पिछले साल सरकार ने कच्चे तेल की गिरती कीमतों की वजह से वित्तीय लक्ष्य हासिल किए तो इस साल उसने ला-नीना से उम्मीदें लगा रखी हैं

क्यों यह कहना गलत नहीं कि मोदी सरकार काम से ज्यादा राम भरोसे चल रही है

नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे बजट की एक मामले में हर किसी ने तारीफ की. इस बजट से यह पता चला कि 2015-16 में सरकार का वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.9 फीसदी रहा. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में घोषणा की कि वित्त वर्ष 2016-17 में इसे घटाकर 3.5 फीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है. आर्थिक मामलों के जानकारों ने सरकार की इस बात के लिए जमकर तारीफ की. सबने यही कहा कि यह लक्ष्य दिखाता है कि सरकार वित्तीय अनुशासन को लेकर प्रतिबद्ध है.

लेकिन अगर बजट के साथ-साथ वित्त वर्ष 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण को देखा जाए तो पता चलता है कि सरकार ने जिस तरह से 3.9 फीसदी का लक्ष्य हासिल किया, कुछ उसी तरह से वह 3.5 फीसदी का लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद लगाए हुए है.

2015-16 में वित्तीय घाटा अगर 3.9 फीसदी पर रुकता दिख रहा है तो इसके लिए जो एक चीज सबसे अधिक जिम्मेदार है वह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट.

2015-16 में वित्तीय घाटा अगर 3.9 फीसदी पर रुकता दिख रहा है तो इसके लिए जो एक चीज सबसे अधिक जिम्मेदार है, वह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट. 2015-16 में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत औसतन 35 डाॅलर प्रति बैरल रही है. भारत सरकार ने इसका पूरा-पूरा फायदा अपने यहां के तेल उपभोक्ताओं को नहीं दिया. एक तरफ वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें घटती रहीं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने तेल पर लगने वाले शुल्कों को घटाने के बजाय इन्हें समय-समय पर बढ़ाने का ही काम किया.

इस वजह से पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पादन शुल्क के जरिए होने वाली सरकार की आमदनी काफी बढ़ गई. आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि 2015 के अप्रैल से दिसंबर के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के शुल्क के जरिए सरकार को जो आमदनी हुई, वह 2014 में इसी अवधि में हुई आमदनी के मुकाबले 94 फीसदी अधिक रही. इस अवधि में जहां 2014 में सरकार को 70,000 करोड़ रुपये की आमदनी हुई थी, वहीं 2015 में यह आंकड़ा 1.3 लाख करोड़ रुपये हो गया. जानकारों की मानें तो इसी वजह से सरकार का वित्तीय घाटा तय दायरे में रहा है.

2015 के अप्रैल से दिसंबर के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के शुल्क के जरिए सरकार को जो आमदनी हुई, वह 2014 में इसी अवधि में हुई आमदनी के मुकाबले 94 फीसदी अधिक रही.

लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कमी भारत सरकार के हाथ में नहीं है. यह एक महज संयोग ही है. ऐसे में बहुत खुश होने के बजाए इस बारे में चिंता करनी चाहिए कि वित्तीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार की ओर से क्या कदम उठाए गए. लेकिन इस बात की चिंता किए बगैर सरकार वित्तीय घाटे को 3.5 फीसदी रखने के लिए अपने काम पर भरोसा करने के बजाए उन्हीं कारकों पर भरोसा करते दिख रही है जो राम भरोसे हैं. यानी सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं.

केंद्र सरकार को लगता है कि अगले वित्त वर्ष में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 45 डाॅलर प्रति बैरल पर रहेंगी. इसके संकेत भी मिलने लगे हैं. 27 डाॅलर प्रति बैरल तक पहुंच गया कच्चा तेल हाल के कुछ दिनों में तेजी के साथ 40 डाॅलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है. ऐसे में सरकार को लगता है कि उसे 2015-16 की तरह बहुत ज्यादा फायदा तो नहीं होगा लेकिन बहुत अधिक नुकसान भी नहीं होगा.

लेकिन यहां सरकार सबसे अधिक जिस चीज पर भरोसा करते दिख रही है वह है ला-नीना. पिछले दो साल अल-नीनो के साल रहे हैं. इस वजह से कृषि उत्पादकता पर बेहद बुरा असर पड़ा. लेकिन अनुमान है यह साल ला-नीना का होगा. इस वजह से सरकार को लगता है कि खेती के दिन फिरेंगे और कच्चे तेल की कीमतों में सुधार की वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई कृषि से हो जाएगी.

27 डाॅलर प्रति बैरल तक पहुंच गया कच्चा तेल हाल के कुछ दिनों में तेजी के साथ 40 डाॅलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है.  सरकार को लगता है कि उसे 2015-16 की तरह बहुत ज्यादा फायदा तो नहीं होगा लेकिन बहुत अधिक नुकसान भी नहीं होगा.

इस बारे में विस्तार से जानने से पहले अल-नीनो और ला-नीना के बारे में जानना जरूरी है. दरअसल, जब प्रशांत महासागर में समुद्र का तापमान कई महीनों तक औसत से अधिक बना रहता है तो इससे अल-नीनो प्रभाव पैदा होता है. इसकी शुरुआत पेरू और इक्वाडोर के तट से होती है. जब अल-नीनो प्रभाव पैदा होता है तो इसका नतीजा खराब मौसम के तौर पर दुनिया के कई हिस्सों में दिखता है. भारत की खेती माॅनसून आधारित है. अल-नीनो का माॅनसून पर बुरा असर होता है. इस वजह से भारत की कृषि प्रभावित होती है. पिछले साल ही अल-नीनो की वजह से भारत में होने वाली औसत बारिश में 13 फीसदी की कमी आई. वहीं ला-नीना में अल-नीनो से ठीक उलट गतिविधियां होती हैं. ला-नीना में समुद्र के औसत तापमान में कमी आ जाती है. माना जाता है कि इससे माॅनसून ठीक रहता है और इस वजह से फसलें अच्छी होती हैं.

दुनिया भर के मौसम विज्ञानियों ने अनुमान लगाया है कि 2016-17 का साल ला-नीना का होगा. 1950 से लेकर अब तक 22 बार अल-नीनो प्रभाव पैदा हुआ है. नौ बार ऐसा हुआ कि अल-नीनो के बाद आने वाला साल ला-नीना का रहा. मौसम विज्ञानी मान रहे हैं कि इस बार मौसम विज्ञान से संबंधित जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उनके आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि 2015 के फरवरी से शुरू हुआ अल-नीनो प्रभाव मई, 2016 तक खत्म हो जाएगा और इसके बाद ला-नीना प्रभाव शुरू हो जाएगा. इस वजह से जिन देशों में अल-नीनो प्रभाव की वजह से खराब फसल हुई है, वहां अच्छी फसल होने का अनुमान है.

2014-15 के लिए सरकार ने कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था. लेकिन अब पता चल रहा है कि इस दौरान यह विकास दर -0.1 फीसदी रही.

भारत सरकार अपने वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन अनुमानों से काफी उम्मीदें लगाए हुए है. यह बात आर्थिक सर्वेक्षण और बजट भाषण में वित्त मंत्री द्वारा इस बारे में की गई बातों के आधार पर कही जा सकती है. सर्वेक्षण में सरकार ने पहले के वे पांच साल निकाले हैं जिनमें अल-नीनो के बाद ला-नीना का असर रहा है. इन सालों की कृषि उत्पादकता के आधार पर सर्वेक्षण में बताया गया है कि ला-नीना साल में कृषि की विकास दर 8.4 फीसदी रही है. इस वजह से सरकार को लगता है कि अगले वित्त वर्ष में बंपर फसल होगी और इससे न सिर्फ कृषि क्षेत्र वापस पटरी पर लौटेगा बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को मजबूत सहारा मिलेगा.

अब राम भरोसे कृषि की 8.4 फीसदी विकास दर के सपने से बाहर निकलकर यह देखना प्रासंगिक है कि अभी इसकी क्या हालत है. 2014-15 के लिए सरकार ने कृषि क्षेत्र की विकास दर 1.1 फीसदी रहने का अनुमान लगाया था. लेकिन अब पता चल रहा है कि इस दौरान यह विकास दर -0.1 फीसदी रही. यह एक संयोग ही है कि 2015-16 के लिए भी सरकार ने कृषि विकास दर का लक्ष्य 1.1 फीसदी ही रखा है. अब अंतिम आंकड़े आने के बाद पता चलेगा कि सही स्थिति क्या है. लेकिन जानकार मान रहे हैं कि 2015-16 में खेती की हालत और बुरी रही है और इसलिए कृषि की विकास दर इस दौरान भी तय लक्ष्य से कम ही रहेगी. कुछ लोग तो इसके फिर से ऋणात्मक रहने की ही आशंका जता रहे हैं.

यहां यह याद रखना जरूरी है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि की औसत विकास दर चार फीसदी रखने का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन पहले चार साल में यह औसत 1.5 फीसदी ही रही है. ऐसे में बचे हुए एक साल में चार फीसदी के औसत के लक्ष्य को कैसे हासिल किया जाए, यह भी सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. यह तथ्य इस आशंका को भी बल देते हैं कि 8.4 फीसदी की कृषि विकास दर के अनुमान के आधार पर अर्थव्यवस्था को दिशा देने का ख्वाब पालने वाली सरकार क्या वाकई ऐसा कर पाएगी? – हिमांशु शेखर


लाइक करें :-


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें

कमेंट ज़रूर करें