बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’। उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला। वह उस समय के शासकों के मुताबिक राष्ट्र-विरोधी थे।

बाल गंगाधर तिलक ने कहा था ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’। उन पर देशद्रोह का मुकदमा चला। वह उस समय के शासकों के मुताबिक राष्ट्र-विरोधी थे। मैंने बराबर इस बात की वकालत की है कि सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम को रद््द कर दिया जाए। मैं मानता हूं कि यह कानून सेना को और पुलिस अधिकारियों को यह छूट देता है कि वे कुछ भी करें, उन्हें कोई सजा नहीं हो सकती। मौजूदा शासकों की दृष्टि से मैं एक राष्ट्र-विरोधी ठहराया जाऊंगा। आप राष्ट्र-विरोधी कहे जा सकते हैं

आप में से बहुतों को राष्ट्र-विरोधी करार दिया जा सकता है, और मैं बताता हूं कि ऐसा क्यों होगा। क्या आपने भारतीय सेना की तैयारियों की कमी की आलोचना की है, जो 1962 में चीन से लड़ाई हार गई थी? क्या आपने ‘आॅपरेशन पराक्रम’ की समझदारी पर सवाल उठाए हैं, जो सरहद पर शांति-काल की सबसे बड़ी कार्रवाई थी और जिसमें 798 सैनिक मारे गए थे? क्या आपने सियाचिन से सैन्य तैनाती हटाने की मांग उठाई है?

क्या आपने बीफ बेचने या खाने पर लगी पाबंदी का विरोध किया है, जो पाबंदी कई राज्यों की आधिकारिक नीति है। क्या आपने गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में थोपे जाने का विरोध किया है? आगाह कर दें, आप पर देशद्रोह का आरोप मढ़ा जा सकता है, क्योंकि कानून के तहत, जैसा कि दिल्ली पुलिस उस कानून का अर्थ बताती है, आपको सरकार के प्रति असंतोष (अर्थात गैर-वफादारी) प्रदर्शित नहीं करना चाहिए, या उसका बीज नहीं बोना चाहिए; आपको सरकार के प्रति घृणा नहीं फैलानी चाहिए (उसकी नीतियां या कानून कितने भी दमनकारी क्यों न हों); और आपको सरकार की अवमानना नहीं करनी चाहिए (उसका व्यवहार कितना भी मूर्खतापूर्ण क्यों न हो)। सीधे-सीधे कहें तो आप सरकार की निंदा नहीं कर सकते, न ही उसकी हंसी उड़ा सकते हैं, क्योंकि यह ‘कानून के द्वारा स्थापित’ है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए कहती है: ‘‘जो कोई भी, बोले गए या लिखित शब्दों के द्वारा, या चिह्नों के द्वारा, दृश्यात्मक प्रस्तुति के द्वारा, या अन्य तरीकों से, भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध असंतोष भड़काएगा या इसका प्रयास करेगा, वह आजीवन कारावास के दंड का भागी होगा…’’ इस धारा की तीन व्याख्याएं हैं, पर दिल्ली पुलिस, पढ़ सकने की अपनी सीमाओं के कारण, इस धारा के मुख्य हिस्से से आगे नहीं पढ़ेगी।

अधिकारों का दमन: कन्हैया कुमार ने सरकार के प्रति ‘अनुराग’ प्रदर्शित नहीं किया। वह उस समय मौजूद था जब कुछ खास नारे- जो नारे ही थे, तलवार या बंदूक नहीं- कुछ विद्यार्थियों द्वारा लगाए गए जो अफजल गुरु को दी गई फांसी के सख्त खिलाफ थे। इसे कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का आरोप मढ़ने का पर्याप्त आधार मान लिया गया। और फिर दिल्ली पुलिस के आयुक्त ने सोचा कि कानूनी कार्रवाई करना जरूरी है।

जिन बुद्धिमान पुरुषों और स्त्रियों ने भारत का संविधान बनाया, वे इस तरह नहीं सोचते थे। उन्होंने हमें बोलने की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी। उन्होंने कुछ बंदिशें रखीं, पर ‘देशद्रोह’ को उनका आधार बनाने से साफ मना कर दिया।

1951 में जवाहरलाल नेहरू ने संसद में कहा, ‘‘एक खास धारा (भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए) घोर आपत्तिजनक और घातक है, और इसे, ऐतिहासिक तथा व्यावहारिक दोनों कारणों से, हमारे प्रस्तावित कानूनों में हरगिज जगह नहीं मिलनी चाहिए।’’

साधारण व्यक्ति के लिए देश का सर्वोच्च न्यायालय आखिरी शरण है (मेरा इशारा उस तरफ नहीं है कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने क्या कहा था)। सर्वोच्च न्यायालय को कई मामलों में देशद्रोह संबंधी कानून से उलझना पड़ा है। केदारनाथ सिंह मामले में अदालत ने कहा था ‘‘सरकार के कदमों की आलोचना, वह कितने ही कड़े शब्दों में क्यों न हो, अगर ऐसी भावनाएं नहीं भड़काती जो हिंसक कृत्य की तरफ और सार्वजनिक शांति को खतरे में डाल देने की तरफ ले जाए, तो वह दंडनीय नहीं है।’’

अंत में, एस रंगराजन मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक दूसरी चमकती कसौटी पेश की, ‘बारूद में चिनगारी’ की कसौटी। अदालत ने कहा, ‘‘विचार की अभिव्यक्ति भी, तात्त्विक रूप से, सार्वजनिक हित के लिए खतरनाक हो सकती है। दूसरे शब्दों में, बारूद में चिनगारी की तरह, अभिव्यक्ति को नियोजित कार्रवाई से अलग करके नहीं देखा जा सकता।’’

सरकार और दिल्ली पुलिस को यह समझ है कि कन्हैया कुमार और अन्य के खिलाफ देशद्रोह का आरोप अदालतों में नहीं टिकेगा। यही कारण है कि पटियाला हाउस अदालत के परिसर में ‘न्याय’ करने के लिए तथाकथित वकीलों को लगाया गया। और न्याय का एकमात्र तरीका जो वे जानते थे उसी तरीके से उन्होंने न्याय किया- कन्हैया कुमार को मारा-पीटा, और पत्रकारों को भी, जिन्होंने अदालत में उस वक्त मौजूद रहने की हिम्मत दिखाई।

गलत होने का अधिकार: गंभीर मुद््दे दांव पर हैं। लोकतांत्रिक गणराज्य में एक विश्वविद्यालय का क्या स्थान है जो हमने इसे स्वयं दिया है। एक विद्यार्थी के तौर पर, क्या मैं अपने समय को ऐसा समय मान सकता हूं जो मुझे गलत होने का अधिकार देता है? क्या मैं अपने विश्वविद्यालय को ऐसा स्थान मान सकता हूं जहां बेढंगा होना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना गूढ़-गंभीर होना? सार्वजनिक विमर्श की जगहों में, आपको मृत्युदंड पर सवाल उठाने और उसका प्रावधान खत्म करने की मांग करने का हक है। आपको अफजल गुरु या याकूब मेनन को दी गई फांसी पर प्रश्न उठाने का हक है। रोहित वेमुला ने वही किया और वह आत्महत्या के लिए विवश हुआ। कुछ छात्रों ने वही किया। तब कन्हैया कुमार वहां मौजूद था। और अब कन्हैया उसी जेल में है जहां अफजल गुरु को रखा गया था।

विधि के द्वारा स्थापित सरकार विश्वविद्यालयों को बारूद के ढेर में बदल रही है। सत्ताधारी पार्टी से जुड़े संगठन (खासकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) विश्वविद्यालयों में आग भड़काने में लगे हैं। इससे पहले कि आग समूचे देश को अपनी चपेट में ले ले, कानून लागू करने वालों के अवैध व्यवहार, निरंकुशता और तथाकथित वकीलों के खिलाफ हमें जरूर आवाज उठानी चाहिए। किसी सरकार के प्रति अनुराग दिखाना हमारी बाध्यता नहीं है, और ऐसी सरकार के प्रति तो हरगिज नहीं, जो देशद्रोह के कानून केसहारे अपने युवा नागरिकों के खिलाफ खड़ी हो। – पी चिदंबरम


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