एक देश दो नाम ! एक संविधान और उसके प्रति दो सोच एक वो समूह है जो इस संविधान और झंडे के तले मजबूर होकर खड़ा है नाममात्र को इसे लागू/फालो करता है ! जिसके लिये संविधान था उसने कभी देश चलाया ही नहीं ! जिनको सुधार कर बानर से आदमी बनना था उन लंगूर बानरों का राज रहा ! बड़ी विकट कहानी है रे इस तिलिस्मी देश की !

और एक वो समूह है जो इसको कुरान समझता है कि हिज्जे से नुक्ते तक “आसमां से उतरी है वो मुकम्मिल है” पर अफसोस जैसे कुरान आसमानी ही रही मुसलमानों के लिए वैसे ही दलितों-वंचितों के लिए ये संविधान भी आसमानी ही रहा !
इस हालात पर फैज सर की ये लाईनें याद आयीं –
“ईक कूंज सखियां छोड़ गयीं
आकाश की नीली राहों में
वो तन्हा-तन्हा रोती थी
लिपटाये अपनी बांहों में
इक साही उस पे झपटा है !

शोपेन का नगमा बजता है
शोपेन का नगमा बजता है !

तो साब मैं बड़ा मुंहफट्ट और खरी कहता हूं जो सच है वो लिखता हूं इस सच ने मुझे परेशान भी किया और पराजित तो जब तक जिंदगी की एक सांस भी बाकी है मैं लड़ता रहूंगा !

मेरा मानना है हमारा संविधान लागू ही नहीं हुआ अभी बस जेल कारावास फांसीं एनकाऊंटर…
आई पी सी (इंडियन पीनल कोड) लागू है और उसी से देश चलता है ! सच्ची बोलना रे ये ही सच है या नहीं ? तुमको तुम्हारे बच्चों की कसम !

संविधान की उद्देशिका और नीती निर्धारक पंक्तियाँ पढो ! आह ! किसी जन्नत किसी हैवन किसी स्वर्ग की परिकल्पना से कम हैं क्या ? पर साहबानो-खवातीन जैसे बगैर शैतान के जन्नत नहीं जैसे बगैर निगेटिव के पाजिटिव नहीं बगैर बांये के दांयां नहीं यही “थ्योरी आफ रिलेटीविटी हे” पर हम कैसे निगेटिव और पाजिटिव को कवर कर रौशन बल्ब जलायें ?? जब बात यहां तक आ चुकी कि निगेटिव पाजिटिव का अस्तित्व मानने से इनकार कर दे ?

तो भाई अपने आप में कोई भी मैटर मुकम्मिल नहीं होता बस मैटर होता है

(समझ गये ना ? इंडिया दैट इज भारत के जटिल समाज की बात कर रहा हूं )

तो भारत दैट इज इंडिया वालो “व्यहार और अंतर्विरोध के बारे में” बगल में माओत्से तुंग सर ने एक लेख लिखा था पढ लेना ! विपरीत तत्वों की एकता कैसे हो सकती है समझना !
आजतक इतना ही समझते आये हो कि “दुशमन का दुशमन दोस्त होता है !” और यही सोच खा गयी तुमको दो निगेटिव ही खोजते रहे !!

हद है यार !!

युवा दीप पाठक – लेखक वरिष्ठ समाजसेवी है

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