ख़ालिद अयूब मिस्बाही

यह देख कर बड़ा दुख होता है कि ज़ाहिर में हिन्दुस्तान को आज़ादी की फ़ज़ा में साँस लेते हुए आज 70 साल पूरे हो चुके हैं लेकिन देश की जनता को आज तक वह अस्ल आज़ादी नहीं मिल सकी, जिसके लिए हमारे पुर्खों ने अपने प्यारे देश के लिए अपने ख़ून का एक-एक क़तरा बहाया था।

बल्कि सच्चाई तो यह कि हम भारतवासी यह भूलते जा रहे हैं आज़ादी के माहौल में साँसें लेना किसे कहते हैं। भला बताऐं तो सही! क्या आज भी हिन्दुस्तान में ज़ात-पात का मसअला नहीं, क्या आज भी विभाग-विभाग करप्शन से पूरे मुल्क का कोना-कोना नहीं झूझ रहा है, क्या आज भी हर शाम किसानों की लाशें फ़दों पर नहीं डोल रही हैं, क्या आज भी हर सुबह का अख़बार बहू-बेटियों की लुटती इज़्ज़तों की दास्तानें नहीं पढ़ा रहा है, क्या आज भी मुल्क की रोड़ों पर धर्म के नाम पर ख़ून की होली नहीं खेली जा रही है? क्या आज भी ऐसा, ऐसा, ऐसा नहीं होता???

क्या फ़र्क़ हुआ आज के जुल्म में और अंगे्रज़ों की गु़लामी के ज़ुल्म में, क्या मुखोटे बदल जाने का नाम देश बदल जाना है, क्या कुर्सी के ऊपर बैठी जिं़दा लाश की शक्ल बदल जाने का नाम आज़ादी रखा जा सकता है???, क्या ऐसा नहीं लगता जैसे तन के गोरे विदेशी ज़ालिमों से तो हमें ज़रूर छुटकारा मिला लेकिन मन के काले देशी नेताओं ने मुल्क को आज भी भ्रष्टाचार की भटटी में झोंक-झोंक रखा है???

क्या ऐसा नहीं लगता जैसे इस मुल्क में अम्बेडकर का लिखा हुआ क़ानून नहीं, गुंडों के हाथों की लाठियाँ चलती हैं?, क्या जब-जब किसी दलित की हत्या होती है, तब-तब किसी शहीदे आज़ादी का ख़ून पानी नहीं बनता?, क्या जब-जब किसी मुसलमान के साथ धर्म के नाम पर भेद-भाव होता है, 1857 में क़ुरबानी देने वाले बीसियों हज़ार मुस्लिम धर्म गुरूओं की क़ुरबानियाँ ज़ुल्म की भेंट नहीं चढ़ चुकी होतीं?

क्या हर शाम बिकाऊ चैनल आज भी अपने राजनीतिक आक़ाओं की चापलोसी के लिए मुल्क की जनता के ज़हनों में चीख़-चीख़ ज़हर के प्याले नहीं उंडेल रहे हैं?, क्या आज भी मुखोट बदल जाने के बा-वजूद भारत भर में जिस की लाठी, उसकी भेंस का दौर-दोरा नहीं?

गुंडागर्दी करने वाली संस्थाओं की दादागीरी, भ्रष्ट नेताओं का केलकुलेटर फ़ैल कर देने वाला भ्रष्टाचार, बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बराजमान अफ़सरों की हप-हप घूसखूरी, इंसानियत के लाशों पर राज करने वाले राजनेताओं की गंदी राजनीति, बेहद लचकीला तालीमी निज़ाम, निहायत ढ़ीला-ढ़ाला प्रशाषन, ज़ात-पात के झगड़े, धर्म-कर्म के नाम की लड़ाइयाँ, लोगों को बेवक़ूफ़ बना कर रखने वाले झूटे वादे, वोट बैंकिंग के लिए डेमाक्रेटिक सिस्टम तक को दाँव पर लगा देने वाली बे-ईमानियाँ, जनता का ख़ून जलाने वाली मीडिया का निकम्मापन, दवा-दारू के नाम पर मौत से पहले मौत के घाट उतार देने वाला हेल्थ सिस्टम, जड़ी-बूटियों के मुल्क में महंगी विदेशी दवाओं की धांधलियाँ, अपने लाशों को घर तक ले जाने के लिए ऐंबोलेंस को तरसते आदीवासी, भूक के मारे रोड़ों के किनारे तड़प-तड़प के मरने के लिए छोड़ दिए जाने वाले ग़रीब, जानवरों के नाम पर क़त्ल कर दिए जाने वाले शहीद बच्चे और इन सबके नतीजे के तौर पर कु़दरती नेअ़मतों से भरपूर होने के बा-वजूद सोने की चिड़िया की उड़ती हुई पंखड़ियाँ, भला बताऐं तो सही! आज आ़िख़र वह कौन सी बीमारी है, जो हमारे मुल्क में नहीं??़? मुल्क का वह कौन सा कोना है, जिसे आज़ाद कहा जा सके???

क्या किसी मुल्क का सेक्यूलर ढ़ाँचा ऐसा ही होता है? क्या मुँह भर-भर जान से ज़्यादा देशप्रेम की बातें करने वालों के जीने का यही अंदाज़ होता है? क्या इन्हीं दिनों के लिए थी 1857 क़ुरबानियाँ? क्या यही ख़्वाब सजाए थे देश के क़ानून लिखने वालों ने अपनी आँखों में? क्या देश से वफ़ादारी इसी का नाम है?

लगता तो नहीं कि जो क़ौम स्वतंत्रता दिवस, मनोरंजन और अपने पुर्खों से वफ़ादारी में फ़र्क़ नहीं कर पाती हो, वह इस निम्नलिखित प्रश्न का सही उत्तर दे पाएगी, ताहम जाते-जाते हर बैदार हिन्दुस्तानी के ज़िंदा ज़मीर से एक सवाल है।

अ़ज़ीज़ो! फ़र्ज़ी देशप्रेम की तरह 15 अग्रस्त की एतिहासिक तारीख़ के नाम पर भी आज़ादी की ख़ुशी में आपको जो कुछ करना हो, शौक़ से कीजिए, यह आपका अपना हक़ है, इससे आपको कोई नहीं रोक सकता, वैसे भी जब सब ज़बानी जमा-ख़र्च कर रहे हैं तो अपनी ताक़त भर आप भी कीजिए, लेकिन अगर आपके सीने के अंदर कोई इंसानी दिल धड़कता है तो डांस करने वाले स्कूली बच्चों के ठर्कों पर ठुमकने से पहले अगर आप फ़ज़ले हक़ ख़ैराबादी के फ़तवा ए जिहाद और दूसरे आज़ादी के हीरोंओं को ना याद कर सकें तो यह आपकी वफ़ादारी, लेकिन हाँ! 2017 में कम से कम अपने लिए एक बार अपने ज़मीर से यह सवाल करना और ज़रूर करनाः क्या सच-मुच हम आज़ाद देश में 70 सालों से आज़ाद जीवन व्यतीत कर रहे हैं???


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