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हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु का दौर-ए-ख़िलाफ़त है… दारुल ख़िलाफ़ा मदीने से कूफ़े में मुंतक़िल हो चुकी… शरिया इस्लामी मुम्‍लिकत के चीफ़ जस्टिस हैं… अमीर-उल-मोमनीन हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु और एक यहूदी का तनाज़ा (केस) उनकी अदालत में पेश होता हुआ…। अमीर-उल-मोमनीन की ज़िरह (कवच) कहीं गिर पड़ी थी, और उस यहूदी के हाथ लग गई… अमीर-उल-मोमनीन को पता चला तो उन्होंने उससे ज़िरह का मुतालबा किया, मगर यहूदी ने कहा कि ज़िरह मेरी है… चुनाँचे देने से इंकार कर दिया…।

अमीर-उल-मोमनीन ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया…। चीफ़ जस्टिस, शरिया ने फ़रीक़ैन के बयान लिये… यहूदी ने अपने बयान में कहा कि ज़िरह मेरी है, और इसका सबूत ये है कि मेरे क़ब्‍ज़े में है…। चीफ़ जस्टिस शरिया ने अमीर-उल-मोमनीन से अपने दावे के सबूत में गवाह पेश करने को कहा…। हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु ने दो गवाह पेश किए:
हज़रत हसन और क़ुनबर…। चीफ़ जस्टिस शरिया ने कहा कि क़ुनबर की शहादत तो क़बूल करता हूँ लेकिन हसन की शहादत क़ाबिल-ए-क़बूल नहीं है…। अमीर-उल-मोमनीन ने कहा कि क्या आप हसन की शहादत को मुस्तरद करते हैं…? क्या आपने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वआलेही वसल्लम का इरशाद नहीं सुना! कि हसन और हुसैन जन्नती नौजवानों के सरदार हैं..?

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि सुना है मगर मेरे नज़दीक बाप के हक़ में बेटे की शहादत मोताबर नहीं…। दूसरा शाहिद (गवाह) ना होने की वजह से अमीर-उल-मोमनीन का दावा ख़ारिज कर दिया गया…।

अमीर-उल-मोमनीन ने ना तो कोई आर्डीनैंस जारी किये और ना किसी क़ानून की पनाह ढूंढी, बल्कि उस फ़ैसले के आगे सर-ए-तस्लीम-ए-ख़म कर दिया…। यहूदी इस फ़ैसले से बेहद मुतास्सिर हुआ…। उसने देखा कि एक शख़्स साहिब-ए-इख्‍तियार होने के बावजूद उसकी ज़िरह उससे छीनता नहीं… बल्कि अदालत के दरवाज़े पर दस्तक देता है… अदालत भी उसके साथ कोई इमतियाज़ी सुलूक नहीं करती…। मुद्दई और मुद्दआ दोनों यकसाँ हालत में अदालत के सामने पेश होते हैं…। अमीर-उल-मोमनीन जज का फ़ैसला बे चूं-ओ-चराँ तस्लीम करता है…।

अदालत और अमीर-उल-मोमनीन का मुंसिफ़ाना किरदार उसके दिल में खूब जाता है…। वोह वहीं इस्‍लाम क़ुबूल कर पुकार उट्ठा कि ज़िरह अमीर-उल-मोमनीन की है… और जिस दीन का मानने वाला क़ाज़ी, अमीर-उल-मोमनीन के ख़िलाफ़ फ़ैसला सादिर करता है, और अमीर-उल-मोमनीन उस फ़ैसले को बिला हील-ओ-हुज्जत मान लेता है वोह यक़ीनन सच्चा है…। अमीर-उल-मोमनीन हज़रत अली रज़िअल्लाहु तआला अन्हु उस यहूदी के इस्लाम लाने पर इतने मसरूर हुवे कि बतौर यादगार अपनी ज़िरह उसे दे दी…।

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लेखक: तनवीर त्यागी

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