मेरा ताल्लुक जमाने की उस पीढ़ी से है जिसने शायद सबसे ज्यादा आतंकवाद शब्द को पढ़ा है और करीब से देखा भी है। मुझे याद है, जब अमरीका पर 9/11 का आतंकी हमला हुआ था तो उसकी खबर मैंने रेडियो पर सुनी थी। अगले दिन सभी अखबार आग की लपटों, धुएं के गुबार, धराशायी हो चुके टावर, आंसू बहाते लोगों और दम तोड़ चुके मासूमों की तस्वीरों से भरे थे। उस रोज हर जगह सिर्फ आतंकवाद की चर्चा हो रही थी।

शाम को जब मैं स्कूल से घर लौटा तो एक जगह कुछ लोगों को इस बात पर बहस करते देखा कि आतंक का कोई मजहब है या नहीं। ज्यादातर लोग इस बात पर सहमत दिखे कि आतंक का सिर्फ एक ही मजहब है और वो है — इस्लाम। उन लोगों का मानना था कि जहां मुसलमान सबसे ज्यादा होंगे, वहां आतंकवाद होगा ही होगा। आखिर आतंकवाद की शिक्षा तो क़ुरआन में दी गई है!

मेरे लिए यह सुनना किसी अचंभे से कम नहीं था, इसलिए मैंने घर जाकर मेरी किताबों का बक्सा खोला और उसमें से क़ुरआन निकालकर वह आयत ढूंढ़ने लगा जिसमें आतंकवाद की शिक्षा दी गई हो। यह क़ुरआन मुझे एक प्रकाशक ने भेजा था क्योंकि मेरा इरादा गांव में लाइब्रेरी शुरू करना था। मैंने क़ुरआन की कई आयतें पढ़ीं लेकिन मुझे वह आयत कहीं नहीं मिली जिसमें आतंकवाद की पैरवी की गई हो या आतंकवादियों को शाबासी दी गई हो। हां, एक आयत ऐसी मिली जिसे मैं आज तक भुला नहीं पाया। आसान शब्दों में उसका अर्थ कुछ इस प्रकार है — अगर किसी ने एक निर्दोष की हत्या की हो तो उसका यह कार्य संपूर्ण मानवता की हत्या करने के समान है। इसी प्रकार अगर किसी ने एक जान को बचाया तो यह कार्य संपूर्ण मानवता की रक्षा करने के समान है। (सूरह अल—माइदह 5/32)

उस घटना के बाद मैंने नियमित रूप से क़ुरआन पढ़ना और रेडियो सुनना जारी रखा। रेडियो से ही पता चला कि अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक पर हमला कर दिया। इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम ​हुसैन को फांसी दे दी। मैंने सोचा, अगर सद्दाम ही दुनिया में आतंक और अशांति की वजह थे (जैसा कि मीडिया बता रहा था), फिर उनकी मौत के बाद तो धरती जन्नत बन जानी चाहिए! खासकर इराक में शांति और खुशहाली की जबर्दस्त लहर आनी चाहिए! मगर ऐसा नहीं हुआ। इसके बाद सोशल मीडिया का ज़माना आया। पता चला कि कोई आईएसआईएस नामक खूंखार आतंकी संगठन है जो खौफनाक तरीकों से लोगों की गर्दनें कलम करता है।

बरसात की एक शाम जब मैं घर आने के लिए बस स्टॉप पर इंतजार कर रहा था तो वहां चाय की दुकान पर लोगों को आतंकवाद व आईएसआईएस पर चर्चा करते देखा। उनमें से अधिकतर का मानना था कि इराक में आतंकवाद इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान ज्यादा हैं! अफगानिस्तान में आतंकवाद इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान ज्यादा हैं! यहां तक कि कश्मीर में आतंकवाद ​इसलिए है क्योंकि वहां मुसलमान ज्यादा हैं!

मैं खामोशी से उनकी बातें सुनता रहा। घर आने के बाद मैंने दुनिया का नक्शा निकाला और उस इलाके को देखने लगा जिसकी चर्चा आज सिर्फ आतंकवाद की वजह से होती है। इराक, सीरिया वगैरह। मैंने पाया, बेशक यहां आतंकवाद बहुत ज्यादा है और यह इलाका मुस्लिम बहुल है। फिर मैंने गूगल पर सर्च किया — किस देश में सबसे ज्यादा मुसलमान हैं? मुझे जवाब मिला — इंडोनेशिया। यह क्या? अगर मुसलमान ही आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं तो इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा आतंकवादी होने चाहिए थे, वहां से रोज धमाकों की खबरें आनी चाहिए थीं, लेकिन इस देश का जिक्र तो मीडिया में महीनों तक नहीं होता।

वास्तव में आतंकवाद के लिए कोई धर्म जिम्मेदार नहीं है और इस्लाम तो बिल्कुल नहीं। आतंकवाद के लिए जिम्मेदार है दुष्ट राजनीति और कुछ बड़े देशों के निहित स्वार्थ। अरब देशों में आतंकवाद इसलिए है क्योंकि वहां तेल है। अगर उनके पास तेल न होता तो उनमें किसी की दिलचस्पी नहीं होती। वहां झगड़े की जड़ तेल है। आर्थिक रूप से शक्तिशाली और हथियारों का कारोबार करने वाले देश जानते हैं, अगर दुनिया को काबू में रखना है तो तेल के कुओं को काबू में रखो। फिर चाहे इसके लिए लोगों पर बम बरसाने पड़ें या किसी को फांसी चढ़ाना पड़े। खुद के हर गलत काम को कुतर्क से सही साबित करते रहो, लोगों को लड़ाओ—भिड़ाओ, ताकि अपने हथियार बेच सको। इस तरह आप दुनिया को जो नाच नचाना चाहेंगे, नचा पाएंगे। आज इराक और सीरिया जैसे देश इसी की सजा भुगत रहे हैं।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान का आतंकवाद भी राजनीति की देन है। दुनिया के नक्शे पर इनकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जो यहां अपने कदम जमा लेगा, वह एशिया के बड़े भूभाग पर नजर रखेगा। बात करें कश्मीर की, तो सभी जानते हैं कि यहां का आतंकवाद सरहद पार की राजनीति से प्रेरित है। अगर भारत कश्मीर को खुद से अलग कर भी दे तो कश्मीरियों के हालात नहीं बदलने वाले। फिर यहां भुखमरी और बेरोजगारी के साथ आतंकवाद की जो खतरनाक लहर आएगी, वह उन्हें तोड़कर रख देगी।

मैंने कई लोगों को देखा है जो कश्मीर के आतंकवाद व अशांति के लिए इस्लाम को दोष ​देते ​हैं। उन्हें मैं दोबारा इंडोनेशिया का उदाहरण नहीं दूंगा। वे अपने देश के एक अभिन्न अंग लक्षद्वीप के बारे में जरूर पढ़ें। यह भारत के सबसे ज्यादा शांतिप्रिय इलाकों में से है। यहां की करीब 97 फीसद आबादी इस्लाम को मानती है। आप शायद ही खबरों में लक्षद्वीप का जिक्र पाते होंगे। यहां न तो हमारे सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाए जाते हैं और न ही देश विरोधी नारे लगाए जाते हैं। अगर आतंकवाद के​ लिए सिर्फ मुसलमान होना ही वजह है तो लक्षद्वीप के हालात कुछ और ही कहानी बयां करते।

आतंकवाद की आखिरी शर्त मैं नहीं जानता लेकिन पहली शर्त दुष्ट राजनीति है। इसके लिए यह कोई मायने नहीं रखता कि आतंकवादी किस धर्म को मानता है, कैसे कपड़े पहनता है, वह कौनसी भाषा बोलता है। रही बात मुसलमानों की, तो दुनिया का आम इन्सान जिस तरह रोटी, कपड़ा, मकान और सुनहरे भविष्य की ख्वाहिश रखता है, मुसलमान भी वही चाहता है।

दूसरे इन्सानों की तरह मुसलमानों में भी अच्छे या बुरे लोग होते हैं। वे भी आम इन्सानों की तरह हंसते और रोते हैं। उन्हें भी भूख और प्यास लगती है। वे भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़कर अपने भविष्य को खुशहाल बनाएं। एक आम मुसलमान के साथ मेरा अनुभव कहता है कि आप उससे सिर्फ अच्छा सलूक कीजिए, वह भी आपके साथ अच्छा सलूक ही करेगा।

न क़ुरआन आतंकवाद सिखाता है और न इस्लाम। न गीता दहशतगर्दी सिखाती है और न हिंदू धर्म। न बाइबिल किसी का कत्ल करने का हुक्म देती है और न ही कोई और धार्मिक किताब बदमाशी की पट्टी पढ़ाती है। यह तो सियासत और सौदेबाजी का खेल है, जिसे तराजू में बेगुनाह इन्सान के गोश्त में भी डॉलर नजर आता है।

— राजीव शर्मा (कोलसिया) —


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