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कोहराम न्यूज़ के लिए वसीम अकरम त्यागी का लेख

Published – 2 Feb 16 – Republished 24 April 16

World Hizab Day, हिंदी में कहें तो इसका अनुवाद विश्व पर्दा दिवस होता है। अब से पहले यह दिवस कभी नहीं सुना मगर इस बार फेसबुक पर देखने को मिल रहा है कि पर्दा दिवस भी कोई दिवस होता है। सोशल मीडिया पर ‘मुस्लिम महिला सशक्तीकरण’ आंदोलन चल रहा है।

जिसके केंन्द्र में मुस्लिम महिलाओं की समस्या की जड़ बुरके को ठहराया जा रहा है। क्या सचमुच ही बुरका पिछड़ेपन की निशानी है ? क्या बुरका ही मुस्लिम महिलाओं की समस्या की जड़ है ? क्या मुस्लिम महिलाओं की समस्याऐं देश के दूसरे समुदयों की महिलाओं की समस्याओं से अलग हैं ? बुरका अगर समस्या की जड़ है तो फिर वह कौनसी समस्या है जो बुरका पहनने से आ जाती है, और बुरका उतारकर खूंटी पर टांग देने से भाग जाती है ? जिस आधी आबादी की बात की जाती है, जिस आधी आबादी के मुद्दों पर बहस होती है क्या उस आधी आबादी में मुस्लिम महिलाओं को नहीं रखा जाता ? बुरका न तो पिछड़ेपन की निशानी है और न किसी समस्या की जड़ और न ही किसी भी समस्या का समाधान है।

दरअस्ल बुरका कल्चर के पीछे बड़ा बाजार है, बाजार में बुरके की कीमत 500 रूपये से शुरु होती है औऱ फिर दस हजार तक जाती है। बुरका कारोबारी भी ज्यादातर बनिया वर्ग हैं वे बुरका बनाते हैं बेचते हैं यह जानते हुऐ भी कि बुरका ‘पिछड़ेपन’ का प्रतीक है ?

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़, झारखंड, बंगाल, असम, कर्नाटक आदी राज्यों में ग्रामीण मुस्लिम महिलाऐं साड़ी पहनती हैं। वहां बुरका नहीं है मगर उन महिलाओं की कोई समस्या न हो ऐसा भी नहीं है। उन्हीं राज्यों में हिंदू महिलाऐं चार फीट लंबा घूंघट ढ़ाप कर रहती हैं, यह घूंघट ससुर, जेठ, या दूसरे गैर मर्दों से किया जाता है फिर इसको क्या कहा जायेगा ?

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आखिर महिला सशक्तीकरण का मतलब क्या है ? क्या बुरका उतारकर खूंटी पर टांग देना महिला सश्कतीकरण कहलाता है ? क्या मिनी स्कर्ट और शॉट बिलाऊज पहनने वाली महिला को ही सशक्त नारी कहा जाता है ? फिर कैसे सोनिया गांधी, मायावती, सुष्मा स्वराज, महबूबा मुफ्ती को सशक्त महिला मान लिया गया क्योंकि इन महिलाओं ने तो कभी वह ड्रेस पहनी ही नहीं जिसे पहन लेने से मात्र से ही कोई भी सशक्त महिला होने का सर्टिफिकेट दे देता है।

बुरका पहन लेन से न तो कोई महिला पिछ़ड़ी हो जायेगी और न ही बुरका उतारकर फेंकने से वही महिला सशक्त हो जायेगी। हां बुरका थोपा जाना, बुरके पहनने के लिये किसी को विवश करना, मार पीट करना यह जरूर पिछड़ेपन की निशानी हैं। जब सवाल महिलाओं की समस्याओं का, या सशक्तीकरण आता है तो उसके केंद्र में कहीं भी बुरका तो है नहीं, बल्कि केंद्र में होती हैं वे समस्याऐं जिन्हें समाज के लोग ही जन्म देते हैं।

कन्या भ्रूण हत्या, लड़की पैदा होने पर मां के साथ सोतेला व्यवहार करना, मार पीट करना, ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ महिलाओं को कमतर करके देखना, उनके ‘मासिक धर्म’ पर चुटकी लेना। ये समस्याऐं पहले से ही मौजूद थीं और हैं, क्या ये सारी समस्याऐँ सिर्फ बुरका पहन लेने की वजह से ही पैदा हुई हैं ? दरअस्ल हम जिस समाज में जी रहे हैं हम जीने के साथ – साथ पुरुष प्रधान समाज, और सामंती सोच को भी ढ़ो रह हैं, इसी समाज ने अलग – अलग परिभाषाऐं तय कर रखी हैं। मसलन किसी महिला के साथ बलात्कार हो जाता है तो कहा यह जाता है कि महिला की इज्जत लूट ली इज्जत लूट ली कहना कितना उचित है ? इज्जत तो बलात्कारी की जानी चाहिये जैसे किसी चोर की जाती है जब वह चोरी करते हुऐ पकड़ा जाता है। मगर महिलाओं के बारे में धारणा बदल जाती है बलात्कार होने पर पीड़ित को अपना चेहरा छुपाना पड़ता है और बलात्कारी इसी समाज में सीना चोड़ा करके घूमता है। जहां असल समस्या है वहां हम देख ही नहीं पाते और फालतू के कुतर्क में उर्जा नष्ट करते हैं।

wasimakram
वसीम अकरम त्यागी – लेखक जाने माने पत्रकार और समाजसेवी है

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