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अभिमन्यु कोहार

इस लेख का शीर्षक पढ़ के लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठेगा कि कैसी गुलामी? किसकी गुलामी? किस चीज़ की गुलामी की बात यहाँ की जा रही है? 

इन प्रश्नों के जवाब से ही मैं इस लेख की शुरुआत करता हूँ। आज 21वीं शताब्दी के समय में सीधे तौर पर किसी देश को अपना गुलाम बनाना सम्भव नहीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर देशों को साम्राज्यवादी नीतियों और समझौतों के जरिये गुलाम बनाने का काम पिछले 20 सालों से जारी है। इसी कड़ी में एक नया समझौता है “LEMOA” जिसके तहत अमरीका जब चाहे तब हिंदुस्तान के अंदर अपनी फौजों को तैनात कर सकता है। अभी किसी को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर कर के कितनी बड़ी भूल हम कर रहे हैं। इसे हस्ताक्षर करने के बाद अब हम अमरीकी विदेश नीति की हाँ में हाँ मिलाने वाले एक गुलाम देश की भांति बन के रह जायेंगे, हमारा रक्षा मंत्रालय सिर्फ पेंटागन का अग्रिम अड्डा बन के रह जायेगा। यह समझौता हिंदुस्तान की आज़ादी पर एक बड़ा गहरा धब्बा है। सबसे बड़ी चिंता की बात ये है कि अभी वो दस्तावेज़ जनता के लिए सार्वजनिक नहीं किया गया है जिस पर भारत सरकार ने हस्ताक्षर किये हैं और अगर जनता ने आंदोलन के जरिये दबाव नहीं बनाया तो वो कभी सार्वजानिक किया भी नहीं जायेगा।

कुछ भारतीय बुद्धिजीवी यह कह रहे हैं ये LEMOA सिर्फ लोजिस्टिक्स का समझौता है जो की बेहद ही बेवकूफी भरी बात है। यह लोजिस्टिक्स की आड़ में एक सैन्य समझौता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब अमरीका ने पूरे विश्व में अपना साम्राज्य स्थापित करने का सपना पाला तो उसने पूरे विश्व में अपने फौजी लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर तैनात करने शुरू कर दिए। लेकिन वियतनाम, अफ़ग़ानिस्तान और इराक युद्ध में इनके काफी फौजी मारे गए। इतने फौजियों के मारे जाने की वजह से अमरीकी सरकार के ऊपर विदेशी धरती पर अमरीकी फौजी तैनात न करने का घरेलू दबाव बनना शुरू हुआ। इस घरेलू दबाव की वजह से अमरीका ने अब रिपेयरिंग, लोजिस्टिक्स के नाम पर रोटेशनल आधार पर अपनी फौज को विदेशों में तैनात करना शुरू कर दिया। ऐसे लोजिस्टिक्स के नाम पर ही पूरी दुनिया में अमरीका ने 800 सैन्य अड्डे स्थापित किये हैं। इस तरह रोटेशनल आधार पर सैनिक तैनात करते वक़्त अमरीका को एक फायदा ये भी है कि उसे कस्टम ड्यूटी का भुगतान नहीं करना पड़ेगा।

इस समझौते का सबसे बड़ा नुक्सान हमें सामरिक तौर पर उठाना पड़ेगा, रूस अब तक अपनी सबसे सर्वोत्तम टेक्नोलॉजी जैसे अकुला श्रेणी की परमाणु  पनडुब्बी, सुखोई श्रेणी के सबसे एडवांस लड़ाकू विमान जैसे सुखोई-30 ऍमकेआई, ब्रह्मोस मिसाइल, टी-90 टैंक भारत के साथ साझा करता आया है या फिर भारत के साथ मिल कर विकसित कर रहा है। LEMOA पर हस्ताक्षर होने के बाद अमरीका की फौज के यहाँ हिंदुस्तानी सैन्य अड्डों पर तैनात होने की आशंका के बीच रूस ने आगे से अपनी सर्वोत्तम सैन्य टेक्नोलॉजी भारत के साथ साझा न करने के संकेत दे दिए हैं। आज तक बिना किसी शर्त के रूस अपनी सर्वोच्च टेक्नोलॉजी भारत के साथ ट्रांसफर ऑफ़ टेक्नोलॉजी के तहत साझा करता आया है जैसे कि हम सुखोई 30 एमकेआई लड़ाकू विमान के केस में देख सकते हैं। किसी दूसरे देश ने न तो आजतक इस तरह भारत का सैन्य सहयोग किया है और न ही कर सकता है। इस समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद अमरीका भारत को 50 साल पुराने F 16 लड़ाकू विमान देने की पेशकश कर रहा है, जो सुखोई 30 एमकेआई लड़ाकू विमान के आगे कहीं भी नहीं टिकता। ध्यान देने योग्य बात ये है कि अमरीका खुद की वायुसेना से F 16 लड़ाकू विमान बाहर निकाल रहा है और नई श्रेणी के F 35 लड़ाकू विमान अपनी वायुसेना में शामिल कर रहा है। इस LEMOA नाम के समझौते की वजह से भारत के सामरिक नुकसान का एक पहलू ये भी है कि इस से हमारे पुराने और विश्वासपात्र मित्र रूस की चीन और पाकिस्तान के गुट में शामिल होने की संभावना है जिसका पहला संकेत आज तक के इतिहास में पहली बार हो रहे रूस और पाकिस्तान के सैन्य अभ्यास से मिल रहा है।

इस समझौते का दूसरा सबसे बड़ा नुकसान होगा हिंदुस्तान की अपनी आज़ाद विदेश नीति का अमरीकी सरकार के सामने सरेंडर कर देना। अब तक कई ऐसे देश जैसे ईरान के साथ भारत के अच्छे रिश्ते रहे हैं जिनका अमरीका के साथ छत्तीस का आंकड़ा रहा है। लगभग 2000 करोड़ की लागत से भारत ने ईरान में अपने सामरिक हितों की पूर्ति के लिए चाहबर पोर्ट विकसित किया है। तो अब क्या अमरीकी दबाव में भारत उस पोर्ट का सामरिक इस्तेमाल बन्द कर देगा? इतिहास गवाह है कि अमरीका अपने हर मित्र पर अपनी नीतियां थोपता आया है, तो क्या अब भारत की विदेश नीति भी अमरीका के इशारे पर चलेगी? तो क्या अब भारत भी अमरीका के दबाव में हर उस देश पर प्रतिबंध लगायेगा जो अमरीका के साम्राज्यवाद के विरोध में खड़ा होगा? इन सभी प्रश्नों का उत्तर इस समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद अमरीका के हाथ में चला गया है। LEMOA पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने विदेश मामलों में अपने निर्णय लेने की ताकत अब अमरीका के पास गिरवी रख दी है। अब हमें अमरीका की हाँ में हाँ और न में न मिलाना पड़ेगा।

इस समझौते के सामाजिक दुष्परिणाम भी हमे लंबे समय तक देखने को मिलेंगे। जब कोलंबिया ने एक LEMOA जैसी डील पर अमरीका के साथ हस्ताक्षर किये तो इसके साथ कोलंबिया को SOFA नाम के एक और समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य होना पड़ा था जिसके तहत अगर कोई अमरीकी फौजी कोलंबिया की धरती पर कोई भी अपराध करता है तो उसके ऊपर कोलंबियाई कानून के तहत कोई भी कारवाई नहीं की जा सकती। एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीकी फौजियों ने कोलंबिया में 54 नाबालिग कोलंबियाई लड़कियों का यौन शोषण किया और उनकी पोर्न वीडियो भी बनाई लेकिन SOFA एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने की वजह से कोलम्बिया की सरकार दोषी अमरीकी फौजियों पर कोई भी कारवाई नहीं कर पाई। पिछले 59 सालों से जापान के ओकिनावा शहर में अमरीका के लगभग 28000 फौजी तैनात हैं और वो जापानी महिलाओं से छेड़छाड़ से ले कर नशीले पदार्थों की तस्करी तक के हर तरह की गैरकानूनी काम में संलिप्त हैं। जापान की सरज़मी होने के बावजूद ऐसे गैरकानूनी कामों में संलिप्त अमरीकी फौजियों पर जापान को अपने कानून के हिसाब से कोई भी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है क्योंकि जापानी सरकार SOFA नाम के एग्रीमेंट से बंधी हुई है। 2011 में एक अंग्रेजी अखबार गार्डियन में छपी खबर के अनुसार एक अमरीकी महिला सैनिक को इराकी विद्रोहियों की गोली से घायल होने का इतना खतरा नहीं है जितना उसे अमरीकी पुरुष फौजियों द्वारा रेप का खतरा है।  इसी तरह के हालात भारत में अमरीकी फौजों की तैनाती के बाद बनेंगे। बड़ा सवाल ये है कि क्या ऐसे दोषी अमरीकी फौजियों पर भारत के संविधान के तहत कार्रवाई की जा सकेगी या भारतीय सरकार भी SOFA जैसे कानून से बंधी हुई होगी? 1940 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी लगभग 2 लाख अमरीकी सैनिक भारत में तैनात किये गए थे, उस समय के ब्रिटिश दस्तावेज़ बताते हैं कि अमरीकी सैनिकों की भारत में तैनाती के बाद महिलाओं से छेड़छाड़ और नशीली पदार्थों के तस्करी जैसी गैरकानूनी गतिविधियां बहुत ज्यादा बढ़ गयी थी। क्या हमारी सरकार ने ऐसी समस्याओं का हल सोचा है?

सन 2000 में बूज़ एलन नाम के आदमी को अमरीका ने भारतीय सैन्य अधिकारियों की दिमागी सोच पढ़ने के लिए भारत भेजा था। अपनी रिपोर्ट में बूज़ एलन ने कहा कि भारतीय सैन्य अधिकारी सोचते हैं कि पूरे विश्व ने उन्हें उच्चतम सैन्य टेक्नोलॉजी से जानबूझ कर दूर रखा। भारतीय सैन्य अधिकारियों का दिमाग पढ़ने के बाद  बाद अमरीका ने ये झांसा देना शुरू किया कि अगर भारत 4 समझौतों पर हस्ताक्षर कर दे तो उसे उच्चतम टेक्नोलॉजी हम दे देंगे। इन सब में सबसे पहला था GISMOA जिस पर 2002 में वाजपेयी सरकार ने हस्ताक्षर किये थे, अब उसके बाद LEMOA पर मोदी सरकार ने 14 साल बाद हस्ताक्षर किये हैं। LEMOA के बाद अब भारत को CISMOA पर हस्ताक्षर करने के लिए बोला गया है, CISMOA के तहत भारत को अपना सारा कम्युनिकेशन डाटा अमरीका के साथ साझा करना पड़ेगा। आज का समय साइबर वारफेयर का है, अगर हमें अपने सारे एन्क्रिप्शन कोड्स अमरीका के साथ साझा करने पड़ेंगे तो हमारी सीक्रेसी कहाँ बची? युद्ध के दौरान कमांड सेंटर से सारा डाटा एन्क्रिप्टेड कोड्स के जरिये भेजा जाता है, इन कोड्स के साझा होने के बाद हमारी सारी सैन्य मूवमेंट का पता अमरीका आसानी से लगा सकता है। CISMOA के बाद BECA पर हस्ताक्षर करने के लिए बोला जायेगा जिसके तहत हमे अपनी स्पेस सैटेलाइट्स से जुडी सारी जानकारी अमरीका के साथ साझा करनी पड़ेगी। यह सब सामरिक दृष्टि से किसी भी आज़ाद देश के लिए बहुत हानिकारक है।

अब जब अमरीका हमारे सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करेगा तो वो आसानी से भारत की सामरिक दृष्टि के लिहाज से अति महत्वपूर्ण हथियार जैसे अग्नि मिसाइल सिस्टम, परमाणु हथियार और स्ट्रेटेजिक फाॅर्स कमांड के बारे में जानकारी जुटा सकता है। समझौता किसी भी दो बराबर मुल्कों के साथ किया जाता है, हम सब अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि भारत और अमरीका की सैन्य ताकत में दिन रात का अंतर है। सरकार द्वारा ये प्रचार भी किया जा रहा है कि ये समझौता दोनों तरफ की फौजों को एक दूसरे के बेस इस्तेमाल करने की इज़ाज़त देगा लेकिन मेरा एक सवाल है कि हमे उनके बेस इस्तेमाल करने की ज़रूरत ही क्या है? हमारी नेवी कोई ब्लू वाटर नेवी नहीं है, हमारी नेवी की सामरिक ताकत और जरुरत सिर्फ इंडियन महासागर, अरब महासागर और बंगाल की खाड़ी तक है। हम खुद आतंकवाद और उग्रवाद से इतने जूझ रहे हैं तो हम अपनी सेना को अमरीका के बेसों में तैनात कर के क्या करेंगे? हमारी वायुसेना को लड़ाकू विमानों की 45 स्क्वाड्रन की आवश्यकता है लेकिन अभी हमारे पास हैं सिर्फ 32 वो भी ज्यादातर कई दशक पुराने लड़ाकू विमान जैसे मिग 21, मिग 25 से बनायी हुई तो हम अपनी वायुसेना को किस लिए अमरीका में तैनात करेंगे? अमरीका के बेसों को इस्तेमाल करने में हमारा कोई भी सामरिक हित नहीं है और न ही हमारी इतनी क्षमता कि इतनी दूर हम अपनी फौज को तैनात करें। प्रैक्टिकली हमारी फौजों को अमरीका में तैनात करने का कोई अर्थ ही नहीं बनता है और न ही हमे वहां तैनात करने की जरुरत।

भारत NAM और BRICS जैसी संस्थाओं का स्थापना सदस्य रहा है जो किसी भी अंतर्राष्ट्रीय गुट का हिस्सा नहीं बनने की वकालत करती है। अपने इंडिपेंडेंट स्टैंड की वजह से ही आज तक भारत की विश्व की नज़रों में अलग से इज़्ज़त रही है। 1948 में जब फिलिस्तीनियों की धरती पर इजराइल देश को बसाने का सब समर्थन कर रहे थे तो भारत ने दो टूक खड़े हो कर दुनिया के सामने कहा था कि एक आज़ाद फिलिस्तीन मुल्क फिलिस्तीनियों का जन्मसिद्ध अधिकार है और ये अधिकार इनको मिलना चाहिए। लेकिन यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि LEMOA और GISMOA जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर कर के भारत पहली बार किसी गुट का हिस्सा बना गया है और अपनी इंडिपेंडेंट पालिसी हमेशा के लिए खो दी है।

कुछ लोगों को यह धोखा है कि इस समझौते के बाद अमरीका चीन के खिलाफ युद्ध में भारत का साथ देगा, किसी भी इंसान का यह सोचना बड़ा हास्यास्पद है। अभी 2007 में फ़िलीपीन्स के साथ भी LEMOA जैसा समझौता अमरीका ने किया था लेकिन जब एक द्वीप के ऊपर फिलीपीन्स का टकराव चीन के साथ हुआ तो अमरीका फिलीपीन्स की मदद के लिए नहीं आया। अमरीका के इस तरीके के घटिया रवैये से परेशान हो कर फिलीपीन्स के राष्ट्रपति ने इस LEMOA जैसे समझौते के तहत फिलीपीन्स में तैनात की गयी अमरीकी फौजों को जल्दी से जल्दी देश छोड़ने के लिए कहा है।  तो भारतीय लोग यह झूठा सपना देखना बन्द कर दें कि अमरीका किसी युद्ध की स्थिति में भारत के पक्ष में आ कर खड़ा होगा।

निश्चित रूप से चीन से हमारा टकराव है और भारत और चीन की पहली कोशिश उस टकराव को बातचीत के जरिये सुलझाने की होनी चाहिए। लेकिन अगर सैन्य टकराव की जरुरत पड़ती है तो खुद भारत को इतना मजबूत होना पड़ेगा की वो चीन का मुकाबला अपने अकेले दम पर कर सके। आखिरी बात ये है कि LEMOA पर हस्ताक्षर भारत की कूटनीतिक विफलता है क्योंकि किसी शक्तिशाली देश जैसे अमरीका की गोद में बैठ जाने को कूटनीति नही कहते, कूटनीति का अर्थ होता है सभी देशों के साथ अच्छे सम्बन्ध बना के हर देश का अपने सामरिक हितों के पक्ष में इस्तेमाल करना। LEMOA जैसे किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर के अमरीका जैसे किसी शक्तिशाली देश की सेना को अपनी सरज़मी पर बुलाने को आत्मसर्पण करना बोलते हैं, कूटनीति नहीं। इस तरह का आत्मसमर्पण ही गुलाम बनने की और पहला कदम होता है। अगर समय रहते LEMOA नाम के काले दस्तावेज़ का भारतीय जनता द्वारा विरोध नहीं किया गया तो हमारा मुल्क गुलामी के अँधेरे में और ज्यादा धंसता चला जायेगा।


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