कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले त्रासदी और फिर प्रहसन के रूप में। भारतीय राजनीति की त्रासद सच्चाई यह है कि यहां इतिहास बार-बार दोहराया जा रहा है।

हममें से शायद अब बहुत लोगों को अन्ना हजारे का पूरा नाम याद नहीं होगा। शायद मनीष तिवारी का नाम भी, कुछ लोगों को अब याद न हो। गूगल के इस दौर में आप जरा ये दोनों नाम टाइप कीजिए और जो प्रविशिष्ठियां सामने आएंगी, उनमें आपको 14 अगस्त, 2011 की एक वीडियो क्लिप भी मिल जाएगी।

kanhaiya at the time of tragedy and mockeryउस दिन कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बेहद गुस्से में बुलाई गई पत्रकार वार्ता में जो कुछ कहा था, वह कुछ इस तरह से था…किशन बाबूराव हजारे उर्फ अन्ना तुम किस मुंह से भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन की बात करते हो, तुम खुद ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हो…”

यह सत्ता के अहंकार का सबसे भोंडा प्रदर्शन था।

अप्रैल, 2011 में अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिल लाने की मांग को लेकर पहली बार जंतर मंतर पर अनशन किया था। अगले कुछ महीने के दौरान ही उनका इंडिया अगेंस्ट करप्शन यूपीए सरकार के लिए विरोध का मंच बन गया। 16 अगस्त को अन्ना ने रामलीला मैदान में अनशन शुरू कर दिया। इसके हफ्ते भर बाद मनीष तिवारी ने अपने बयान पर खेद जताया, मगर तब तक यूपीए की अलोकप्रियता चरम पर पहुंच चुकी थी।

बची-खुची कसर मणिशंकर के 18 जनवरी, 2014 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में दिए गए उस बयान ने कर दी थी, जिसमें भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा था, मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि 21 वीं सदी में नरेंद्र मोदी भारत के कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते, लेकिन यदि वह यहां चाय बेचना चाहेंगे, तो हम उन्हें यहां जगह दे सकते हैं !

सत्ता के अहंकार से जुड़े इन्हीं दो कथानकों ने यूपीए और कांग्रेस की पराजय का मार्ग तय कर दिया था।

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कालर रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तारी और फिर अंतरिम जमानत मिलने पर हुई रिहाई के बाद से जाने क्यों यूपीए कार्यकाल के दो वाकये याद आ रहे हैं।

जेएनयू में जिन लोगों ने भी देश की अखंडता को तोड़ने वाले भड़काऊ नारे लगाए हैं, उनके खिलाफ बिल्कुल कार्रवाई होनी चाहिए। मगर ऐसा लगने लगा है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लोग अदालती फैसले के पहले ही कन्हैया को एक आरोपी के बजाए दोषी ही मान रहे हैं। यही बात रोहित वेमुला के बारे में कही जा सकती है, जिनके बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि भारत माता ने अपना एक लाड़ला खो दिया!

लेकिन संसद में जिस तरह से केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी ने रोहित के मामले में मायावती के साथ हुई तकरार में अपना सिर काटकर उनके चरणों में रख देने का नाटकीय उपक्रम किया, वह सत्ता के अहंकार की भाषा में आई गिरावट का ही एक और उदाहरण है।

रक्षा राज्य मंत्री जनरल वी के सिंह ने कन्हैया के साथ ही रोहित को भी अब कठघरे में खड़ा कर दिया है। यदि आप पिछले तीन दिन के दौरान केंद्रीय मंत्रियों से लेकर भाजपा के प्रवक्ताओं और उसके आनुषांगिक संगठनों के छोटे बड़े स्वयंभू प्रवक्ताओं के बयानों पर गौर करें, तो पता चलता है कि कोई कन्हैया को चूहा कह रहा है, तो कोई मनोरोगी तो कोई देशद्रोही। इस कड़ी में आप राजस्थान के उस भाजपा विधायक को भी रख सकते हैं, जिसने जेएनयू में कंडोम, शराब और सिगरेट की रोजाना खपत के आंकड़े जुटाए थे!

दूसरी ओर स्थिति यह है कि जिस कन्हैया को 8 फरवरी तक जेएनयू परिसर से बाहर शायद ही कुछ लोग जानते थे, यूट्यूब पर उसके भाषण लाखों बार न केवल सुने-देखे जा चुके हैं, बल्कि उसने बेजान पड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों में जान भी फूंक दी है। हैरत की बात यह है कि ऐसे मामलों को जिन्हें विश्वविद्यालय के परिसरों में ही निपटा लिया जाना चाहिए था, उसे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने की कोशिश की जा रही है। यह सब उस सत्ता के हाथों हो रहा है, जिसके कई मंत्री 1974 के जेपी के छात्र आंदोलन की उपज हैं।

जेपी आंदोलन से उपजे ऐसे छात्र नेताओं में से बहुत कम के पास ही देश के बुनियादी सवालों को लेकर वैसी समझ रही होगी, जो कन्हैया में दिखती है। आप इससे असहमत हो सकते हैं, मैं आपकी असहमति के अधिकार का सम्मान करूंगा। वास्तविकता यह है कि कन्हैया ने गरीबों, दलितों और आदिवासियों का मुद्दा उठा कर, जब तब तीसरे मोरचे की पिटी हुई कवायद में जुट जाने वाले वाम दलों को भी एक रास्ता दिखाया है।

इतिहास के साथ एक अच्छी बात यह है कि उसका कॉपीराइट नहीं होता। मगर, जैसा कि स्पेनिश दार्शनिक जार्ज सान्तयाना ने कहा था, जो लोग अतीत को याद नहीं रखते, वह उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं। (amarujala)


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