संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार राष्ट्रपति को ये अधिकार है कि वो किसी भी समय राष्ट्रपति शासन लागू कर सकते हैं. वो ये तब कर सकते है जब राज्यपाल की रिपोर्ट या और कारणों से संतुष्ट हो जाएँ कि राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल रहा है या नहीं चल सकता है.

इस लिहाज़ से देखें तो उत्तराखंड के मसले में भी कानून और संविधान का सवाल है और राष्ट्रपति ने अपने अधिकार क्षेत्र के अंतगर्त काम किया है. वे केंद्रीय मंत्रीपरिषद की सिफारिश पर काम करते हैं. केंद्रीय मंत्रीपरिषद की मीटिंग हुई और उसमें विचार विमर्श हुआ और उन्होंने राष्ट्रपति से सिफारिश की.

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अब ये राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए या नहीं, इस पर अलग अलग मत हो सकते हैं, इसका आकलन हो सकता है क्योंकि राष्ट्रपति शासन अंतिम विकल्प होता है. उत्तराखंड विधानसभा को भंग नहीं किया गया है. इसका मतलब ये है कि अब भी सरकार बनाने का रास्ता खुला हुआ है.

अगर राज्यपाल को किसी भी समय ये विश्वास हो जाए कि वैकल्पिक सरकार बन सकती है तो राष्ट्रपति शासन हटाकर वैकल्पिक सरकार बनाई जा सकती है.

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ऐसा होने के लिए ऐसा कोई राजनेता या दल सामने आना चाहिए, जिसको लेकर राज्यपाल आश्वस्त हों कि उसे सदन में बहुमत से समर्थन मिलने की आशा की जा सकती है.

हालांकि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. अब ये इस पर निर्भर होगा कि उनके पास क्या तथ्य हैं. कोर्ट यही देखती है कि राष्ट्रपति के सामने सारे तथ्य रखे गए या नहीं रखे गए.

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अगर लगता है कि राष्ट्रपति के सामने सारे तथ्य नहीं रखे गए तो कोर्ट दखल दे सकता है.


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