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कुरैश ने घेराव शुरू कर दिया। अब मुत्तलिब खानदान की मुश्किलें बढ़ गईं। ऐसे मुश्किल हालात में भी अबू-लहब उनसे दूर ही रहा। वह कुरैश को नई-नई खुराफात सिखाया करता था। उसने ही उन्हें बहिष्कार का सुझाव दिया था। जो मुहम्मद (सल्ल.) का पक्ष लेते, उन्हें कष्ट देने में उसे आनंद आता था। वह कुरैश के कपट में भागीदार बनकर रहा।

नुबूवत का सातवां साल आ गया। विरोधियों ने पूरे कुटुंब सहित अबू-तालिब को एक घाटी में नजरबंद कर रखा था। बहुत कष्ट के क्षण थे। इतिहास में यह घाटी शेबे-अबी-तालिब के नाम से जानी जाती है। अब जबकि अबू-तालिब वृद्ध हो चले थे, कुरैश ने उन पर कोई नर्मी नहीं बरती, उनका दिल नहीं पसीजा। वे लगातार पाबंदियां लगा रहे थे, शिकंजा कसते ही जा रहे थे।

अरब में चार महीनों के दौरान झगड़े रुक जाते थे। इन्हें बहुत प्रतिष्ठित माना गया है। इनके नाम हैं- रजब, जीकादा, जिलहिज्जा तथा मुहर्रम। इन महीनों में आपसी टकराव का खतरा टल जाता। बेफिक्री का माहौल होता। ऐसे में मुहम्मद (सल्ल.) बाहर आते, लोगों तक रब का पैगाम पहुंचाते।

इस बीच हब्शा में रहने वाले मुसलमानों को उमर के हृदय परिवर्तन का समाचार मिला। उन्हें मालूम हुआ कि लोग अल्लाह के पैगाम को समझने में ज्यादा रुचि ले रहे हैं। अंधकार के सामने प्रकाश की किरण छोटी ही सही, पर उसका तेज प्रबल हो रहा है। जिसने भी यह सुना, बहुत खुश हुआ। अब मुसलमान अपने देश जाने को अधीर हो उठे। वे अपने वतन को भूले ही कहां थे, उन्हें तो मजबूरी में अपने घर को अलविदा कहना पड़ा था।

आज उन्हें उस मिट्टी की खूब याद आ रही थी जिसमें वे पैदा हुए थे, जहां उनके बाप-दादा और पुरखे दफनाए गए थे।उन्होंने हब्शा छोड़ दिया, अपने प्यारे वतन की ओर चल दिए। मक्का थोड़ी ही दूर रहा होगा कि उन्हें हकीकत मालूम हुई। जो मुहम्मद (सल्ल.) की ओर हैं, उनके साथ खूब सख्ती बरती जा रही है, वे घेराबंदी में हैं। उनकी मुसीबतें कम नहीं हुई हैं, कड़ा पहरा है। न किसी से मिलना, न किसी व्यक्ति की मदद। केवल अभावों का जीवन है। इससे मुसलमानों को निराशा हुई। वे पुनः हब्शा लौट गए।

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) बहुत तकलीफ में थे। यह एक या दो दिन की बात नहीं थी। आप (सल्ल.) तीन साल तक ऐसी ही विकट परिस्थितियों के बीच रहे। मुश्किलें आतीं तो सब्र करते। साथियों को धीरज बंधाते कि उनका हौसला न डिगे।

हर दिन हालात बिगड़ते जा रहे थे। ऐसे में आप (सल्ल.) साथियों व उनके परिजनों को लेकर बहुत चिंता करते। उन्होंने मुसलमानों को आज्ञा दी कि वे भी हिजरत करें, हब्शा चले जाएं और वहां सुख से रहें। उनके जाने के बाद मक्का में गिनती के मुसलमान रह गए।

चाचा अबू-तालिब पूरी शक्ति के साथ जान से ज्यादा प्यारे भतीजे की सुरक्षा में जुटे थे। जब सोते तो अपने पास सुलाते। कहीं जाना होता तो अपने किसी बेटे को साथ भेजते कि भतीजे पर कोई संकट न आ जाए।

भूख, बंदिश व कठोर दमन के उस दौर में भी अबू-तालिब झुके नहीं। वे अपने संसाधनों से मुहम्मद (सल्ल.) की भरपूर मदद करते रहे। कुरैश की हर शर्त को ठुकराते रहे। मुसीबतें आती हैं तो आएं। वे हर मुसीबत को अपने अटूट इरादों से चुनौती देते रहे।

मेरी नजर से पढ़िए
कैसी रही होगी वह घेराबंदी की जिंदगी, जब प्यारे नबी (सल्ल.) बंदिशों का सामना कर रहे थे? बहुत पीड़ादायक, जिसकी आज हम सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। कैसी रही होगी उन लोगों की अनुभूति, जो हब्शा से चले थे अपने वतन की ओर, मगर बीच रास्ते से ही बुझे मन से वापस लौटना पड़ा? बहुत दुखद। इसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने मजबूरी में अपना देश छोड़ा हो।

यकीनन वे लोग महान देशप्रेमी थे, जो हब्शा का सुरक्षित व सुखी जीवन छोड़कर वापस अपने देश आना चाहते थे। इस्लाम में देशप्रेम का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। जब मुसलमानों को कुरैश की घेरेबंदी की खबर मिली और सभी रास्ते बंद मिले तो वे बहुत ही दुखी मन से हब्शा लौटे।

अपनी मिट्टी किसे प्यारी नहीं होती? सभी को होती है। इस्लाम का उदय होने के बाद अल्लाह के रसूल (सल्ल.) और उनके साथियों के जीवन की ऐसी कई घटनाएं हैं जो रब की भक्ति के साथ उनके महान देशप्रेम को दर्शाती हैं। इस्लाम में देशप्रेम दिखावेबाजी का नहीं, बल्कि ईमान का ही एक हिस्सा है।

कुरैश ऐसी शर्तें लादते रहे जिससे मुहम्मद (सल्ल.) का हौसला टूट जाए। वे हर रास्ता बंद कर रहे थे, जहां उनका जोर चलता, ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहे थे, हरकतें ऐसी कि कोई भी अच्छा-भला इन्सान आपा खो दे, वे उग्रता की अग्नि को भड़का रहे थे … क्या उस समय मुहम्मद (सल्ल.) ने अपना नेक स्वभाव छोड़ दिया? नहीं, बिल्कुल नहीं। वे नजरबंदी में भी वैसे ही थे, जैसे उससे पहले हुआ करते थे।

कुरैश के पाले में षड्यंत्रकारी भरे पड़े थे। उनका काम ही मुहम्मद (सल्ल.) को परेशान करना था, परंतु उनकी सख्त घेराबंदी हमेशा नहीं चल सकी।

आज की कड़ी में हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है। जिंदगी में मुश्किल हालात पैदा हो सकते हैं। ये आजमाइश की घड़ियां हैं। ऐसे में हौसला न डिगने दें। उम्मीदों का दामन न छोड़िए। अच्छे फल की आशा से मुंह मत मोड़िए। परीक्षा में फेल हो गए, किसी काम में मनचाही सफलता नहीं मिली, लोग आपको मजाक का विषय समझ रहे हैं तो हिम्मत बिल्कुल मत हारिए।

यह जीवन का सिर्फ एक पड़ाव है। इसे हमेशा की रुकावट समझने की भूल मत कीजिए। यही तो पूरा जीवन नहीं है। चिंताओं के चक्रव्यूह में खुद को कैद मत कीजिए। ज्यादा उत्साह से मेहनत कीजिए।

खुद पर भरोसा कीजिए, खुदा पर भरोसा कीजिए। आपकी या मेरी मुश्किलें अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की मुश्किलों से तो ज्यादा नहीं हैं! सब्र कीजिए, हार मत मानिए और याद रखिए, हालात चाहे लाख बुरे हों, आपका खुदा इस समय भी उतना ही करीब है जितना कि वह अच्छे हालात में आपके करीब होता है।

शेष बातें अगली किस्त में…

– राजीव शर्मा –
गांव का गुरुकुल से


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