ये बात मेरे नास्तिक होने के कई साल पहले की है. मेरे एक रिश्तेदार के घर हर दूसरे हफ्ते कोई न कोई पूजा होती थी और अक्सर उसका प्रसाद होता था दूध-दही-घी-शहद-शक्कर से बना पंचामृत. इससे मुझे बहुत उबकाई आती थी और आज भी आती है.

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जब भी मुझे वहां ले जाया जाता, मैं पंचामृत पीने से बचता रहता था. लेकिन कोई न कोई मुझे भगवान का डर दिखाकर वो पंचामृत पिला ही देता. और मैं मन ही मन भगवान को कोसता. इसका ये मतलब नहीं था कि उस समय मेरी भगवान में आस्था नहीं थी, लेकिन मेरा मन कहता था कि अगर सिर्फ इस पंचामृत के पीने से ही मेरी भक्ति सिद्ध होती है, तो भाड़ में जाए ऐसी भक्ति और भाड़ में जाए ऐसा प्रमाण-पत्र.

अगर देशप्रेम भी सिर्फ किसी 2-4 शब्द के नारे का नाम है और किसी धुन पे रीढ़ सीधी रखना उसका लिटमस टेस्ट है, तो मेरा नाम देशप्रेम की सूचियों में कहीं बहुत नीचे पाया जाएगा. मुमकिन हो सका, तो मैं उसे वहां से भी मिटाना पसंद करूंगा.

मैंने तो अपनी मां से भी किताबों की परिभाषाओं के मुताबिक प्रेम नहीं किया, क्योंकि उन्हें महान बनाकर मैं उनकी भक्ति तो कर सकता था, पर प्रेम नहीं. उनकी कमियों के साथ मुझे मेरी मां, मेरे ज्यादा करीब लगी. मैंने उनकी बातों से असहमति जताई. उनके जो काम मुझे गलत लगे, कभी अंधा होकर उनका पक्ष नहीं लिया.

मैंने उन लोगों से बातचीत और मिलना-जुलना जारी रखा, जिनका उनसे झगड़ा था. मैं अपने देश से भी ऐसे ही प्रेम करना चाहता हूं. अगर इन बातों से आप मेरे नंबर काटते हैं, तो आपके मातृप्रेम की मेरिट लिस्ट के सभी स्थान आपको मुबारक हों.

मेरे लिए देश एक बड़ा संयुक्त परिवार है. उसके हर सदस्य को एक-दूसरे से असहमति जताने का पूरा अधिकार है. परिवार के हर सदस्य की निजता और स्वतंत्रता के लिए मैं उसके साथ खड़ा हूं. मेरे परिवार का कोई सदस्य अगर परिवार तोड़ने की बात करता है, तो उसे पीटने की बजाय मैं उसे अपने पास बैठाकर उसके इस विचार का कारण उससे पूछना चाहूंगा.

मैं अपने परिवार का इतिहास जानता हूं और उसकी गलतियों की वजह से जो सदस्य पीछे रह गए हैं, मैं आज उन्हें बाकियों से अधिक मौके देना चाहूंगा. मैं कुछ सदस्यों के अतार्किक हठ के खिलाफ खड़ा रहूंगा.

परिवार की रसोइयां चाहे अलग-अलग हों, लेकिन जब तक परिवार के अधिकतर सदस्य हर दूसरे दिन भूखे सोते रहेंगे, मुझे अपने परिवार पर शर्म आएगी. अगर मेरे परिवार के चंद लोग लगभग सारी संपत्ति के मालिक हों और वो हर दिन परिवार के सबसे पुराने सदस्यों के एक-एक कमरे पर कब्जा करते रहें और मेरा बाकी परिवार टीवी पर क्रिकेट-सिनेमा का आनंद लेते हुए सुखी हो, तो मैं अपने परिवार को किस मुंह से महान कहूं?

हमने जिन्हें परिवार चलाने की जिम्मेदारी दी है, वो चाहे जिस विचारधारा से ताल्लुक रखते हों, अगर वो अपना काम नहीं करेंगे, तो मैं उन्हें बार-बार याद दिलाऊंगा कि उन्हें हमने ही कंधे पर उठाया है और कंधे एक-एक करके ही हटते हैं.

(यह आलेख कवि, गीतकार और ब्लॉगर पुनीत शर्मा ने लिखा है.)


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