छात्रों पर पुलिस की लाठी उचित नहीं लेकिन एनआईटी में केंद्रीय बलों की तैनाती भी अनुचित है

कश्मीर में छात्रों पर पुलिस लाठीचार्ज के तुरंत बाद परिसर का जिम्मा केंद्रीय सुरक्षा बल ने ले लिया. जो दूसरे राज्यों में इतने आसानी से नहीं हो सकता, कश्मीर में कैसे हो गया?

पुलिस छात्रों पर लाठी चलाए, यह भारत के लिए कोई नई खबर नहीं है, हालांकि इसकी आदत-सी हो जाने के बावजूद हमेशा यह कहा जाना चाहिए कि भारतीय पुलिस को छात्रों से निबटने के तरीके का प्रशिक्षण दिया जाना ज़रूरी है. यह भी जानी बात है कि हिन्दुस्तानी पुलिस जब छात्रों पर लाठी चलाती है तो उसमें जो गुस्सा और चिढ़ होती है, वह उन्हें तितर-बितर करने से ज़्यादा उसी जगह सज़ा देने वाली होती है, जोकि पुलिस का काम नहीं है.

पुलिस की लाठी किस पर ज़्यादा ताकत से बरसती है, यह जानना बहुत मुश्किल नहीं है. आदिवासियों को वह मार खाने लायक ही मानती है, इसलिए मौक़ा मिलते ही उन्हें विरोध करने के लिए सबक सिखा दिया जाता है. यही दलितों के साथ उसके व्यवहार के बारे में कहा जा सकता है. गरीबों और अमीरों के साथ वह दो तरह से पेश आती है. आरक्षण विरोधी आंदोलन में इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन इत्मीनान से हुआ. बाकी वहां इकट्ठा भी नहीं हो सकते.

आम तौर पर सार्वजनिक विरोध जाहिर कर रहे समूहों के साथ पेश आने का प्रशिक्षण भारतीय पुलिस को या तो नहीं है, या वह जान-बूझ कर असल मौके पर उसे भूल जाती है. क्रूरता भारतीय पुलिस के जनता के साथ बर्ताव को परिभाषित करती है.

कश्मीर के एक छोटे परिसर की यह घटना एक राष्ट्रीय खबर और राष्ट्रीय चिंता में भी बदल गई. इससे कहीं भयंकर लाठी चार्ज अभी कुछ दिन पहले हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हुआ लेकिन उस पर राष्ट्रीय प्रतिक्रिया इस अनुपात में न थी.

पिछले हफ्ते कश्मीर में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी( एनआईटी) के छात्रों के एक समूह पर जब पुलिस ने लाठी चलाई तो वह अपने भारतीय कायदे के हिसाब से ही काम कर रही थी. कुछ लोगों ने चुटकी लेते हुए कहा कि कश्मीर की पुलिस ने जिस तरह छात्रों पर लाठी चलाई, उससे यह साबित हुआ कि वह भारत का हिस्सा है. जो गम की कहानी मजे लेकर कहने के प्रेमचंद के सिद्धांत में यकीन करते हैं, उनमें से एक ने कहा कि भारत में कहीं भारत माता की जय का नारा न लगाने पर पिटाई होती है, कहीं लगाने पर पिटाई होती है; इससे नतीजा यह निकलता है कि भारत को एक सूत्र में बांधने वाली चीज़ पिटाई है.

आश्चर्य की बात यह है कश्मीर के एक छोटे परिसर की यह घटना एक राष्ट्रीय खबर और राष्ट्रीय चिंता में भी बदल गई. इससे कहीं भयंकर लाठी चार्ज अभी कुछ दिन पहले हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हुआ लेकिन उस पर राष्ट्रीय प्रतिक्रिया इस अनुपात में न थी. उस प्रसंग में और उसके पहले केंद्र सरकार का मत यह था कि क़ानून व्यवस्था राज्य का मामला है, और वह उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती. यह ठीक भी है. लेकिन फिर इस सिद्धांत का पालन करते हुए भेदभाव नहीं किया जा सकता.

जब कहीं भी स्थानीय पुलिस की जगह केंद्रीय बल लेता है तो उसकी एक लंबी प्रक्रिया और मतलब होता है. तो जो दूसरे राज्यों में नहीं किया जा सकता, कश्मीर में कैसे हो सका?

आज की केंद्र सरकार का इस मामले में रिकॉर्ड कुछ ठीक नहीं है. बंगाल के मालदा में मुसलमानों के प्रदर्शन के दौरान हुई आगजनी और तोड़-फोड़ के बाद उसने फौरन वहां अपनी टीम भेज दी, लेकिन ऐसा हरियाणा की व्यापक और कहीं अधिक गंभीर हिसा के मामले में नहीं किया गया, वह राज्य का मामला बना रहा. इसका अर्थ यह नहीं है कि मालदा में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और हिंसा की कार्रवाई जायज थी. अभी हम सिर्फ इस तरह की घटना पर केंद्र की प्रतिक्रिया की बात कर रहे हैं.

एनआईटी में छात्रों के दो समूहों के बीच विवाद हुआ. ब्योरे अलग-अलग हैं. एक पक्ष कहता है, जो कश्मीरी छात्रों का है, कि भारत-पाकिस्तान मैच में पाकिस्तान के हारने पर उन पर छींटाकशी की गई. बाद में जब भारत वेस्ट इंडीज से मैच हार गया तो कश्मीरी छात्रों ने जश्न मनाया, ऐसा ‘बाहरी’ या ‘भारतीय’ छात्रों का कहना है.

इसके बाद कश्मीर से बाहर के छात्रों ने तिरंगा लेकर ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए परिसर से बाहर जाने की कोशिश की तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की और असफल होने पर लाठी चलाई. इन छात्रों की मांग है कि परिसर में तिरंगा लहराया जाए और संस्थान को जम्मू ले जाया जाए.

एनआईटी की घटना पर जम्मू में जो प्रतिक्रिया हुई है, वह विभाजन को और बढाने वाली है. अब इस पूरे प्रसंग को भारतीयता की रक्षा और उसके गौरव की बहाली का मामला बना दिया गया है.

घटना के तुरत बाद परिसर का जिम्मा केंद्र के अर्ध सुरक्षा बल ने ले लिया. यह असाधारण प्रतिक्रिया थी. इसके मायने बहुत गंभीर हैं. क्या कश्मीर पुलिस पर यह भरोसा नहीं किया जा सकता था कि वह ‘भारतीय’ छात्रों की हिफाजत करेगी? जब कहीं भी स्थानीय पुलिस की जगह केंद्रीय बल लेता है तो उसकी एक लंबी प्रक्रिया और मतलब होता है. तो जो दूसरे राज्यों में नहीं किया जा सकता, कश्मीर में कैसे हो सका?

फिर राजस्थान में और दूसरे स्थानों पर कश्मीरी छात्रों के साथ पिटाई और गिरफ्तारी की जो खबरें आ रही हैं, उनसे इन छात्रों की सुरक्षा के बारे में क्या सोचा जाए? क्या ऐसी तमाम जगहों पर केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात किया जाएगा?

एनआईटी की घटना पर जम्मू में जो प्रतिक्रिया हुई है, वह विभाजन को और बढाने वाली है. अब इस पूरे प्रसंग को भारतीयता की रक्षा और उसके गौरव की बहाली का मामला बना दिया गया है. एक परिसर में हुई झड़प और लाठी चार्ज पर पूरा शहर बंद करना और उसमें जम्मू के वकीलों का भाग लेना कहीं से जायज नहीं.

भारतीय जनता पार्टी का बयान भी चिंताजनक है. यह कहना कि इस घटना के बाद बाहर कश्मीर के छात्रों के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी, खतरनाक रूप से गैर जिम्मेवार और भड़काऊ बयान है. कश्मीर के छात्र पहले से ही भारत में संदिग्ध माने जाते रहे हैं. अभी हाल में राजस्थान में जिस तरह गोमांस पकाने का आरोप लगाकर उनकी गिरफ्तारी और पिटाई हुई, उसकी पृष्ठभूमि में इस बयान की गंभीरता को समझा जा सकता है.

चिंता की बात यह है कि हमारे राजनीतिक और सामाजिक वर्ग में अब यह इच्छा और क्षमता नहीं बची है कि वह विवाद के दौरान मध्यस्थता कर सके. वे किसी न किसी पक्ष में सिर्फ बयान दे सकते हैं और विवाद को गहरा कर सकते हैं.

उमर अब्दुल्ला ने ठीक कहा कि इस बहुत मामूली घटना को जिस तरह राष्ट्रीय बनाया जा रहा है, बाद में इसके नतीजों को संभालना मुश्किल हो जाएगा.

उससे भी चिंता की बात यह है कि हमारे राजनीतिक और सामाजिक वर्ग में अब यह इच्छा और क्षमता नहीं बची है कि वह विवाद के दौरान मध्यस्थता कर सके. वे किसी न किसी पक्ष में सिर्फ बयान दे सकते हैं और विवाद को गहरा कर सकते हैं. यही लाचारी हाल की हरियाणा की हिंसा में देखी गई. कोई भी अपने भीतर यह ताकत महसूस नहीं करता कि वह दो समूहों से बिना, पक्षपात के बात तक कर सके. इसकी तो उम्मीद ही छोड़ दीजिए कि वह गलती कर रहे समूह से यह कह पाए कि वह सही नहीं है. त्रिलोकपुरी की हिंसा के दौरान दलित अधिकार समूह लाचार दिखलाई पड़े.

जनतांत्रिक समाज के लिए यह अधिक फिक्र की बात है कि मध्यस्थता की क्षमता उसमें न रह जाए. समाज अगर विभिन्न प्रकार के हित-समूहों में बंट जाएगा और उनके पास साथ खड़े रहने की ज़मीन न होगी तो किस राष्ट्र का निर्माण होगा? अगर यह इच्छा ही नहीं है कि साझा जमीन को विस्तृत करेंगे तो भारत माता की जय का हर नारा विभाजनकारी ही जान पड़ेगा.

(ये लेख satyagrah से लिया गया है जिसके लेखक अपूर्वानंद है.. तथा इस लिंक पर आप लेख पढ़ सकते है)


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