Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।
Wasim Akram Tyagi लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।

अखबारों का स्तर रसातल में पहुंच गया है किसी भी अखबार को उठाकर देख लीजिये सभी का शीर्षक लगभग एक जैसा है कि जेल से भागे सिमी के आतंकी मुठभेड़ में ढ़ेर वगैरा वगैरा। सभी अखबारों ने इस खबर को प्रथम पृष्ठ पर स्थान दिया है इसे लीड न्यूज बनाया है। जाहिर लीड न्यूज का निर्णय तो कमसे कम संपादक करता है, संपादक महज एक व्यक्ती ही नहीं होता बल्कि एक संस्था होता है।

क्या तमाम अखबारों की इन ‘संस्थाओं’ को जरा भी इल्म नहीं कि वे अपनी लीड न्यूज के साथ ही बलात्कार कर रहे हैं, जिन युवकों का एनकाऊंटर हुआ है वे उनमें से अभी किसी को भी आतंकी नहीं माना गया था। क्योंकि यह अधिकार सिर्फ न्यायलय को है। वे विचाराधीन कैदी थे, जिन्हें अखबारों ने न्यायधीश की भूमिका निभाकर आतंकवादी साबित कर दिया है। ऐसा नहीं है कि संपादकों को इतना इल्म नहीं होगा बल्कि सच्चाई यही है कि मीडिया के लिये ‘मुठभेड़’ में मरने वाले आदिवासी नक्सली होते हैं तो उसी मुठभेड़ में मरने वाला कोई मुस्लिम आतंकवादी होते हैं। मीडिया जानबूझकर छवी खराब करता है। उसके लिये दलित, आदीवासी, अल्पसंख्यक सिर्फ मनोरंजन के साधन मात्र हैं।

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मीडिया बजाय क्रॉस क्यूश्चन करने के पुलिसिया कहानी को ही ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहा है। यह उस देश के मीडिया का हाल है जहां अधिकतर मुठभेड़ फर्जी पाई जाती हों। जहां फर्जी मुठभेड़ के आरोप में पुलिस को ही जेल में रहना पड़ रहा हो। वहां मीडिया का इस तरह बायस्ड हो जाना अच्छा संकेत नहीं है। पीलीभीत एनकाऊंटर में 17 सिक्ख मारे गये थे मीडिया ने तब भी पुलिसिया कहानी को सच मानकर मारे गये लोगों को खालिस्तान समर्थक और उग्रवादी बताया था। इसी साल जनवरी में उन 11 लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मारने वाले 47 पुलिकर्मियों को अदालत ने उम्र कैद की सजा दी थी।

डीजी वंजारा हमारे सामने मौजूद हैं जो फर्जी मुठभेड़ के आरोप में जेल में रहकर आये हैं। इस सबके बावजूद मीडिया की आँख नहीं खुलतीं ? या फिर यह मान लिया जाये कि मीडिया मुस्लिम दुश्मनी में अंधा हो चुका है ? न सिर्फ मुस्लिम दुश्मनी बल्कि दलित आदिवासी, सिक्ख मीडिया के लिये क्रमशः नक्सली, उग्रवादी, व आतंकवादी हैं। अगर मीडिया को लगता है कि फर्जी मुठभेड़ें सिर्फ ‘दूसरों’ को, ‘दुश्मनों’ को मारेंगी? तो उन्हें दिल्ली की एक अदालत के फैसले को फिर से पढ़ना चाहिये में जिसमें अदालत ने उत्तराखंड पुलिस के 17 अधिकारियों को 22 साल के एक निर्दोष एमबीए छात्र “रणबीर सिंह” की ह्त्या का दोषी करार दिया था! 7 को हत्या का, बाकी को मदद करने का, सबूत मिटाने का. उसे भी पुलिस ने ऐसा ही खतरनाक अपराधी बताया था- मीडिया ने वही दुहराया था! बाकी आपकी मर्जी- चाहें तो बक दें कि अदालत ही देशद्रोही थी।


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