mohenjo daro

‘लगान’ की कहानी में कचरा की जाति है, मगर नायक भुवन की जाति नहीं है जबकि भारतीय समाज में जाति तो सबकी होती है. कचरा अगर अछूत है तो भुवन निश्चित रूप से सवर्ण है. एक सवर्ण अपने अपमान का बदला संगठित होकर ले सकता है, लेकिन एक कचरा को न्याय तभी मिलेगा जब किसी भुवन टाइप सवर्ण को दया आएगी. पूरी फिल्म गांधीवाद के हिंदुत्व में लिपटी हुई है. कचरा के अछूतपन पर सारा समाज एक मत है लेकिन विद्रोह करता है भुवन !

ऐसा होता है क्या? गोदान तक पढ़ जाइए, ऐसे नायक आपको नहीं मिलेंगे. इस तरह ‘लगान’ सवर्ण और हिंदुत्व को ही महिमा मंडित करती है. कुछ इसी तरह की थीम पर फ़िल्म ‘स्वदेश’ भी है.

अब आशुतोष गोवारिकर की एक और फिल्म आने वाली है. ‘मोहनजो दारो’. सोचिये कहानी क्या हो सकती है ?

Screenshot_84सरस्वती नदी की खोज से लेकर, सिंद्धु घाटी सभ्यता में मिले साँड़ के चित्र को फेब्रिकेट कर घोड़ा बना देने और बाद में जगहंसाई होने से लेकर, फर्जी यज्ञ वेदी खोज लेन की हद तक क्या-क्या उपाय नहीं किया इन हिंदुत्ववादियों ने कि आर्यों को यहां का मूलनिवासी साबित कर दें और अपने ब्राह्मणवाद के दर्शन को अति प्राचीन. लेकिन इन्हें सफलता नहीं मिली.

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इसी बीच अमीष त्रिपाठी की इसी विषय पर पॉप्युलर किताब आई. तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की वजह से किसी प्रकार के विवाद से बचने के लिए ये लोग प्रायः यह सावधानी बरतते हैं कि डिस्क्लेमर देते हैं, ‘यह कहानी काल्पनिक है जिसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन करना है’. लेकिन उनका वास्तविक उद्देश्य तो यही रहता है कि इस झूठ को पॉप्युलर कल्चर में कैसे स्थापित करें कि आर्य विदेशी नहीं ,यहीं के मूलवासी हैं और उनकी व्यवस्था अन्याय पर नहीं न्याय पर टिकी है.

यही काम पहले के ब्राह्मण भी कर गये हैं. रामायण, महाभारत इसी उद्देश्य से लिखे गए ग्रंथ हैं. अब वही काम आधुनिक ब्राह्मण कर रहे हैं. काल्पनिक गाथाओं को आधुनिकि टेक्नॉलोजी के सहारे आधुनिक परिवेश में अपने ब्राह्मणवाद व आर्यत्व के वर्चस्व को आम आदमी के दिमाग में फीड करना. ‘मोहनजो दारो’ इसी प्रयास की अगली कड़ी है, भले ही फ़िल्म की शुरुआत में ही डिस्क्लेमर लगा दिया गया हो कि यह एक काल्पनिक गाथा है लेकिन संदेश साफ होगा – यहां तुम्हारा कुछ नहीं, सब कुछ हमारा है.

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इस तरह के हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद से आप मुकाबला कैसे करेंगें ?
कबाली के भरोसे ?

‘मोहनजो दारो’ के प्रोमो से स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद अपने सांस्कृतिक वर्चस्व को जस्टिफ़ाई करने के लिये किस हद तक झूठ और मिथक रच सकता है. प्रोमो में नायक का नाम शरमन आता है. शरमन श्रमण का ही प्रतिरूप लिया गया मालूम पड़ता है. फ़िल्म में शरमन यानी श्रमण के हाथ में त्रिशूल पकड़ा दिया गया है. जबकि श्रमण सभ्यता के लोग शांति में यकीन रखते थे, युद्ध और हिंसा में नहीं. श्रमण योगी तर्क शील होते थे. वे आपस में भयंकर तर्क करते थे लेकिन एक दूसरे के विरूद्ध उन्होंने कभी भी हथियार नहीं उठाया. महावीर, बुद्ध, अजीत केशकंबल, मक्खलि गोशाल उस श्रमण परंपरा के प्रतिनिधि हैं. फिर नायक का नाम शरमन देकर इनके चरित्र का विरूपण क्यों?

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Screenshot_83‘मोहनजो दारो’ फिल्म का नायक तो कुछ इस तरह होना चाहिए था कि दाढ़ी हो, मगर मूंछ नहीं. यही फैशन था वहां. इसका पुरातात्विक प्रमाण मिला है. इस तरह नहीं कि वह क्लीनशेव हो, पगड़ी बांधे हो, हाथ में त्रिशूल लेकर भांज रहा हो. यह तो ‘मोहनजो दारो’ का ब्राह्मणीकरण हो गया !

सूरत और सीरत का विरूपण करना ब्राह्मणों की पुश्तैनी आदत है. जिसे वे खलनायक बनाना चाहते हैं पहले वे उसकी सूरत बिगाड़ते हैं, फिर सीरत. रामायण और पुराणों में यही किया इन्होने. अब ‘मोहनजो दारो’ जैसी फिल्म बनाकर करेंगे. यह बहुजनों पर बहुत भोंडे तरीके से आधुनिक नस्लीय सांस्कृतिक हमला है.

-मनीष कुमार चाँद
श्रमण चिंतक
-Manish Kumar Chand


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