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फहद सईद

ट्रेन का तत्काल टिकट मेरे जेब पर भारी पड़ता था। पर कभी-कभी दिल को इस तौर पर हल्का लगता था कि मेरी मां को कुछ घंटों के लिए अपने आंसू मुझसे छिपाने नहीं पड़ेंगे। उस रोज भी मां मुझे अपनी पथराई आंखों से घुरे जा रही थी। सर पर हाथ फेर-फेर कर मेरे सफर को कोस रही थी। बार-बार मेरी सलामती भरे सफर के लिए दुआएं किये जा रही थी। मां कभी भी मुझे दूर भेजने पर राजी नहीं होती थी। पर मैं अपनी ख्वाबों की दुनिया के तफरीह के लिए इस तरह जिद्दी था कि वह उसके आगे झुक जाती। मैं उससे कहता- मां अब मेरे तालिम के चंद साल ही तो बचे हैं, फिर मेरी नौकरी लग जाएगी। तब मैं तुझे भी अपने साथ ले जाउंगा पता है वहां तुझे दिनभर हाथ से पंखे नहीं झलने पड़ेंगे। जिंदगी वहां आराम और महफुज होगी। नहीं मालुम कि वह भी मेरे इस तरह के ख्वाबों की दुनिया में सफर करती थी या नहीं। पर यह जरूर था कि वह मेरे सपने के महलों को तोड़ना नहीं चाहती थी।

उस दिन मां मुझे जब स्टेशन छोड़ने आई तो वह अपने आंसूओं पर काबू नहीं कर पर रही थी। मैं भी उसे खिड़की से देखते हुए रोने लगा। ट्रेन चल पड़ी थी और मैं अपने घर की यादों से दूर निकल आया था। कम्पार्टमेंट के भीतर सियासी गुफ्तुगू शुरू हो चुके थे। थोड़ी-थोड़ी देर में चाय का दौर चलता जा रहा था। बीच-बीच में दोस्तों के फोन आ रहे थे जो कि मां के हाथों के बने हलुवे के मुंतजिर थें। मैं तो पर बार मां के गम से बचकर बहुत दूर निकल आता था पर वह तो उसी में जीती थी।

ट्रेन अब गाजियाबाद पहुंच चुकी थी। वह वहां काफी देर तक रुकी रही। मंजिल के करीब पहुंचने का इंतजार सफर को और भी मुश्किल बना रहा था। हर लम्हा भारी पड़ रहा था। खिड़की के बाहर खड़े लोगों से पूछने पर मालूम चला कि पुलिस का एक दस्ता किसी मुजरिम के तलाश में है। शायद इसी वजह से ट्रेन रोकी गई है। इस दौरान मैं अपना अधूरी मैगजीन को मुक्ममल करने में जुट गया, जिसकी एक स्टोरी की लाइन कुछ यूं थी- इंसान हमेशा से समाज घिरा रहा है। कोई शख्स किसी मकसद का तकलीम उस वक्त तक कर सकता है, जब तक किसी समाज के अंदर अमन का माहौल हो। अमन के बगैर किसी मकसद को हासिल करना मुमकिन नहीं है।

पुलिस मुसाफिरों को टोकते हुए मेरे डब्बे में दाखिल हुई। करीब आते ही उन्होंने बंदुक तान ली। मैं कुछ समझता पूछता या बताता मैं अपना दोनों हाथ पीछे बंधा हुआ पाया। मुंह पर काला टोपी डाल दिया गया। और कई मजबुट हाथों ने मुझे जकड़ लिया। पहली बार मुझे अपनी हड्डियों का कमजोर होने का अहसास हुआ। एक पल के लिए मैं लाचार और मजबुर हो गया। अब मेरा अदालतों और जेलों का सफर शुरू हो गया। मार-मार कर कई जुर्म के उगलवाएं जाने लगे। एक ही सवाल इतनी बार जाता पुछा जाता कि मैं सपनों में भी अपना जुर्म कबुलने लगा था। और अपने ना किये हुए जुर्म के साथ सुबह व शाम जीने लगा। मैं एक आतंकवादी था। ख्वाबों के अपने किरदार से सख्त नफरत करने लगा। जागते हुए भी खुद को मुजरिम समझने लगा। कई मुस्लिम जमातों ने अवामी चंदों से मेरे केस को संभाले रखा लेकिन मेरी बीमार मां उस दिन के बाद खुद को संभाल नहीं सकी। एक दिन जेल में उसके वफात की खबर मिली। अब वह कमरा मेरे लिए बिल्कुल तंग हो चुका था। कई सालों तक कमरे के दीवारों ने मेरे गम और बेबसी के आंसू पोंछते रहे।

कुछ दिनों बाद जेल में मेरा दिल लगने लगा। क्योंकि जेल के बाहर मेरे लिए अब कुछ भी नहीं बचा था। एक-एक करके मुख्तलिफ अदालतें मेरी बेगुनाही का फैसला सुना रहीं थी। लेकिन पता नहीं क्यों ये फैसले मुझे खुश करने के बजाय बेचैन कर देते। शायद इस वजह से कि मां के बगैर घर जाने की मेरी अंदर चाहत नहीं बची थी। मैं जेल में ही ज्यादा खुश था।
देखते ही देखते बीस साल गुजर गये। अब मेरे बाल सफेद हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रीया आ चुकी थीं। रंग काला पड़ गया था। मुख्तलिफ छोटे-बड़े बीमारियों का घर हो चुका था। अगर बीस साल जेल में गुजारे थे तो मजीद बीस साल मेरे सेहत की खराबी की वजह से कम होने लगते थे।

आखिर अदालत ने मेरे बेगुनाही का फैसला सुना दिया। अब मैं अपनी माजी से निकलकर मुस्तकबिल के तलाश में था। हाल तो मेरा कुछ था ही नहीं, मेरे दोस्त प्रोफेसर, इंजिनियर और डॉक्टर बनें हुए थे। अब मैं अपना बीए मुक्ममल करने का इरादा बना लिया। मेरे साथी अपने जवान बेटों के साथ महफिलों में शिरकत करने लगे थे, और मैं अपने बुढ़ापे को किसी तरह छुपाने की जद्दोजहद में था। मैंने तो न कभी अपने बाप का प्यार पाया और न ही अपने बेटों के लिए अच्छा बाप साबित हो सका। मेरे हमउम्र सभी लोग अपने परिवार के कम-से-कम एक घर तामीर कर चुके थे, पर मैं अब भी अब्बाई घर की मरम्मत कराने में ही बेजार था। वह इस लिए क्योंकि मेरा दिल्ली का सफर इतना लंबा हो गया था कि अब सफर ही मंजिल लगने लगा था। और कैद ही जिंदगी बन चुकी थी।

( ये कहानी हर उस मुसलमान की है जिसने झुठे आतंकी होने का दंश झेला है।)

लेखक पत्रकार है


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