Mohd. Zahid

पिछले दिनों जब मैं नोएडा स्थिति देश के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय चैनल में संपादक के रूप में कार्यरत अपने एक मित्र से मिलने गया था तो उनसे शिकायत करते हुए कहा कि “आपका चैनल “पत्रकारिता” के सैद्धान्तिक मापदंडों का पहले चीर हरण करता है फिर उसका बलात्कार करता है।” मित्र का कहना था कि “आज के युग की पत्रकारिता का मापदंड हर बृहस्पतिवार को घोषित होने वाली टीआरपी का परिणाम होता है , और यह केवल पूरे चैनल की टीआरपी ही नहीं बल्कि प्रति प्रोग्राम टीआरपी के परिणाम पर आधारित होता है और हर चैनल का प्रत्येक प्रोग्राम का आपस में यह प्रतियोगितात्मक युद्ध होता है जिससे वह बृहस्पतिवार के टीआरपी परिणाम में नं 1 का स्थान हासिल कर सके”।

उन्होंने उदाहरण भी दिया कि पिछले हफ्ते प्राइम टाईम (अर्थात रात में 9 से 10) की टीआरपी में सुधीर चौधरी का शो नंबर 1 पर था तो अब हर चैनलों की टीम पूरे हफ्ते इस प्रयास में रहती है कि कैसे सुधीर चौधरी के शो “डीएनए” को पछाड़ कर नंबर 1 स्थान हासिल किया जा सके। और इसके लिए कुछ भी दिखाया जा सकता है।

दरअसल यही टीआरपी उस समय के प्रचार के स्लाट की दर तय करता है , अर्थात जैसा टीआरपी में परिणाम वैसा ही प्रचार का प्रति/ 10 सेकेंड दर। यह है आज की पत्रकारिता की हकीक़त , यहाँ समाचार की सच्चाई से अधिक आवश्यकता है झूठ दिखा कर टीआरपी में प्रथम स्थान प्राप्त करना। दरअसल इनकी मजबूरी भी है

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फाईव स्टार होटल जैसी भव्य बिल्डिंग , शानदार रिसेप्शन और भव्य 8-10 स्टूडियो में ₹5-10 लाख प्रतिमाह के पैकेज पर सुन्दर सुन्दर चींखने वाली ऐंकर , पूरे देश में उपस्थित सैकड़ों ओबी वैन और उनका तथा पत्रकारों का मँहगा वेतन और खर्च , झोला उठाकर की गयी इमानदार पत्रकारिता से तो नहीं दिया जा सकता।

पता चला कि केवल “पतांजलि” से मिलने वाला विज्ञापन लगभग ₹50 करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से अधिक है , पूरे विज्ञापन का बजट लगभग ₹400 से ₹500 करोड़ प्रतिवर्ष है। तो समझिए कि यह सैकड़ों चैनल पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं बल्कि “धंधा” कर रहे हैं , और धंधे में भाया “लाभ” सर्वोपरि होता है , और लाभ मिलता है सरकार की कृपा दृष्टि से , तो जब सरकार से लाभ लेना हो तो कोई सरकार की आलोचना क्युँ करेगा ? और वह भी ऐसे सरकार की जो “सीबीआई” को थानेदार बना कर छापा पड़वा दे ? इसीलिए सारे चैनल भजन गाते रहते हैं और सरकार और उनकी पार्टी के एजेन्डे और उनके लाभ से संबंधित झूठी सच्ची खबरें दिखाकर किर्तन करते रहते हैं।

न्यू डेलही टेलीविजन अर्थात एनडीटीवी इतनी वित्तीय आवश्यकताओं के बावजूद फिर भी पत्रकारिता के सिद्धांतों का कुछ हद तक पालन करता है , क्युँकि उसने अपने खर्चों को बहुत हद तक सीमित कर रखा है।

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किसी फिल्मसिटी के भव्य पाँच सितारा होटल जैसे भव्य भवन की जगह नयी दिल्ली के पुराने भवन स्थिति एनडीटीवी के ऐंकर और पत्रकारों का पैकेज मीडिया समूह में सबसे कम है , मुझे हैरानी हुई यह जान कर कि प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार का पैकेज तमाम चैनलों के सी ग्रेड पत्रकार और एंकरों से भी कम है। एनडीटीवी के पास 100 टीवी वाले ना तो भव्य स्टूडियो हैं ना ही इतने संसाधन जितने की अन्य व्यवसायिक चैनलों के पास होते हैं।

दरअसल यही कारण है कि एनडीटीवी कुछ हद तक वित्तीय आवश्यकता के समक्ष अपने पत्रकारिता के मूल सिद्धांत को कुछ हद तक बचाए हुए है , स्पष्ट हो जाइए कि “कुछ हद तक”।

और यही कारण है कि संबित पात्रा जैसे सत्तासीन दल के प्रमुख प्रवक्ता पैनल डिस्कशन से एनडीटीवी ऐंकर के द्वारा भगा दिए जाते हैं , जबकि अन्य सभी चैनल घुटनों के बल इन्हीं संबित पात्रा के समक्ष लाईव गिरे रहते हैं।
पैनलिस्ट के चुनाव में भाजपा समर्थित लोगों जैसे संघ विचारक राकेश सिन्हा , तिवारी और विनोद बंसल लोग हर चर्चा में शामिल रहते हैं चाहे विषय कोई भी हो।

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यही सब एनडीटीवी नहीं करता , गला चीखने और सरकार के लाभ और उसकी चमचागीरी नहीं करता जैसा कि और चैनल करते हैं।

रवीश कुमार ने ठीक शब्द चुना “गोदी मीडिया” , मोदी की गोदी में बैठकर पत्रकारिता बेचती है , मेरी भाषा दूसरी है तो मैं इन्हें “भाँड” कहता हूँ। “भाँड” जो भेष बदलकर मालिक के अनुसार मंच पर प्रदर्शन करे।

एनडीटीवी पर छापे की कार्रवाई , वह भी एक प्राईवेट बैंक के लोन को वसूलने के लिए , वो भी उस लोन के लिए जो 7 साल पहले चुकाया जा चुका है , वह भी सीबीआई जैसी जाँच एजेंसी “थानेदार” बन कर करे तो समझ लीजिये कि किस वजस से हुई , निधी राजदान ने संबित पात्रा को अपने शो से भगाया इसलिए हुई और तीसरे दिन ऐसी कार्रवाई करके सरकार ने सभी चैनलों को संदेश दिया कि चाटते रहो नहीं तो लात पड़ेगी यह है भारत के लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ की हकीक़त जो सिक्कों में तौल कर बेचा जा रहा है , वैश्या की तरह।

नोएडा स्थिति फिल्म सिटी जाईए वहाँ तमाम कोठे सजे हुए मिलेंगे , और मिलेंगे एक से एक दलाल और वैश्याएँ।
फिर भी एनडीटीवी वैश्याओं में एक शरीफ वैश्या है।

वरिष्ठ लेखक मोहम्मद जाहिद की फेसबुक वाल से लिया गया लेख


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