1 मई को विश्व मजदूर दिवस था। मजदूरों के अधिकारों को लेकर यह लेख आपके लिए पेश कर रहा हूं। यूं तो इसे 1 मई को ही आप तक पहुँचाना ज्यादा अच्छा होता, मगर मैं काम में उलझा रहा आज वक्त मिलने पर आप तक पहुंचा रहा हूँ। सबसे माफी चाहूंगा।

अगर मालिक-मजदूर के रिश्तों पर कुछ कहना हो तो मैं कहूंगा कि हजरत मुहम्मद (सल्ल.) वह पहले शख्स थे, जिन्होंने मजदूर के हितों का ज्यादा मजबूती से समर्थन किया। अगर दुनिया उनकी बात दिल से मानती तो मजदूर कभी मजबूर नहीं होता। आप (सल्ल.) ही ने दुनिया को बताया था कि मजदूर को उसकी मजदूरी पसीना सूखने से पहले दे दो।

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इसमें दो बातें हैं। पहली, मालिक ध्यान रखे कि मजदूरी देने में आनाकानी, बहानेबाजी, बेवजह की सख्ती न करे। दूसरी, मजदूर भी ध्यान रखे कि वह पूरी ईमानदारी से मेहनत करे। यहां पसीने से मतलब मेहनत से है। कामचोरी और मुफ्तखोरी का मर्ज कभी न पाले।

दुनिया के मजदूरों, आज पढ़ो यह कहानी और सबक लो कि अगर तुम कभी मालिक बनो तो तुम्हारे तौर-तरीके कैसे होने चाहिए। दुनिया में खुद को मालिक समझने वालों, याद रखो, तुमसे ऊपर भी एक मालिक है।

यह कहानी बहुत साल पहले मैंने मेरी लाइब्रेरी गांव का गुरुकुल में पढ़ी थी। वह किताब मुझे अंग्रेजी के शिक्षक श्री सरदार सिंहजी ने दी थी। मैं याददाश्त के पन्नों से वही कहानी पढ़कर आपको सुना रहा हूं। … तो कहीं न जाइए, गौर से सुनिए वह कहानी।

एक व्यापारी को विरासत में करोड़ों की दौलत मिली। दौलत देखकर उसके मिजाज बदल गए। उसने पहले ही दिन यह फैसला कर लिया कि दौलत का यह ढेर और बड़ा करने के लिए हर तरीका अपनाऊंगा।

अगर मुझे जमीर बेचना पड़े, तो बेचूंगा। अगर किसी गरीब का पेट काटना पड़े, तो बेहिचक काट दूंगा। उसका एक नौकर था। अब उसने नौकर के साथ बहुत ज्यादा सख्ती बरतनी शुरू कर दी।

वह खुद महंगे जूते पहनता था, पर नौकर को इतने पैसे भी नहीं देता कि वह चप्पल खरीद सके। वह अपना जोर दिखाने के लिए हर दिन नए-नए नियम लागू करता, मगर नौकर से यह नहीं पूछता कि किसी नियम से उसे कोई तकलीफ होगी या नहीं।

वह हरदम सोचता कि मेरा नौकर कहीं मुझसे ज्यादा पैसेवाला न हो जाए, इसलिए वह उस पर जुर्माना लगाने के नए-नए बहाने ढूंढ़ता। अगर नौकर एक सेकंड भी देरी से आता तो उसके पूरे दिन की मजदूरी काट लेता, लेकिन काम उससे पूरा दिन लेता। ऐसे जुल्म सहन करते नौकर व उसका परिवार त्राहि-त्राहि करने लगे।

एक दिन नौकर ने दिल से रब को पुकारा- ऐ मेरे खुदा, जब सबका मालिक तू है तो तेरे बंदों की क्या औकात कि वे खुद को खुदा समझने लगें! कुछ तो रहम कर दे।

दिन गुजर रहे थे। अब मालिक के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। वह शहर जाकर एक कानूनी कागज ले आया और उस पर नौकर से अंगूठे का निशान लगवा लिया कि तू मेरी इजाजत के बगैर नौकरी नहीं छोड़ सकता।

एक दिन मालिक ने अपने नौकर से कहा, कल सुबह बहुत जरूरी काम से कहीं जाना है। इसलिए सुबह 4 बजे हर हाल में मेरे घर पहुंच जाना।

दूसरे दिन नौकर घर पहुंच गया। मालिक बोला, कामचोर, आज तू पूरे दो सेकंड देरी से आया है।

नौकर ने कहा, हुजूर, नंगे पांव चलता हूं। पहनने को चप्पल भी नहीं। अंधेरे में कांटा चुभ गया था।

मालिक तो मालिक ठहरा, बोला- अरे कामचोर, तेरे पास चप्पल नहीं तो तू मेरी तरह जूते क्यों नहीं पहनता? खैर, आज तू दो सेकंड देरी से आया है, इसलिए तेरी पूरे दिन की मजदूरी काटूंगा। ये समझ ले कि आज तू छुट्टी पर था। एक पैसा भी नहीं दूंगा।

उसने नौकर को एक भारी बक्सा उठाकर चलने का आदेश दिया। बक्से में सोना, चांदी, हीरे जवाहरात थे। यह सेठ के पुरखों की पूरी कमाई थी। वह इसे बैंक में जमा करवाना चाहता था।

अभी अंधेरा छंटा नहीं था, इसलिए मालिक लालटेन हाथ में लेकर आगे-आगे चल रहा था। वह नौकर को भरपूर गालियां दे रहा था। नौकर नंगे पांव था। उस पर भारी बक्सा चलने में दिक्कत पैदा कर रहा था।

दोनों कुछ दूर ही चले होंगे कि जंगल में शेरों का झुंड मिल गया। नौकर ने बक्सा फेंका और तुरंत पेड़ पर चढ़ गया। मालिक के होश उड़ गए। उसे पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था।

उसने नौकर से कहा- दोस्त, ऐसा न करो, चलो हाथ बढ़ाओ, मेरी मदद करो। अगर मुझे बचा लोगे तो इस बक्से का आधा माल तुम्हें दे दूंगा।

नौकर ने जवाब दिया, माफ कीजिए हुजूर, मैं आज छुट्टी पर हूं। चाहें तो आप पूरे दिन की मजदूरी काट लीजिए।

– राजीव शर्मा –

गांव का गुरुकुल से


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