कार्ल मार्क्स “विचारधारा” शब्द के ख़िलाफ़ थे. उनका मानना था कि विचारधारा बुर्जुआ/अभिजात (Bourgeois) वर्ग का अस्त्र है जिससे वह लोगो के मस्तिष्क पर क़ब्ज़ा करके उनका निरंतर शोषण करता है और समाज में अपनी दादागीरी को और ज़्यादा पुख्ता करता है.  बुर्जुआ वर्ग विचारधारा के ज़रिए अपना वर्चस्व बनाए रखता है. वर्चस्व बनाए रखने में अभिजात वर्ग का सत्ता स्वार्थ निहित होता है जबकि सर्वहारा (Proletariat) वर्ग का कोई निहित स्वार्थ (Vested Interest) नहीं होता. सर्वहारा तो स्वयं राज्य के खात्मे की ओर अग्रसर रहता है और वर्गविहीन समाज को स्थापित करने हेतु प्रयत्नशील रहता है. हालाँकि बाद में कार्ल मार्क्स की इस अवधारणा से लेनिन ने असहमती जताते हुए कहा कि विचारधारा सर्वहारा के लिए भी अति-आवश्यक है. ऐसा लगता है मानो कार्ल मार्क्स यह कहना चाह रहे हों कि किसी विचारधारा के चक्कर में न फँसकर सर्वहारा को अपने बाज़ुओं की शक्ति पर यकीन रखते हुए अभिजात वर्ग के ख़िलाफ़ अड़े रहना चाहिए और तंत्र को पूरी तरह उलट देना चाहिए.

यहाँ दो शब्दों को लिखना चाहूँगा- “मार्क्सवाद” और “फ़ासीवाद” !!  ये केवल शब्द ही नहीं हैं अपितु विश्वपरिवर्तन के ऐसे साधन हैं जिनसे समाज की सूरते हाल बिलकुल बदल सकती है यानि एक से संवर भी सकती है तो दूसरे से बिगड़ भी सकती है. जैसा कि अभी बताया कि कार्ल मार्क्स “मार्क्सवाद”  जैसे किसी तकल्लुफी नाम या लक़ब के पक्ष में नहीं रहे. वह सर्वहारा को कर्योंन्मुख (Action-Oriented) बनाना चाहते थे. उनके दोस्त एन्जेल्स ने बताया कि मार्क्स कहा करते थे, “सच तो यह है कि मैं ख़ुद भी मार्क्सवादी नहीं हूँ!”

फ़ासीवाद की तारीफ़ यह है कि इसको “पोलिटिकल पैथोलॉजी”, “राजनैतिक-रोग”, “सियासी मर्ज़” जैसे नामों से जाना जाता है. समाज के असामाजिक और कुण्ठित तत्वों को लामबन्द करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसका कोई दृढ़ दर्शन नहीं होता. यह तो बस एक बीमार सोच है जो समाज की शान्ति-समृद्धि छीनने का माद्दा रखती है. इसका जन्म किसी विचारधारा के रूप में नहीं बल्कि राजनैतिक उथलपुथल के रूप में हुआ था !! मार्क्सवाद और फ़ासीवाद के साथ समानता यह है कि इनके जनकों ने इनके “विचारधारा” कहने के बजाये इनके क्रियान्वन पर ज़ोर दिया. लेकिन बाद में जो हुआ उससे सब परिचित हैं. बीसवीं शताब्दी में अस्सी के दशक की समाप्ति के बाद मार्क्सवाद कभी विचारों के हल्क़े से बाहर ही नहीं निकल पाया, कर्योंन्मुख होने की बात तो छोड़ ही दीजिए !! वहीँ दूसरी ओर, यदि हम भारत की बात करें तो, फ़ासीवाद स्वयं को दोनों स्तर पर सशक्त बनाता गया. क्रियात्मक स्तर पर इसने आज़ादी के बाद सबसे पहले महात्मा गाँधी के क़त्ल से शुरुआत कर एक लम्बे खून-खराबे का आग़ाज़ तो किया ही, साथ ही वैचारिक स्तर पर जो गंध फैलाई है वह भयावह है. तर्कशील और विज्ञानी सोच वाले मार्क्सवादियों को अभी धर्म के आलोचना से ही फ़ुर्सत नहीं मिली, जबकि दूसरी तरफ़ धर्म, सवर्णता और कुलीनता के नाम पर “विकसित” हुए फ़ासीवाद का ज़हर गली-कूचों में फैल गया!!

विचारधारा दिग्गजों का कार्यक्षेत्र होता है, आम जनता इन भारी-भरकम शब्दों से अपरिचित होती है. उदाहरण के लिए जनसाधारण को यह मालूम नहीं होता कि “फ़ासीवाद” क्या है, यह विचारधारा कहाँ से उत्पन्न होती है? लेकिन वे कहीं न कहीं विचारधारा से जुड़े होते हैं. विचारधारा ‘जनमत’ अथवा ‘पब्लिक ओपिनियन’ को जन्म देती है और फिर विचारधारा को साकार किया जाता है. लोक-प्रशासन की भाषा में इसको ‘पालिसी मेकिंग’ और ‘पालिसी इम्प्लीमेंटेशन’ कहा जाता है. आम जनता फ़ासीवाद को नहीं जानती लेकिन उसको बताया जा चुका होता है कि हिन्दू-मुसलमान, दलित, निचले, सवर्ण, गाय, सूअर, हरा-भगवा, हिन्दूराष्ट्र, हिन्दूराष्ट्रवाद इत्यादि शब्दों का क्या मतलब होता है.

देश की राजधानी से महज़ 20-25 किलोमीटर की दूरी पर दादरी में अल्पसंख्यक समुदाय के एक सदस्य को इस अफ़वाह पर मार डाला गया कि उसके फ्रिज में गाय का माँस रखा है ! इससे पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में दाभोलकर, पन्सरे और कलबुर्गी जैसे रेशनलिस्ट अथवा तर्कवादियों को मौत के घाट उतार दिया गया. उन्होंने गाय का माँस नहीं खाया था. एक प्रदेश में “समाजवाद” के नाम पर सरकार बनती है, पूरा खानदान समाजवादी होता है, साथ ही विधयाकों की जमात में 60 से ज़्यादा अल्पसंख्यक समुदाय के होते हैं उसके बावजूद भी एक इलाक़े में फ़ासीवादी षडयंत्र को रोका नहीं जाता. फ़ासीवादियों की एक महापंचायत होती है और उन सैकड़ों लोगो को काट डाला जाता है जिनमे अधिकतर वो लोग होते हैं जिन्हें समाजवादी दृष्टि में ‘सर्वहारा’ कहते हैं और उन 60 से अधिक विधायकों की दृष्टि में मुसलमान ! एक नौजवान मंज़रे आम पर आता है और अपनी उच्च जाति के लिए आरक्षण की मांग करता है. वो अपनी कौम के नौजवानों से कहता है कि तुम आत्महत्या न करो, बल्कि पुलिस को ही मार डालो!! मुल्क के नायब सदर पर लांछन लगाए जाते हैं और मुल्क की हया घास चरने चली जाती है. इसके अलावा देशभर में निचली जातियों के साथ जो बर्ताव पिछले एक साल से हो रहा है, वह पीड़ादायक है. मध्यप्रदेश के छतरपुर ज़िले में एक नाबालिग़ दलित लड़की को इसलिए बुरी तरह पीता जाता है क्यूकि उसकी परछाई एक ऊँची जात के आदमी पर पड़ जाती है!! जर्नलिस्ट रवीश कुमार दादरी में ग़ैर-मुस्लिम ग्रामवासियों से पूछते हैं कि आप लोग माहौल क्यूँ बिगड़ने देते हैं. जवाब मिलता है कि हम क्या कर सकते हैं, इसके पीछे बड़े लोग हैं, हम तो “ग़रीब” हैं, “कुम्हार” हैं !! एक कट्टरपंथी संगठन का सदस्य अलीगढ़ में बैठकर यह कह जाता है कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय “आतंक की नर्सरी” है और हम इसी बात पे उलझे हुए रहते हैं कि मोदी की माँ ने बर्तन धोए या नहीं, मोदी ने अमेरिका दौरे पर कितनी अचकन बदली !! झगडा गाय या माँस का है ही नहीं, वर्चस्ववादी मानसिकता का है !!

अब सवाल उठता है कि देश में इतना सब कुछ हो रहा है तो यह सब देखकर वो लोग क्या कर रहें ख़ुद को बुद्धिजीवी, शान्तिप्रिय, प्रगतिशील, गाँधीवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी, बहुजनवादी और न जाने क्या-क्या समझते हैं. एक समय था कि जब कनाडा से उर्दू में छपने वाला लाला हरदयाल का सिर्फ़ एक “ग़दर” परचा भारत में ओपनिवैशिक सरकार की चूलें हिला दिया करता था लेकिन आज हजारों पर्चें, मीडिया दस्तावेज़, वेब पोर्टल इत्यादि फ़ासीवाद का बाल भी बांका नहीं कर पाते. अपनी आँखों से देखता हूँ कि देश के एक मशहूर हिंदी समाचार पत्र के पूर्व कार्यकारी संपादक सोशल मीडिया पर इसलिए और इस तरह लिखते हैं ताकि उनके विचार पढ़कर हिन्दू-मुसलमान-नास्तिक कमेंटबॉक्स में एक दूसरे की टांग खींचे, ताकि लोगों में खटास बड़े, ताकि लोग सोशल मीडिया पर ही “एंटी-सोशल” हो जाएँ ! समाज से कोई सरोकार है ही नहीं . दादरी काण्ड होता है और आप सिर्फ़ अखलाक़ मियां की तस्वीर को अपनी डिस्प्ले पिक्चर (डी.पी.) बनाकर गंगा नहा जाते हैं. यहाँ बात उन वरिष्ठजनों की हो रही है जो सिर्फ़ फेसबुक-ट्विटर पर बैठकर क्रांतियाँ लिखना चाहते हैं.

मीडिया और सोशल मीडिया पर सिर्फ़ लफ्फाजी की जा रही है. केवल “विचारों” और “विचारधाराओं” का पोषण किया जा रहा है. नाटकीय ढंग से देश में चुनाव होता है, फ़ासीवादी विचारधारा को ‘कालाधन, पाकिस्तान, कांग्रेस-मुक्त भारत, अनुच्छेद 370, पन्द्रह लाख, विकास जैसे खोल (आवरण) में लपेटकर जनता के हाथ में थमा दिया जाता है. अद्भुत और विकराल नतीजे सामने आते हैं. इकतीस प्रतिशत जीत जाते हैं और उनहत्तर प्रतिशत हार जाते हैं. ये जो 31% इक़्तेदर में आते हैं उनको इस मकाम तक लाने में सबसे बड़ा किरदार उन लोगो का है जो 69% तो हैं लेकिन बटे हुए हैं। कुछ सेक्युलर हैं, कुछ मार्क्सवादी, कुछ लेनिनवादी, कुछ बहुजनवादी, कुछ मुलायमवादी, कुछ मुसलमानवादी, कुछ ओवैसिवादी, कुछ गांधीवादी, कुछ कांग्रेसवादी, कुछ तृणमूलवादी, कुछ जनतावादी, और न जाने कौन कौन से बकवासवादी।

इनमे से सब विचारधारा तक ही सीमित रहते हैं. सब खुद को सबसे उचित बताते हैं। और कम से कम सभी लोग फासीवादी विचारधारा को गरियाते भी हैं। आधुनिक तकनीक, लोकतान्त्रिक व्यवस्था, विचारो में खुलापन, विचारधारा में बहुसंख्यक होने के बावजूद उनहत्तर प्रतिशत वाला यह वर्ग फासीवाद को मात नही दे पाता!! धिक्कार है! सबसे ज़्यादा शर्म तो मार्क्सवादियों पर आती है। ये लोग रेशनलिस्ट होते हैं, अनबायज्ड होते हैं, विज्ञानी प्रवृति के होते हैं, ज़मीन से जुड़े होते हैं, ग़रीबपरस्त होते हैं लेकिन फिर भी कुछ नही उखाड़ पाते. यही आज का परम सत्य है. कोई अपने धरम-करम, पंथ, विचारधारा की बात न करे। इतना जान लिया जाए कि इंसान ना-हक़ कट रहा हैऔर आप अभी “विचारधारा” पर विचार ही कर रहे हैं, आदर्शवाद से बाहर निकलना ही नहीं चाहते. मुसलमान कहते हैं कि (दुनिया में हर ऐतबार से) एक इतना अच्छा वक्त आएगा कि जो लोग जिन्दा होंगे वो कहेंगे कि काश हमारे पूर्वज ज़िन्दा होते तो आज इस बेहतरीन युग को जीते. आदर्शवाद की बात यहीं ख़त्म नहीं हो जाती. मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट भी ठीक इसी अन्दाज़ में बोलते हैं. कहते हैं कि हमारे कम्युनिस्ट दौर में “राज्य” का सर्वनाश हो जायेगा, सर्वहारा की “तानाशाही” होगी, कोई दुखी नहीं होगा, यह होगा, वो होगा इत्यादि. श्रीमदभगवत गीता पढ़ने वाले सुधि जन कहते हैं कि अन्याय के ख़िलाफ़ जिहाद करना और इस जिहाद के लिए प्रेरित करना अर्जुन और श्रीकृष्ण की सुन्नत है. लेकिन होता यह है कि लोग गीता पढकर भगवान कृष्ण के इतने बहुमूल्य उपदेशों को समाज में लागू नहीं कर पाते ! सब आदर्शवाद की बाते करते हैं, यथार्थ की ज़मीन पर कोई नहीं उतरता, सिवाय फ़ासीवादियों के !! देश के संविधान ने सबकुछ दिया है लेकिन देश फिर भी अपाहिज है क्यूकी देश के अच्छे लोग क्रियान्वन (एक्शन) में यकीन नहीं रखते. आले अहमद सुरूर ने कहा था:

अपने माहौल से बेज़ार हूँ मैं, कैसी लानत में गिरफ्तार हूँ मैं !!

मुहम्मद नवेद अशरफ़ी


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