनमोल भारत को बनाने की जो सोच प्रधानमंत्री मोदी ने अपनायी, उसमें सीमा पर जवान ज्यादा मरे. घर में किसान नेे ज्यादा खुदकुशी की.
नवाज शरीफ से यारी ने संघ की हिंदू-राष्ट्र की थ्योरी पर सीधा हमला किया. इसी बीच स्वयंसेवकों की एक नयी टीम ने हर संस्थान पर कब्जा भी शुरू किया और मोदी सरकार ने मान भी लिया कि संघ उसके हर फैसले पर साथ खड़ा हो जायेगा.
दो बरसों में विश्वविद्यालयों की कतार से लेकर कमोबेश हर संस्थान में संघ की चापलूसी करते हुए बड़ी खेप नियुक्त हो गयी, जो मोदी के विकास तंत्र में फिट नहीं बैठती थी और संघ के स्वयंसेवक होकर काम कर नहीं सकती थी. फिर हर नीति, हर फैसले, हर नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी का नाम-चेहरा जुड़ा, तो मंत्रियों से लेकर नौकरशाहों तक का चेहरा गायब हुआ और समझ भी. लेकिन सारे हालात घुम-फिर कर प्रधानमंत्री मोदी की सक्रियता पर ही जा टिके, जिन्हें 365 दिन में से सौ दिन देश में अलग-अलग कार्यक्रमों में व्यस्त रखना नौकरशाही बखूबी जानती है.
ऐसे सवाल, जो असल तंत्र में ही जंग लगा रहे हैं और जिस तंत्र के जरिये अपनी योजनाओं को लागू कराने के लिए सरकार की जरूरत है, वह भी संकट में आ गये, तो उन्हें पटरी पर लायेगा कौन. मसलन, एक तरफ सरकारी बैंक, तो दूसरी तरफ बैंक कर्ज ना लौटानेवाले औद्योगिक संस्थानों का उपयोग. यानी जो गुस्सा देशभक्ति के भाव में या देशद्रोह कह कर हैदराबाद यूनिवर्सिटी से लेकर जेएनयू तक में निकल रहा है, उसको देखने का नजरिया चाह कर भी छात्रों के साथ नहीं जुड़ेगा. यानी यह सवाल नहीं उठेगा कि छात्रों के सामने संकट पढ़ाई के बाद रोजगार का है. बेहतर पढ़ाई ना मिल पाने का है. शिक्षा बजट में ही 17 फिसदी कम करने का है. शिक्षा मंत्री की सीमित समझ का है.
रोजगार दफ्तरों में पड़े सवा करोड़ आवेदनों का है. साठ फीसदी काॅलेज प्रोफेसरों को अंतरराष्ट्रीय मानक के हिसाब से वेतन ना मिलने का है.
सवाल राजनीतिक तौर पर भी उठेंगे. हैदराबाद यूनिवर्सिटी के आईने में दलित का सवाल सियासी वोट बैंक तलाशेगा, तो जेएनयू के जरिये लेफ्ट को देशद्रोही करार देते हुए बंगाल और केरल में राजनीतिक जमीन तलाशने के सवाल उठेंगे. यह भी कि अगर धर्म के साथ राष्ट्रवाद का छौंक लग गया, तो राजनीतिक तौर पर कितनी बड़ी सफलता बीजेपी को मिल सकती है?
चूंकि राजनीतिक सत्ता में ही सिस्टम का हर पुर्जा समाया हुआ बनाया जा रहा है, तो विपक्षी दल हो या सड़क पर नारे लगाते हजारों छात्र या तमाशे की तर्ज पर देश के हालात को देखती आम जनता, हर जेहन में रास्ता राजनीतिक ही होगा. यानी सवाल यह नहीं है कि संघ अब सक्रिय हो रहा है कि मोदी फेल होते हैं, तो वह फेल ना दिखायी दें.
दरअसल, हालात गंभीर हैं, क्योंकि संसद का बजट सत्र ही नहीं, बल्कि बीतते वक्त के साथ संसद भी राजनीतिक बिसात पर प्यादा बनेगी और लोकतंत्र के चारों पाये भी राजनीतिक मोहरा बन कर ही काम करेंगे.
इतिहास के पन्नों को पलटेंगे, तो मौजूदा वक्त इतिहास पर भारी पड़ता नजर आयेगा और राजद्रोह भी सियासत के लिए राजनीतिक हथियार बन कर ही उभरेगा. क्योंकि इसी दौर में अंरुधति रॉय से लेकर डॉ बिनायक सेन और असीम त्रिवेदी से लेकर उदय कुमार तक पर देशद्रोह के आरोप लगे. पिछले दिनो हार्दिक पटेल पर भी देशद्रोह के आरोप लगे और अब जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर. हालांकि, ऊंची अदालत में कोई मामला पहले भी टिक नहीं पाया, लेकिन राजनीति खूब हुई.
आजादी के बाद महात्मा गांधी से लेकर नेहरू तक ने राजद्रोह यानी आइपीसी की धारा 124ए को खत्म करने की खुली वकालत यह कह कर की अंगरेजों की जरूरत राजद्रोह हो सकती है, हमारी नहीं. लेकिन आजाद भारत में देश के नागरिकों पर कैसे राजद्रोह लगाया जा सकता है.
बावजूद इसके, संसद की सहमति कभी बनी नहीं. यानी देश की संसदीय राजनीति 360 डिग्री घूम कर उन्हीं सवालों के दायरे में जा फंसी है, जो सवाल देश के सामने देश को संभालने के लिए आजादी के बाद थे. इस कड़ी में 2014 के जनादेश को एक एतिहासिक मोड़ माना गया. इसलिए मौजूदा दौर के हालात में अगर मोदी फेल होते हैं, तो सिर्फ एक पीएम का फेल होना भर इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होगा, बल्कि देश फेल हुआ, यह दर्ज होगा. यह रास्ता 2019 के चुनाव का इंतजार नहीं करेगा – पुण्य प्रसून वाजपेयी (वरिष्ठ पत्रकार)

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