सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह में उर्स के दौरान होने वाली देग लूटने की लगभग 200 साल पुरानी रोमांचक परम्परा इतिहास बन कर रह गई है। दरगाह में खौलती देग में कूदकर उसमें पक रहे भोजन को लूटने का सनसनीखेज और रोमाचंक मंजर पिछले तीस साल से नजर नहीं आता।

दरगाह के बुलंद दरवाजे के दोनों ओर दो विशालकाय देग (कढ़ाह) रखी हुई है। इसमें बायीं तरफ रखी छोटी देग मुगल बादशाह अकबर ने चित्तौड़ विजय के बाद 974 हिजरी संवत 1567 में दरगाह को भेंट की थी। बायीं ओर रखी इस देग में 60 मन खाना पकाया जा सकता है। जायरीन की संख्या में बढ़ोतरी को देखते हुए अकबर के पुत्र जहांगीर ने 1631 में उससे दोगुनी बड़ी देग बनवाकर दरगाह में रखवाई। यह देग बुलंद दरवाजे के दायीं ओर रखी हुई है। इस देग में 120 मन खाना पकाया जा सकता है। दरअसल पुराने समय में साधन और सहूलियतें कम होने की वजह से दरगाह में आने वाले हजारों जायरीन के लिए इन्हीं देगों में भोजन बनवाकर मुफ्त वितरित किया जाता था।

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पसंद आया देग लूटने का मंजर

देग में खाना बनवाकर उस समय के बादशाह अथवा उसके प्रतिनिधि की मौजूदगी में जायरीन को वितरित किया जाता था। ईसवी 1800 में तत्कालीन बादशाह शाह आलम को दरगाह आने में देरी हो गई। काफी इंतजार करने के बाद आखिर वहां मौजूद सैकड़ों जायरीन का सब्र टूट पड़ा और उन्होंने खुद ही देग में पके खाने को निकालना शुरु कर दिया। इस वजह से वहां लगभग देग लूटने का मंजर नजर आने लगा। इसी दरमियान बादशाह भी वहां आ पहुंचे। उन्हें यह मंजर बहुत पसंद आया और उन्होने बाकायदा देग लूटने की परम्परा शुरू करवा दी।

1985 में हुई बंद

वक्त गुजरा और मुगल साम्राज्य की जगह अंग्रजों का राज आया और उसके बाद मुल्क आजाद हुआ। इन सबके बीच देग लूटने की परम्परा लगातार चलती रही। सिर से पांव तक खास कपडे़ पहनकर देग लूटने वाले लोग खौलती देग में कूद जाते थे। वे बाल्टियां भर-भर कर बाहर खड़े लोगों तक पहुंचाते रहते।

यह ख्वाजा साहब की रहमत थी कि खौलती देगों में कूदने और घंटो उसमें खड़े रहने के बावजूद कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। लगभग 30 वर्ष पूर्व कुछ विवादों और दरगाह में अत्यधिक भीड़भाड़ की वजह से दुर्घटना की आशंका को देखते हुए संभवत 1985 में देग लूटने की यह परम्परा बंद कर दी गई।

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पहले गोश्त फिर मीठे चावल

दरगाह में स्थित दोनों देगों में पहले मुस्लिम परम्परा के अनुसार चावल के साथ गोश्त भी पकाया जाता था। लेकिन समय के साथ हिंदू, सिख, ईसाई और अन्य धर्मों के लोग भी ख्वाजा साहब के प्रति आस्था रखने लगे। अन्य धर्मों के लोगों की धार्मिक भावनाओं को देखते हुए आखिर इन देगों में गोश्त की जगह मीठे चावल पकाए जाने लगे। अन्य धर्मों के लोग भी अनेक दशकों से इस भोजन को प्रसाद के रूप में स्वीकार करने लगे।

अब व्यावसायिक उपयोग

मुगल साम्राज्य में जायरीन को मुफ्त खाना उपलब्ध कराने के लिए बनी इन दोनों विशालयकाय देगों का अब व्यवसायिक उपयोग होने लगा है। कालांतर में मन्नत पूरी होने के बाद पूरी देग पकवाने में असमर्थ लोग अपनी हैसियत के अनुसार देग में अनाज, चावल, नकद राशि अथवा आभूषण डाल देते थे।

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समय के साथ जायरीन की संख्या में लगातार इजाफा होने की वजह से इन देगों का आय के लिहाज से बाकायदा ठेका छूटने लगा। इस साल महज उर्स के दौरान 15 दिन के लिए तीन करोड़ 44 लाख रुपए की बोली लगी है। जाहिर है शेष पूरे वर्ष के लिए यह आंकड़ा 15 करोड़ को भी पार कर जाएगा।

ख्वाजा गरीब नवाब की रहमत है कि खौलती देग में कूदने के बावजूद किसी का बाल बांका नहीं होता था। देग लूटने की परम्परा सदियों पुरानी है। हालांकि दरगाह में देग पकवाने और लूटने का घटनाक्रम रोजाना होता था लेकिन उर्स में पूरे देश से जायरीन आने की वजह से यह परम्परा आकर्षण का केन्द्र रहती थी। अपरिहार्य कारणों से अब इसे बंद कर दिया गया है। अलबत्ता उर्स की रौनक और रस्मोरिवाज अपनी जगह कायम हैं।

सैयद जैनुअल आबेदीन अली, दरगाह दीवान

(ये लेख राजस्थान पत्रिका से लिया गया है जिसके लेखक सुरेश लालवानी/अजमेर है.. तथा इस लिंक पर आप लेख पढ़ सकते है)


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