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चलिए ईद पर अपनी पहली ईद से जुड़ी सच्ची बात सुनाता हूँ। कहानी समझ के सुन लीजिए,वैसे हर लब्ज़ का गवाह मैं खुद हूँ।

सन् 2000 की बात है। मुझे सरस्वती विद्या मन्दिर,BHEL sec 2 ,हरिद्वार में पढ़ते हुए तीन साल हो गए थे। आठवीं पास कर नौवीं में आया था। संघ की शाखाओं को लगाते व मुख्य शिक्षक रहते भी दो साल हो गए थे। धुर ब्राह्मणीय और साम्प्रदायिक माहौल में पलते हुए दिमाग किसी और धर्म को स्वीकार करने को तैयार नहीं होता था। संघ प्रदत्त ज्ञान के अनुसार सिर्फ हिन्दू होना ही राष्ट्रवाद था,बाकी धर्म सिर्फ साम्राज्यवाद और ज़हालत के प्रतीक थे। पर गाँव का बचपन कुछ पराग जैसी पत्रिकाओं और मम्मी पापा की सुनाई हामिद की कहानी से भी गुजरा था। साहित्य पढ़ने के शौक ने बहुत से मुस्लिम नाम वाले नायक भी दिमाग को दिए थे। पर विधर्मियों द्वारा धर्म के नष्ट हो जाने का भय हमेशा हावी रहता था।


इसी दौरान स्कूल में पहले मुस्लिम बच्चे ने मेरी कक्षा में प्रवेश लिया। मोहसिन रज़ा नाम है उसका। मेरे अच्छे दोस्तों में से एक। बहुत भला,मेहनती और ईमानदार। लन्च के दौरान साथ बैठे हुए खाते समय मैंने एक दिन उससे पुछा कि वह अपना खाना मुझसे बांटता क्यों नहीं? उसने कहा बांटूंगा तो भी क्या तुम खा लोगे? मुझे झटका सा लगा और पहली बार अपने संकीर्ण साम्प्रदायिक दायरे का आभास हुआ। उस दिन से मैंने उससे खाना बांटने का प्रयास किया। पहली ईद आई तो घर से झूट बोलकर उसके घर पहुंचा। आपको पढ़कर हंसी आएगी पर वहां बैठे हुए मेरे संकीर्ण संस्कार मुझे रह रहकर धर्म चले जाने का डर दिखा रहे थे। और फिर जो प्यार उसके परिवार से मिला,उसने मेरी सारी सोच बदलकर रख दी। उसकी दोस्ती ने मेरे अंदर के सारे साम्प्रदायिक ज़हर को चूस लिया।


इसी बीच गुजरात दंगा हुआ।सारा हरिद्वार साम्प्रदायिक ज़हर से भर हुआ था। पर उसकी दोस्ती के चलते इसी दंगे के दौरान मुझे RSS से नफरत हो गयी। वो दोस्ती मुझे इंसान बनाने की दिशा में पहला कदम थी। आज भी में इसीलिए महसूस करता हूँ कि विविधता वाला शैक्षिक माहौल इसीलिए जरुरी है।
मेरे दोस्त Mohsin Raza मुझे इंसान बनाने का शुक्रिया।

— कंचन जोशी

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