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भारत का टीवी इन दिनों असंभव और दुर्दांत किस्म की घटनाओं को दर्ज कर रहा है। जंतर-मंतर पर डोनल्ड ट्रंप की फोटो को केक खिलाकर बर्थडे मनाने के कुल बीस संघी लफंगों के जुटान को प्राइम टाइम खबर बना देने वाले संपादकों को मुंबई में डेढ़ लाख लोगों की उमड़े दलितों का सैलाब नज़र ही नहीं आया। दादर के ऐतिहासिक अंबेडकर भवन पर बुलडोज़र चलाने के खिलाफ डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों का इकट्ठा हो जाना टीवी के संपादकों के लिए खबर ही नहीं थी।

हैरत है कि उसी दिन अंजना ओम कश्यप यूपी के किसी चौराहे पर कुल 42 लोगों के जत्थे के बीच यूपी का मूड जानने का दावा कर रही थीं। लेकिन आजतक के संपादक सुप्रिय प्रसाद को नहीं लगा कि मुंबई जैसे शहर में जहां मुबारक बेगम जैसी महान गायिका के जनाज़े में शामिल होने के लिए बीस लोग भी नहीं मिलते वहां लाखों लोगों का उमड़ जाना खबर है। यह एबीपी के ताजा संपादक मिलिंद खांडेकर को भी नहीं लगा। मिलिंद तो खुद मुंबई में लंबे समय तक रहे हैं। वो जानते हैं कि बीएमसी के सामने डेढ़ लाख लोगों के जुट जाने का राजनैतिक मतलब क्या होता है।

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सुधीर चौधरी और रोहित सरदाना वाले ज़ी न्यूज़ को तो खैर वैसे भी मोदी की रैली के अलावा कहीं और जमा होने वाले लोगों को जनता नहीं मानता। टाइम्स नाऊ तो चलता ही मुंबई से हैं। लेकिन वर्ली सी लिंक पर तेज़ रफ्तार कार को देखकर पुलिस को फोन कर देने वाले सतर्क अर्णव गोस्वामी को अपने शहर की राजनीति की बदलती हुई हवा समझ में नहीं आई। बचा दीपक चौरसिया का इंडिया न्यूज़ तो उनका टेप कहां से आता है किसी से छिपा नहीं है। पद्मभूषण रजत शर्मा के इंडिया टीवी की आंखें डेढ़ लाख लोगों की सभा को सभा ही नहीं मानती होगी। न्यूज़ नेशन बिक्रम बेताल के मोड में जा चुका है तो उसे माफ कर दीजिए। लेकिन सबसे ज्‍़यादा हैरत हुई न्यूज़ 24 पर दलितों की सभा के बहिष्कार पर।

यह मान लेना कुछ ज्यादा बड़ी मासूमियत हो जाएगी कि किसी भी चैनल के मुंबई ब्यूरो को पता ही नहीं चला कि मुंबई में डेढ़ लाख दलितों ने बीजेपी की राजनीति में कील ठोक दी है। दरअसल जिस तरह से दलित उत्पीड़न के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात से भोपाल, जयपुर और हैदराबाद तक फजीहत हो रही है उससे बचाने का ठेका टीवी चैनलों के मालिकों और संपादकों ने मिलजुलकर उठा लिया। अलग-अलग चैनलों के सूत्र बताते हैं कि लगभग हर चैनल के मुंबई ब्यूरो को दलितों की महासभा के कवरेज से दूर रहने के निर्देश दिए गए थे। कहा गया था कि कुछ गड़बड़ी हुई तो एएनआई से फीड ले ली जाएगी।

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सभा में मौजूद लोगों ने बताया कि लोगों का सैलाब देखकर सरकार की नींद उड़ गई थी। बीएमसी से लेकर पूरे जेजे फ्लाईओवर तक डेढ़ लाख से ज्यादा लोग भारी बरसात में डट गए थे। सारे लोग शुरू से आखिर तक जमे हुए थे। इसकी लाइव कवरेज होती तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नाक कट जाती। इसलिए लाइव तो छोड़िए टीवी चैनलों ने विस्तृत रिपोर्ट तक नहीं चलाई। और इस तरह सारे चैनलों ने मिलकर प्रतापी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नाक बचा ली।

आपातकाल खत्म होने के बाद हुई प्रेस कॉनफ्रेंस में लालकृष्ण आडवाणी ने कुछ मीडिया घरानों की ओर इंगित करते हुए कहा था, “श्रीमती गांधी ने तो आपसे सिर्फ झुकने को कहा था, आप तो रेंगने लगे।” भारतीय टेलीविजन के मालिकों और संपादक संयुक्त रूप से बिना किसी घोषित आपातकाल के रेंग रहे हैं और दर्शक इसे बर्दाश्त कर रहा है। दस-पंद्रह हजार की भीड़ को अगस्त क्रांति साबित करने वाले सारे संपादकों और मालिकों को बीजेपी ने घुटने के बल ला खड़ा किया है।

सुप्रिय प्रसाद और मिलिंद खांडेकर से लेकर अर्णव गोस्वामी और दीप उपाध्याय, दीपक चौरसिया तक किसी के लिए भी डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों का मुंबई जैसे शहर में जुटना अगर लाइव कवरेज छोड़िए, साधारण रिपोर्टिंग तक का मुद्दा नहीं है तो समझ लीजिए कि बीजेपी-संघ की बिसात पर पत्रकारिता के प्यादे काम पर लगाए जा चुके हैं। दलित आंदोलनों के असल सुपारी किलर सिर्फ सुरेंद्र नगर और झालावाड़ में नहीं हैं, वो तो टीवी चैनलों के न्यूज़ रूमों की संपादकीय स्टीयरिंग पर बैठाए जा चुके हैं। इसी सुपारी के तहत ट्रकों में भरकर मरे हुए मवेशियों को सरकारी दफ्तरों के सामने फेंके जाने के दलित प्रतिरोध को टीवी चैनलों के संपादकों और पत्रकारों ने अपनी पूरी ताकत से साथ दबा दिया।

अच्छा यह हुआ कि ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप के जमाने में चैनलों की सुपारी चालबाजी चली नहीं और बात फैल गई। दूसरी अच्छी बात यह हुई कि संसद का सत्र चल रहा है। तीसरी अच्छी बात यह हुई कि संसद में पुरजोर तरीके से दलितों के उत्पीड़न पर नरेंद्र मोदी के मूक दर्शक बने रहने का मुद्दा उठ गया। यहीं चैनलों के संपादकों को झटका लग गया। उन्हें लग रहा था कि उन्होंने मुंबई में हुई दलितों की सभा और सुरेंद्र नगर की घटनाओं का बहिष्कार करके खबर की अंत्येष्टि कर दी है लेकिन बुरा हो उन सांसदों का जिन्होंने खबरों के सुपारी किलर संपादकों से बंदर के हाथ वाला उस्तरा ही छीन लिया। जब संसद के दोनों सदनों में गुजरात के दलितों के नरक में बदल दिए जाने पर बहस चल रही थी तो सुपारी संपादकों के चेहरों पर बारह बज रहा था। खबरों को खल्लास कर देने के उनके सारे किए कराए पर संसद की कार्यवाही ने पानी फेर दिया था।

जिस दिन शाज़ी ज़मा से एबीपी न्यूज़ की संपादकी छीने जाने की ख़बर आई उसी दिन यह लग गया था कि बीजेपी सिर्फ लोकसभा में मिले बहुमत का न्यूज़ रूम तक विस्तार करेगी। आगे के अभियानों के लिए उसे हर न्यूज़ चैनल में सुधीर चौधरियों, दीपक चौरसियाओं, उमेश उपाध्यायों, राहुल कंवलों, अर्णव गोस्वामियों और अमीष देवगनों की जरूरत है। शाज़ी का प्रगतिशील होना, उस पर से मुसलमान होना, लंबे समय से बीजेपी और संघ को खल रहा था। आनंद बाज़ार पत्रिका समूह में अवीक सरकार के हाथ से असित सरकार के हाथ में आई सत्ता को सबसे पहले बीजेपी सरकार ने समझा।

टीआरपी के बहाने पहली ही फुर्सत में शाजी जमा को संपादकीय जिम्मेदारियों से बेदखल करवाया और उनकी जगह राज ठाकरे के हमदर्द मिलिंद खांडेकर को आसन करवा दिया। मिलिंद खांडेकर टीआरपी के मास्टर कभी नहीं रहे लेकिन उनकी ताजपोशी करवा के यह संदेश दे दिया गया है कि टीवी चैनलों को अब बीजेपी के क्यूरेटर चलाएंगे। टीवी के अनाड़ी राजकिशोर जैसे बीजेपी कार्यकर्ता को पॉलिटिकल एडिटर बनाया जाना इसी संदेश का हिस्सा है। यूपी के नतीजे आने तक सारे संपादकों को इसी लाइन पर चलना है, यह बात अब छिपी हुई नहीं है।

साभार: मीडियाविजिल डॉट कॉम


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